सनातन वाणी • भक्ति, ज्ञान और शास्त्रीय पाठ
08 Sep 2026
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स्तोत्र संग्रह

श्री हरि स्तोत्रम्

श्री हरि स्तोत्रम् भगवान विष्णु के दिव्य स्वरूप, गुणों और विश्वपालक शक्ति का वर्णन करने वाला सुंदर स्तोत्र है। इसमें भक्त बार-बार भगवान श्रीहरि की आराधना करते हुए उनकी शरण ग्रहण करता है।

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श्री हरि स्तोत्रम् – मूल संस्कृत पाठ

जगज्जालपालं चलत्कण्ठमालं
शरच्चन्द्रभालं महादैत्यकालम्।
नभोनीलकायं दुरावारमायं
सुपद्मासहायं भजेऽहं भजेऽहम्॥१॥

सदाम्भोधिवासं गलत्पुष्पहासं
जगत्सन्निवासं शतादित्यभासम्।
गदाचक्रशस्त्रं लसत्पीतवस्त्रं
हसच्चारुवक्त्रं भजेऽहं भजेऽहम्॥२॥

रमाकण्ठहारं श्रुतिव्रातसारं
जलान्तर्विहारं धराभारहारम्।
चिदानन्दरूपं मनोज्ञस्वरूपं
धृतानेकरूपं भजेऽहं भजेऽहम्॥३॥

जराजन्महीनं परानन्दपीनं
समाधानलीनं सदैवानवीनम्।
जगज्जन्महेतुं सुरानीककेतुं
त्रिलोकैकसेतुं भजेऽहं भजेऽहम्॥४॥

कृताम्नायगानं खगाधीशयानं
विमुक्तेर्निदानं हरारातिमानम्।
स्वभक्तानुकूलं जगद्वृक्षमूलं
निरस्तार्तशूलं भजेऽहं भजेऽहम्॥५॥

समस्तामरेशं द्विरेफाभकेशं
जगद्बिम्बलेशं हृदाकाशदेशम्।
सदा दिव्यदेहं विमुक्ताखिलेहं
सुवैकुण्ठगेहं भजेऽहं भजेऽहम्॥६॥

सुरालिबलिष्ठं त्रिलोकीवरिष्ठं
गुरूणां गरिष्ठं स्वरूपैकनिष्ठम्।
सदा युद्धधीरं महावीरवीरं
महाम्भोधितीरं भजेऽहं भजेऽहम्॥७॥

रमावामभागं तलानग्रनागं
कृताधीनयागं गतारागरागम्।
मुनीन्द्रैः सुगीतं सुरैः सम्परीतं
गुणौघैरतीतं भजेऽहं भजेऽहम्॥८॥

फलश्रुति

इदं यस्तु नित्यं समाधाय चित्तं
पठेदष्टकं कण्ठहारं मुरारेः।
स विष्णोर्विशोकं ध्रुवं याति लोकं
जराजन्मशोकं पुनर्विन्दते नो॥९॥

॥ इति श्रीमत्परमहंसस्वामिब्रह्मानन्दविरचितं श्रीहरिस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥



श्री हरि स्तोत्रम् का सरल हिंदी अर्थ

पहले श्लोक का अर्थ:
मैं बार-बार उन भगवान श्रीहरि की आराधना करता हूं, जो संपूर्ण संसार का पालन करते हैं और जिनके कंठ में सुंदर माला सुशोभित होती है। उनका मस्तक शरद ऋतु के चंद्रमा के समान उज्ज्वल है और वे बड़े-बड़े दैत्यों का अंत करने वाले हैं। उनका शरीर आकाश के समान नीला है, उनकी माया को पार करना अत्यंत कठिन है और माता लक्ष्मी सदा उनके साथ रहती हैं।

दूसरे श्लोक का अर्थ:
मैं बार-बार उन भगवान श्रीहरि की आराधना करता हूं, जो क्षीरसागर में निवास करते हैं और जिनकी मुस्कान खिले हुए पुष्प के समान सुंदर है। संपूर्ण संसार उनमें निवास करता है और उनका तेज सैकड़ों सूर्यों के समान है। उन्होंने गदा और चक्र जैसे दिव्य अस्त्र धारण किए हैं। वे चमकते हुए पीले वस्त्र पहनते हैं और उनका मुस्कुराता हुआ मुख अत्यंत मनोहर है।

तीसरे श्लोक का अर्थ:
मैं उन भगवान विष्णु की आराधना करता हूं, जो माता लक्ष्मी के कंठहार के समान प्रिय हैं और समस्त वेदों का सार हैं। वे जल के भीतर निवास और दिव्य विहार करते हैं तथा पृथ्वी पर बढ़े अधर्म और दुष्ट शक्तियों के भार को दूर करते हैं। वे शुद्ध चेतना और आनंद का स्वरूप हैं। उनका रूप मन को आकर्षित करने वाला है और वे संसार की रक्षा के लिए अनेक रूप धारण करते हैं।

चौथे श्लोक का अर्थ:
मैं उन भगवान श्रीहरि की आराधना करता हूं, जो वृद्धावस्था और जन्म से रहित हैं। वे परम आनंद से परिपूर्ण, आत्मस्वरूप में स्थित और सदा नवीन हैं। वे संसार की उत्पत्ति का कारण, देवताओं के मार्गदर्शक तथा तीनों लोकों को जोड़ने वाले एकमात्र दिव्य सेतु हैं।

पांचवें श्लोक का अर्थ:
मैं उन भगवान श्रीहरि की आराधना करता हूं, जिनकी महिमा का वेदों में गान किया गया है और जो पक्षीराज गरुड़ पर सवारी करते हैं। वे मुक्ति के मूल कारण और भगवान शिव के शत्रुओं का भी नाश करने वाले हैं। वे अपने भक्तों के अनुकूल रहने वाले, संसाररूपी वृक्ष के मूल आधार और प्राणियों के दुःखरूपी कांटों को दूर करने वाले हैं।

छठे श्लोक का अर्थ:
मैं उन भगवान विष्णु की आराधना करता हूं, जो सभी देवताओं के स्वामी हैं और जिनके केश भौंरों के समान गहरे काले हैं। यह संपूर्ण संसार उनके अनंत स्वरूप का एक छोटा-सा प्रतिबिंब है। वे भक्तों के हृदयरूपी आकाश में निवास करते हैं। उनका शरीर दिव्य है, वे समस्त सांसारिक इच्छाओं से मुक्त हैं और सुंदर वैकुण्ठ उनका दिव्य धाम है।

सातवें श्लोक का अर्थ:
मैं उन भगवान श्रीहरि की आराधना करता हूं, जो देवताओं में सबसे अधिक शक्तिशाली, तीनों लोकों में श्रेष्ठ और सभी गुरुओं के भी परम गुरु हैं। वे अपने वास्तविक स्वरूप में सदा स्थित रहते हैं। वे युद्ध में धैर्यवान, महान वीरों के भी वीर और संसाररूपी विशाल समुद्र से पार लगाने वाले तट के समान हैं।

आठवें श्लोक का अर्थ:
मैं उन भगवान विष्णु की आराधना करता हूं, जिनके वाम भाग में माता लक्ष्मी विराजमान हैं और जो श्रेष्ठ नाग भगवान शेष पर निवास करते हैं। सभी यज्ञ उन्हीं के अधीन हैं तथा वे सांसारिक आसक्ति और विकारों से परे हैं। महान ऋषि उनकी स्तुति करते हैं, देवता उन्हें चारों ओर से घेरे रहते हैं और वे प्रकृति के समस्त गुणों से परे हैं।

फलश्रुति का हिंदी अर्थ

जो मनुष्य अपने मन को एकाग्र करके प्रतिदिन भगवान मुरारी के कंठहार के समान सुंदर इस अष्टक का पाठ करता है, वह भगवान विष्णु के शोक और दुःख से रहित नित्य धाम को प्राप्त होता है। उसे फिर से जन्म, वृद्धावस्था और संसार के दुःखों का सामना नहीं करना पड़ता—ऐसा इस स्तोत्र की फलश्रुति में कहा गया है।

श्री हरि स्तोत्रम् का परिचय

श्री हरि स्तोत्रम् भगवान विष्णु को समर्पित आठ श्लोकों की प्रसिद्ध संस्कृत रचना है। इसकी रचना स्वामी ब्रह्मानन्द द्वारा की गई मानी जाती है। इसमें भगवान विष्णु के विश्वपालक स्वरूप, दिव्य सौंदर्य, अस्त्र-शस्त्र, पीताम्बर, गरुड़ वाहन, शेषशय्या और वैकुण्ठ धाम का वर्णन किया गया है।

प्रत्येक श्लोक का अंत “भजेऽहं भजेऽहम्” से होता है। इसका अर्थ है—“मैं उनकी आराधना करता हूं, मैं बार-बार उनकी आराधना करता हूं।”

‘हरि’ नाम का अर्थ

‘हरि’ भगवान विष्णु का एक प्रमुख नाम है। इसका सामान्य आध्यात्मिक अर्थ है—भक्तों के पाप, दुःख, भय और अज्ञान को हरने वाले। भगवान विष्णु को संसार का पालनकर्ता माना जाता है। जब संसार में अधर्म बढ़ता है, तब वे अलग-अलग अवतार धारण करके धर्म की रक्षा करते हैं।

श्री हरि स्तोत्रम् का महत्व

यह स्तोत्र भगवान विष्णु के साकार और निराकार दोनों स्वरूपों का वर्णन करता है। एक ओर इसमें उनके नीले शरीर, पीताम्बर, गदा, चक्र, गरुड़ और माता लक्ष्मी का वर्णन है; दूसरी ओर उन्हें जन्म-मरण से रहित, चिदानंद स्वरूप और सभी गुणों से परे बताया गया है।

इस प्रकार श्री हरि स्तोत्र भक्त को भगवान विष्णु के सुंदर स्वरूप का ध्यान करने के साथ उनके परम आध्यात्मिक स्वरूप को समझने की प्रेरणा देता है।

श्री हरि स्तोत्रम् के पाठ के लाभ

धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करने से:

  • भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।
  • मन को शांति और सकारात्मकता मिलती है।
  • भय, चिंता और निराशा को शांत करने में सहायता मिलती है।
  • भगवान के प्रति भक्ति एवं विश्वास मजबूत होता है।
  • कठिन परिस्थितियों में धैर्य और आत्मबल प्राप्त होता है।
  • मन की चंचलता कम करके एकाग्रता बढ़ाने में सहायता मिलती है।
  • नकारात्मक विचारों और सांसारिक आसक्ति से दूर रहने की प्रेरणा मिलती है।
  • धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलने का भाव विकसित होता है।
  • आध्यात्मिक उन्नति एवं मोक्ष की कामना की जाती है।

श्री हरि स्तोत्रम् की पाठ विधि

  1. प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. पूजा स्थान पर भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण का चित्र रखें।
  3. भगवान के सामने घी का दीपक और धूप जलाएं।
  4. पीले फूल, तुलसीदल, फल या पीली मिठाई अर्पित कर सकते हैं।
  5. भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का ध्यान करें।
  6. सबसे पहले “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का 11 बार जाप करें।
  7. इसके बाद श्री हरि स्तोत्रम् के आठों श्लोकों और फलश्रुति का पाठ करें।
  8. पाठ के समय भगवान विष्णु के दिव्य स्वरूप का ध्यान करें।
  9. अंत में भगवान से अपनी भूलों के लिए क्षमा मांगें।
  10. अर्पित भोग को प्रसाद के रूप में परिवार में बांटें।

पाठ करने का शुभ समय

श्री हरि स्तोत्रम् का पाठ प्रतिदिन सुबह या शाम किया जा सकता है। गुरुवार, एकादशी, पूर्णिमा, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, देवउठनी एकादशी और भगवान विष्णु से संबंधित पर्वों पर इसका पाठ विशेष शुभ माना जाता है।

एकादशी के दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालु भगवान विष्णु की पूजा के समय इसका पाठ कर सकते हैं। हालांकि इसके लिए किसी विशेष दिन की अनिवार्यता नहीं है—भक्त श्रद्धा और शुद्ध भावना से किसी भी दिन इसका पाठ कर सकता है।

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