सनातन वाणी • भक्ति, ज्ञान और शास्त्रीय पाठ
08 Sep 2026
Sanatan Vani आधुनिक रूप में सनातन ज्ञान
स्तोत्र संग्रह

गणेश अथर्वशीर्ष

श्री गणेश अथर्वशीर्ष का संपूर्ण संस्कृत पाठ पढ़ें। भगवान गणपति को समर्पित इस पवित्र पाठ में गणेश गायत्री मंत्र, ध्यान मंत्र, फलश्रुति और शांति पाठ सम्मिलित हैं। इसका श्रद्धापूर्वक पाठ बुद्धि, सुख-समृद्धि और विघ्नों से मुक्ति प्रदान करता है।

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श्री गणेश अथर्वशीर्ष

शान्ति पाठ

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः।
व्यशेम देवहितं यदायुः॥

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

श्री गणपति अथर्वशीर्ष पाठ

हरिः ॐ॥

ॐ नमस्ते गणपतये।
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि।
त्वमेव केवलं कर्तासि।
त्वमेव केवलं धर्तासि।
त्वमेव केवलं हर्तासि।
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि।
त्वं साक्षादात्मासि नित्यम्॥१॥

ऋतं वच्मि।
सत्यं वच्मि।
अव त्वं माम्।
अव वक्तारम्।
अव श्रोतारम्।
अव दातारम्।
अव धातारम्।
अवानूचानमव शिष्यम्।
अव पश्चात्तात्।
अव पुरस्तात्।
अवोत्तरात्तात्।
अव दक्षिणात्तात्।
अव चोर्ध्वात्तात्।
अवाधरात्तात्।
सर्वतो मां पाहि पाहि समन्तात्॥२॥

त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः।
त्वमानन्दमयस्त्वं ब्रह्ममयः।
त्वं सच्चिदानन्दाद्वितीयोऽसि।
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि॥३॥

सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते।
सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।
सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति।
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः।
त्वं चत्वारि वाक्पदानि॥४॥

त्वं गुणत्रयातीतः।
त्वमवस्थात्रयातीतः।
त्वं देहत्रयातीतः।
त्वं कालत्रयातीतः।
त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम्।
त्वं शक्तित्रयात्मकः।
त्वां योगिनो ध्यायन्ति नित्यम्।
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वमिन्द्रस्त्वमग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चन्द्रमास्त्वं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम्॥५॥

गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिंस्तदनन्तरम्।
अनुस्वारः परतरः।
अर्धेन्दुलसितम्।
तारेण ऋद्धम्।
एतत्तव मनुस्वरूपम्।
गकारः पूर्वरूपम्।
अकारो मध्यमरूपम्।
अनुस्वारश्चान्त्यरूपम्।
बिन्दुरुत्तररूपम्।
नादः सन्धानम्।
संहिता सन्धिः।
सैषा गणेशविद्या।
गणक ऋषिः।
निचृद्गायत्री छन्दः।
श्रीमहागणपतिर्देवता।
ॐ गं गणपतये नमः॥६॥

गणेश गायत्री मंत्र

एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥७॥

श्री गणेश ध्यान

एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमङ्कुशधारिणम्।
रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम्॥

रक्तं लम्बोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्।
रक्तगन्धानुलिप्ताङ्गं रक्तपुष्पैः सुपूजितम्॥

भक्तानुकम्पिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्।
आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम्॥

एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः॥८॥

गणेश नमस्कार मंत्र

नमो व्रातपतये।
नमो गणपतये।
नमः प्रमथपतये।
नमस्तेऽस्तु लम्बोदरायैकदन्ताय विघ्नविनाशिने शिवसुताय श्रीवरदमूर्तये नमः॥९॥

फलश्रुति

एतदथर्वशीर्षं योऽधीते।
स ब्रह्मभूयाय कल्पते।
स सर्वविघ्नैर्न बाध्यते।
स सर्वतः सुखमेधते।
स पञ्चमहापापात् प्रमुच्यते॥

सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति।
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति।
सायं प्रातः प्रयुञ्जानोऽपापो भवति।
सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति।
धर्मार्थकाममोक्षं च विन्दति॥

इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम्।
यो यदि मोहाद् दास्यति स पापीयान् भवति।
सहस्रावर्तनाद्यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत्॥१०॥

अनेन गणपतिमभिषिञ्चति स वाग्मी भवति।
चतुर्थ्यामनश्नन् जपति स विद्यावान् भवति।
इत्यथर्वणवाक्यम्।
ब्रह्माद्यावरणं विद्यात्।
न बिभेति कदाचनेति॥११॥

यो दूर्वाङ्कुरैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति।
यो लाजैर्यजति स यशोवान् भवति।
स मेधावान् भवति।
यो मोदकसहस्रेण यजति स वाञ्छितफलमवाप्नोति।
यः साज्यसमिद्भिर्यजति स सर्वं लभते।
स सर्वं लभते॥१२॥

अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति।
सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासन्निधौ वा जप्त्वा सिद्धमन्त्रो भवति।
महाविघ्नात् प्रमुच्यते।
महादोषात् प्रमुच्यते।
महापापात् प्रमुच्यते।
महाप्रत्यवायात् प्रमुच्यते।
स सर्वविद्भवति।
स सर्वविद्भवति।
य एवं वेद॥

इत्युपनिषत्॥१३॥

समापन शान्ति पाठ

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः।
व्यशेम देवहितं यदायुः॥

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

॥ इति श्रीगणपत्यथर्वशीर्षोपनिषत् सम्पूर्णम् ॥



शान्ति पाठ का अर्थ

हे देवताओं! हम अपने कानों से कल्याणकारी वचन सुनें। अपनी आँखों से शुभ और मंगलमय दृश्य देखें। हमारा शरीर और सभी अंग स्वस्थ एवं मजबूत बने रहें। हम ईश्वर की स्तुति करते हुए धर्ममय जीवन व्यतीत करें।

महान यश वाले इन्द्र हमारा कल्याण करें। संसार का ज्ञान रखने वाले सूर्यदेव हमारा कल्याण करें। सभी संकटों से रक्षा करने वाले गरुड़ हमारा कल्याण करें और देवगुरु बृहस्पति हमें सुख एवं कल्याण प्रदान करें।

हमारे जीवन में आध्यात्मिक, दैविक और भौतिक—तीनों प्रकार की शान्ति बनी रहे।

श्री गणपति अथर्वशीर्ष का हिंदी अर्थ

मंत्र 1 का अर्थ

हे भगवान गणपति! आपको नमस्कार है।

आप ही हमारे सामने दिखाई देने वाले परम सत्य हैं। आप ही इस संसार के रचयिता हैं, आप ही इसका पालन करने वाले हैं और आप ही इसका संहार करने वाले हैं।

यह सम्पूर्ण संसार वास्तव में आपका ही स्वरूप है। आप ही सदैव विद्यमान रहने वाली प्रत्यक्ष आत्मा और परम ब्रह्म हैं।

मंत्र 2 का अर्थ

मैं धर्म और सत्य के अनुसार वचन बोलता हूँ। मैं केवल सत्य ही बोलता हूँ।

हे गणपति! आप मेरी रक्षा कीजिए। बोलने वाले की रक्षा कीजिए और सुनने वाले की भी रक्षा कीजिए। ज्ञान देने वाले गुरु और ज्ञान को धारण करने वाले की रक्षा कीजिए। अध्ययन करने वाले तथा शिष्य की रक्षा कीजिए।

मेरे पीछे से, सामने से, उत्तर दिशा से, दक्षिण दिशा से, ऊपर से और नीचे से मेरी रक्षा कीजिए। सभी दिशाओं और प्रत्येक परिस्थिति में मेरी रक्षा कीजिए।

मंत्र 3 का अर्थ

हे गणपति! आप वाणी के स्वरूप हैं और आप ही शुद्ध चेतना हैं। आप आनन्द और ब्रह्म के स्वरूप हैं।

आप सत्, चित् और आनन्द से परिपूर्ण अद्वितीय परमात्मा हैं। आप प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं। आप ज्ञान तथा विज्ञान के स्वरूप हैं।

मंत्र 4 का अर्थ

यह सम्पूर्ण संसार आपसे ही उत्पन्न होता है। यह संसार आपके सहारे ही स्थित रहता है और अन्त में आपमें ही विलीन हो जाता है। यह सम्पूर्ण जगत बार-बार आपमें ही लौट आता है।

आप ही पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—इन पाँचों तत्त्वों के स्वरूप हैं। परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी—वाणी के ये चारों रूप भी आप ही हैं।

मंत्र 5 का अर्थ

आप सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणों से परे हैं। आप जाग्रत, स्वप्न और गहरी निद्रा—इन तीनों अवस्थाओं से परे हैं। आप स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीनों शरीरों से भी परे हैं।

आप भूतकाल, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालों से परे हैं। आप सदैव मूलाधार चक्र में स्थित रहते हैं। इच्छा, ज्ञान और क्रिया—इन तीनों शक्तियों के मूल स्वरूप आप ही हैं।

योगीजन सदैव आपका ध्यान करते हैं। आप ही ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, अग्नि, वायु, सूर्य और चन्द्रमा हैं। पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग सहित सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त परम ब्रह्म भी आप ही हैं।

मंत्र 6 का अर्थ

सबसे पहले ‘ग’ वर्ण का उच्चारण किया जाता है। उसके बाद ‘अ’ वर्ण आता है और फिर अनुस्वार ‘म्’ का उच्चारण होता है। इसके ऊपर अर्धचन्द्र के समान चिह्न और बिन्दु स्थित है। इसका उच्चारण नाद के साथ किया जाता है।

इस प्रकार ‘गं’ भगवान गणेश का बीज मंत्र बनता है। इसमें ‘ग’ इसका पहला रूप, ‘अ’ मध्य रूप और अनुस्वार अन्तिम रूप है। बिन्दु इसका ऊपरी रूप और नाद इन सभी को जोड़ने वाला है।

यही भगवान गणेश की पवित्र विद्या है। इस मंत्र के ऋषि गणक हैं, इसका छन्द निचृद् गायत्री है और इसके देवता श्री महागणपति हैं।

बीज मंत्र: ॐ गं गणपतये नमः।

इसका सरल अर्थ है—हे भगवान गणपति! मैं आपको नमस्कार करता हूँ।

गणेश गायत्री मंत्र का अर्थ

हम एकदन्त भगवान गणेश को जानते और उनका ध्यान करते हैं। हम घुमावदार सूँड़ वाले वक्रतुण्ड भगवान का चिन्तन करते हैं। वे दन्ती भगवान हमारी बुद्धि को शुभ मार्ग पर चलने की प्रेरणा दें।

श्री गणेश ध्यान का अर्थ

भगवान गणेश का एक दाँत और चार हाथ हैं। उन्होंने अपने हाथों में पाश और अंकुश धारण किया हुआ है। उनके अन्य हाथ में टूटा हुआ दाँत है और एक हाथ वरदान देने की मुद्रा में है। उनके ध्वज पर मूषक का चिह्न है।

उनका रंग लाल है, पेट बड़ा है और कान सूप के समान हैं। वे लाल वस्त्र पहनते हैं। उनके शरीर पर लाल चन्दन का लेप किया गया है और लाल फूलों से उनकी पूजा की जाती है।

वे अपने भक्तों पर करुणा करने वाले, संसार की उत्पत्ति के कारण और कभी नष्ट न होने वाले देवता हैं। वे सृष्टि के आरम्भ से ही प्रकट हुए हैं और प्रकृति तथा पुरुष से भी परे हैं।

जो व्यक्ति प्रतिदिन इस प्रकार भगवान गणेश का ध्यान करता है, वह श्रेष्ठ योगियों में स्थान प्राप्त करता है।

गणेश नमस्कार मंत्र का अर्थ

गणों और समूहों के स्वामी आपको नमस्कार है। गणपति आपको नमस्कार है। भगवान शिव के गणों के स्वामी आपको नमस्कार है।

हे लम्बोदर! हे एकदन्त! हे समस्त विघ्नों का नाश करने वाले भगवान शिव के पुत्र! हे वरदान देने वाले मंगलमय गणेश! आपको बार-बार नमस्कार है।

गणेश अथर्वशीर्ष की फलश्रुति का हिंदी अर्थ

फलश्रुति मंत्र 1 का अर्थ

जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करता है, वह ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने के योग्य बनता है। उसे विघ्न और बाधाएँ परेशान नहीं करतीं तथा उसके जीवन में सुख एवं कल्याण बढ़ता है। वह पाँच प्रकार के महापापों से मुक्त होता है।

शाम के समय इसका पाठ करने से दिन में किए गए पापों का नाश होता है और सुबह पाठ करने से रात में किए गए पापों का नाश होता है। जो व्यक्ति सुबह और शाम इसका पाठ करता है, वह पापों से मुक्त होता है।

प्रत्येक स्थान पर इसका पाठ करने वाला विघ्नों से सुरक्षित रहता है। वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों को प्राप्त करता है।

यह पवित्र ज्ञान ऐसे व्यक्ति को नहीं देना चाहिए जो इसका सम्मान न करता हो अथवा इसके योग्य न हो। जो व्यक्ति मोह या लापरवाही के कारण इसे अयोग्य व्यक्ति को देता है, वह पाप का भागी बनता है।

किसी विशेष मनोकामना के लिए इसका एक हजार बार पाठ करने से वह मनोकामना पूर्ण होती है।

फलश्रुति मंत्र 2 का अर्थ

इस अथर्वशीर्ष का पाठ करते हुए भगवान गणपति का अभिषेक करने वाला व्यक्ति प्रभावशाली वक्ता बनता है।

जो चतुर्थी के दिन उपवास रखकर इसका जप करता है, वह ज्ञानवान और विद्यावान बनता है। ऐसा अथर्ववेद का कथन है।

इस विद्या के वास्तविक स्वरूप और साधना को जानने वाला व्यक्ति किसी भी प्रकार के भय से विचलित नहीं होता।

फलश्रुति मंत्र 3 का अर्थ

जो व्यक्ति दूर्वा की कोपलों से भगवान गणेश की पूजा करता है, वह कुबेर के समान धनवान और समृद्ध होता है।

जो लाजा अर्थात् धान की खील से पूजा करता है, वह यशस्वी और बुद्धिमान बनता है।

जो एक हजार मोदकों से भगवान गणेश की पूजा करता है, उसे मनचाहा फल प्राप्त होता है।

जो घी और समिधा से हवन करता है, उसे सभी प्रकार के शुभ फल प्राप्त होते हैं।

फलश्रुति मंत्र 4 का अर्थ

जो व्यक्ति आठ ब्राह्मणों अथवा योग्य विद्वानों को गणेश अथर्वशीर्ष का विधिपूर्वक ज्ञान कराता है, वह सूर्य के समान तेजस्वी बनता है।

सूर्यग्रहण के समय, किसी पवित्र महानदी के तट पर अथवा भगवान गणेश की प्रतिमा के सामने इसका जप करने से मंत्र सिद्ध होता है।

फलश्रुति के अनुसार, इसके प्रभाव से मनुष्य बड़े विघ्नों, दोषों, पापों और अनिष्टकारी परिणामों से मुक्त होता है। वह समस्त ज्ञान को समझने योग्य बनता है। जो इस रहस्य को जानता है, वह सच्चा ज्ञानी बन जाता है।

इस प्रकार यह पवित्र गणपति उपनिषद पूर्ण होता है।

समापन शान्ति पाठ का अर्थ

हे देवताओं! हम अपने कानों से कल्याणकारी वचन सुनें और अपनी आँखों से शुभ दृश्य देखें। हमारा शरीर स्वस्थ और मजबूत रहे तथा हम ईश्वर की आराधना करते हुए अपनी पूर्ण आयु व्यतीत करें।

इन्द्र, सूर्यदेव, गरुड़ और देवगुरु बृहस्पति हमारा कल्याण करें। हमारे जीवन में आध्यात्मिक, दैविक और भौतिक—तीनों प्रकार की शान्ति बनी रहे।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।

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