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08 Sep 2026
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स्तोत्र संग्रह

बिल्वाष्टकम् – संपूर्ण संस्कृत पाठ

बिल्वाष्टकम् भगवान शिव को बिल्वपत्र अर्पित करने की महिमा बताने वाला प्रसिद्ध स्तोत्र है। इसमें एक बिल्वपत्र को श्रद्धापूर्वक अर्पित करने का फल अनेक बड़े धार्मिक अनुष्ठानों के समान बताया गया है।

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बिल्वाष्टकम् – मूल संस्कृत पाठ

त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रियायुधम्।
त्रिजन्मपापसंहारमेकबिल्वं शिवार्पणम्॥१॥

त्रिशाखैर्बिल्वपत्रैश्च ह्यच्छिद्रैः कोमलैः शुभैः।
शिवपूजां करिष्याम्येकबिल्वं शिवार्पणम्॥२॥

अखण्डबिल्वपत्रेण पूजिते नन्दिकेश्वरे।
शुद्ध्यन्ति सर्वपापेभ्य एकबिल्वं शिवार्पणम्॥३॥

सालग्रामशिलामेकां जातु विप्राय योऽर्पयेत्।
सोमयज्ञमहापुण्यमेकबिल्वं शिवार्पणम्॥४॥

दन्तिकोटिसहस्राणि वाजपेयशतानि च।
कोटिकन्यामहादानमेकबिल्वं शिवार्पणम्॥५॥

पार्वत्याः स्वेदसञ्जातं महादेवस्य च प्रियम्।
बिल्ववृक्षं नमस्याम्येकबिल्वं शिवार्पणम्॥६॥

दर्शनं बिल्ववृक्षस्य स्पर्शनं पापनाशनम्।
अघोरपापसंहारमेकबिल्वं शिवार्पणम्॥७॥

मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे।
अग्रतः शिवरूपाय एकबिल्वं शिवार्पणम्॥८॥

फलश्रुति

बिल्वाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोकमवाप्नुयात्॥९॥

॥ इति बिल्वाष्टकम् ॥



बिल्वाष्टकम् का सरल हिंदी अर्थ

पहले श्लोक का अर्थ:
बिल्वपत्र में तीन पत्तियां होती हैं, जो सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणों का प्रतीक मानी जाती हैं। यह भगवान शिव के तीन नेत्रों और उनके दिव्य आयुधों का भी प्रतीक है। ऐसा एक बिल्वपत्र मैं भगवान शिव को समर्पित करता हूं, जो तीन जन्मों के पापों का नाश करने वाला माना गया है।

दूसरे श्लोक का अर्थ:
तीन पत्तियों वाली, कहीं से कटी-फटी न हो, कोमल, स्वच्छ और शुभ बिल्वपत्र की शाखा से मैं भगवान शिव की पूजा करता हूं। यह एक बिल्वपत्र भगवान शिव को समर्पित है।

तीसरे श्लोक का अर्थ:
अखंड और दोषरहित बिल्वपत्र से नन्दिकेश्वर अर्थात भगवान शिव की पूजा करने पर मनुष्य सभी पापों से शुद्ध हो जाता है। ऐसा एक बिल्वपत्र मैं भगवान शिव को अर्पित करता हूं।

चौथे श्लोक का अर्थ:
जो पुण्य किसी योग्य ब्राह्मण को शालिग्राम शिला दान करने और सोमयज्ञ जैसे महान अनुष्ठान से प्राप्त होता है, वही महान पुण्य श्रद्धापूर्वक एक बिल्वपत्र भगवान शिव को अर्पित करने से प्राप्त होता है।

पांचवें श्लोक का अर्थ:
हजारों-करोड़ों हाथियों के दान, सैकड़ों वाजपेय यज्ञ और करोड़ों कन्याओं के महादान से मिलने वाले पुण्य के समान एक बिल्वपत्र भगवान शिव को श्रद्धापूर्वक अर्पित करना माना गया है।

छठे श्लोक का अर्थ:
बिल्ववृक्ष को माता पार्वती से उत्पन्न और भगवान महादेव का अत्यंत प्रिय माना गया है। मैं उस पवित्र बिल्ववृक्ष को प्रणाम करता हूं और उसका एक बिल्वपत्र भगवान शिव को समर्पित करता हूं।

सातवें श्लोक का अर्थ:
बिल्ववृक्ष का दर्शन और स्पर्श भी पापों का नाश करने वाला माना गया है। यह गंभीर से गंभीर पापों को समाप्त करने की शक्ति रखता है। ऐसा एक बिल्वपत्र मैं भगवान शिव को अर्पित करता हूं।

आठवें श्लोक का अर्थ:
बिल्ववृक्ष की जड़ में ब्रह्माजी, मध्य भाग में भगवान विष्णु और अग्र भाग में भगवान शिव का स्वरूप माना गया है। ऐसे पवित्र बिल्ववृक्ष का एक पत्र मैं भगवान शिव को समर्पित करता हूं।

फलश्रुति का हिंदी अर्थ

जो व्यक्ति भगवान शिव के समीप श्रद्धापूर्वक इस पवित्र बिल्वाष्टकम् का पाठ करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर शिवलोक को प्राप्त करता है—ऐसी इस स्तोत्र की फलश्रुति है।

बिल्वाष्टकम् का परिचय

बिल्वाष्टकम् भगवान शिव को समर्पित आठ श्लोकों का प्रसिद्ध स्तोत्र है। इसमें बिल्वपत्र की पवित्रता, उसकी तीन पत्तियों का आध्यात्मिक अर्थ तथा भगवान शिव को इसे अर्पित करने की महिमा का वर्णन किया गया है।

भगवान शिव को बिल्वपत्र अत्यंत प्रिय माना जाता है। इसकी तीन पत्तियां भगवान शिव के तीन नेत्र, त्रिशूल, त्रिगुण और ब्रह्मा-विष्णु-महेश का प्रतीक मानी जाती हैं। प्रत्येक श्लोक के अंत में भक्त कहता है—“एकबिल्वं शिवार्पणम्”, अर्थात मैं यह एक बिल्वपत्र भगवान शिव को समर्पित करता हूं।

बिल्वाष्टकम् का महत्व

यह स्तोत्र बताता है कि भगवान की पूजा में वस्तु के मूल्य से अधिक श्रद्धा का महत्व होता है। भक्त सच्चे मन से भगवान शिव को केवल एक बिल्वपत्र अर्पित करे, तो वह अर्पण भी महान यज्ञ और दान के समान फलदायी माना गया है।

बिल्वपत्र की तीन पत्तियां शरीर, मन और आत्मा को भगवान शिव को समर्पित करने का भाव भी प्रकट करती हैं। इसका पाठ साधक में भक्ति, विनम्रता और समर्पण की भावना विकसित करता है।

बिल्वाष्टकम् के पाठ के लाभ

धार्मिक मान्यता के अनुसार बिल्वाष्टकम् का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से:

  • भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है।
  • जाने-अनजाने हुए पापों के लिए क्षमा का भाव जागृत होता है।
  • मन को शांति और आध्यात्मिक संतोष मिलता है।
  • नकारात्मक विचारों और मानसिक अशांति को दूर करने में सहायता मिलती है।
  • भगवान शिव के प्रति भक्ति और विश्वास मजबूत होता है।
  • जीवन में आने वाली परेशानियों का सामना करने का आत्मबल मिलता है।
  • साधक को पुण्य और आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है।
  • मोक्ष की ओर आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।

बिल्वाष्टकम् की पाठ विधि

  1. सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. पूजा स्थान पर भगवान शिव या शिवलिंग के सामने बैठें।
  3. शिवलिंग पर स्वच्छ जल या गंगाजल अर्पित करें।
  4. बिल्वपत्र को साफ जल से धोकर भगवान शिव को चढ़ाएं।
  5. बिल्वपत्र साफ, कोमल और अधिक कटा-फटा नहीं होना चाहिए।
  6. प्रत्येक श्लोक पढ़ने के बाद एक बिल्वपत्र अर्पित किया जा सकता है।
  7. यदि बिल्वपत्र उपलब्ध न हो, तो मन में बिल्वपत्र अर्पित करने की भावना रखते हुए पाठ करें।
  8. पाठ के बाद “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का कम से कम 11 बार जाप करें।
  9. अंत में भगवान शिव से अपने और परिवार के कल्याण की प्रार्थना करें।

बिल्वपत्र अर्पित करते समय ध्यान रखने योग्य बातें

  • सामान्यतः तीन पत्तियों वाला बिल्वपत्र अर्पित करना शुभ माना जाता है।
  • बिल्वपत्र स्वच्छ और अखंड होना चाहिए।
  • सूखा, गला हुआ या कीड़ों द्वारा खाया गया पत्र अर्पित न करें।
  • बिल्वपत्र चढ़ाते समय डंठल अपनी ओर और पत्तियों का अग्रभाग शिवलिंग की ओर रखने की परंपरा भी प्रचलित है।
  • पूजा करते समय मन में श्रद्धा और भगवान शिव के प्रति समर्पण होना सबसे महत्वपूर्ण है।

पाठ करने का शुभ समय

बिल्वाष्टकम् का पाठ प्रतिदिन किया जा सकता है। सोमवार, प्रदोष व्रत, मासिक शिवरात्रि, महाशिवरात्रि और सावन के महीने में इसका पाठ विशेष शुभ माना जाता है। प्रातःकाल शिवलिंग पर जल और बिल्वपत्र अर्पित करते समय इसका पाठ करना उत्तम माना गया है।

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