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09 Sep 2026
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स्तोत्र संग्रह

हनुमान वडवानल स्तोत्र

हनुमान वडवानल स्तोत्र संपूर्ण पाठ

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॥ श्री हनुमद् वडवानल स्तोत्रम् ॥

विनियोग

ॐ अस्य श्रीहनुमद्वडवानलस्तोत्रमन्त्रस्य श्रीरामचन्द्र ऋषिः, श्रीहनुमान् वडवानलदेवता, ह्रां बीजम्, ह्रीं शक्तिः, सौं कीलकम्। मम समस्तविघ्नदोषनिवारणार्थे, सर्वशत्रुक्षयार्थे, सकलराजकुलसम्मोहनार्थे, मम समस्तरोगप्रशमनार्थम्, आयुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्ध्यर्थं, समस्तपापक्षयार्थं, श्रीसीतारामचन्द्रप्रीत्यर्थं च हनुमद्वडवानलस्तोत्रजपमहं करिष्ये।

ध्यानम्

मनोजवं मारुततुल्यवेगं
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं
श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥

मूल स्तोत्र

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्रीमहाहनुमते प्रकटपराक्रम सकलदिङ्मण्डलयशोवितानधवलीकृतजगत्त्रितय वज्रदेह रुद्रावतार लङ्कापुरीदहन उमाअर्गलमन्त्र उदधिबन्धन दशशिरःकृतान्तक सीताश्वसन वायुपुत्र अञ्जनीगर्भसम्भूत श्रीरामलक्ष्मणानन्दकर कपिसैन्यप्राकार सुग्रीवसाह्यकरण पर्वतोत्पाटन कुमारब्रह्मचारिन् गम्भीरनाद सर्वपापग्रहवारण सर्वज्वरोच्चाटन डाकिनीशाकिनीविध्वंसन।

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महावीरवीराय सर्वदुःखनिवारणाय ग्रहमण्डल सर्वभूतमण्डल सर्वपिशाचमण्डलोच्चाटन भूतज्वर एकाहिकज्वर द्व्याहिकज्वर त्र्याहिकज्वर चातुर्थिकज्वर सन्तापज्वर विषमज्वर तापज्वर माहेश्वरवैष्णवज्वरान् छिन्धि छिन्धि। यक्षब्रह्मराक्षसभूतप्रेतपिशाचान् उच्चाटय उच्चाटय स्वाहा॥

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्रीमहाहनुमते।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः।
आं हां हां हां हां।
ॐ सौं एहि एहि एहि।
ॐ हं ॐ हं ॐ हं ॐ हं।

ॐ नमो भगवते श्रीमहाहनुमते श्रवणचक्षुर्भूतानां शाकिनीडाकिनीनां विषमदुष्टानां सर्वविषं हर हर। आकाशभुवनं भेदय भेदय, छेदय छेदय, मारय मारय, शोषय शोषय, मोहय मोहय, ज्वालय ज्वालय, प्रहारय प्रहारय, सकलमायां भेदय भेदय स्वाहा॥

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्रीमहाहनुमते सर्वग्रहोच्चाटन परबलं क्षोभय क्षोभय, सकलबन्धनमोक्षणं कुरु कुरु, शिरःशूल गुल्मशूल सर्वशूलान् निर्मूलय निर्मूलय। नागपाशानन्तवासुकितक्षककर्कोटककालियान्, यक्षकुलजगत्-रात्रिञ्चर-दिवाचर-सर्पान् निर्विषं कुरु कुरु स्वाहा॥

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्रीमहाहनुमते राजभय चोरभय परमन्त्र परयन्त्र परतन्त्र परविद्याश्छेदय छेदय। सर्वशत्रून् नाशय नाशय। असाध्यं साधय साधय। हुं फट् स्वाहा॥

॥ इति विभीषणकृतं श्रीहनुमद्वडवानलस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

हनुमान वडवानल स्तोत्र का सरल हिंदी भावार्थ

विनियोग का अर्थ

इस स्तोत्र के ऋषि भगवान श्रीराम माने गए हैं और इसके देवता वडवानल स्वरूप श्रीहनुमान हैं। ‘ह्रां’ इसका बीज, ‘ह्रीं’ इसकी शक्ति और ‘सौं’ कीलक है।

साधक अपने जीवन के विघ्नों और दोषों की शान्ति, शत्रुरूपी बाधाओं के नाश, रोगों से राहत की प्रार्थना, आयु, आरोग्य और ऐश्वर्य की वृद्धि, पापों के क्षय तथा माता सीता और भगवान श्रीराम की प्रसन्नता के लिए इस स्तोत्र का पाठ करने का संकल्प लेता है।

ध्यान मंत्र का अर्थ

मैं उन श्रीहनुमान की शरण ग्रहण करता हूँ, जो मन के समान तीव्र और वायु के समान वेगवान हैं। जिन्होंने अपनी इन्द्रियों को वश में किया हुआ है और जो बुद्धिमानों में सबसे श्रेष्ठ हैं। वे पवनदेव के पुत्र, वानर सेना के प्रमुख तथा भगवान श्रीराम के परम सेवक और दूत हैं।

प्रथम भाग का अर्थ

मैं महान हनुमान जी को नमस्कार करता हूँ, जिनका पराक्रम सम्पूर्ण संसार में प्रकट है। जिनकी कीर्ति से सभी दिशाएँ प्रकाशित हैं और जिनका शरीर वज्र के समान शक्तिशाली है।

वे भगवान रुद्र के अवतार माने जाते हैं। उन्होंने लंका को जलाया, समुद्र पार किया, रावण के अन्त में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और निराश माता सीता को भगवान श्रीराम का संदेश देकर आश्वस्त किया।

वे पवनदेव के पुत्र और माता अंजनी के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं। उन्होंने भगवान श्रीराम और लक्ष्मण को आनन्द प्रदान किया, वानर सेना की रक्षा की और सुग्रीव की सहायता की।

उन्होंने युद्ध के समय पर्वत उठाया। वे ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले और गम्भीर गर्जना करने वाले हैं। उनसे सभी पापों, प्रतिकूल ग्रहों, ज्वर और नकारात्मक शक्तियों को दूर करने की प्रार्थना की गई है।

द्वितीय भाग का अर्थ

हे महावीर हनुमान! आपको नमस्कार है। आप भक्तों के सभी दुःख दूर करने वाले हैं। इस भाग में ग्रहों, नकारात्मक शक्तियों, भय और मानसिक अशान्ति को दूर करने की प्रार्थना की गई है।

एक दिन, दो दिन, तीन दिन अथवा कई दिनों तक रहने वाले विभिन्न प्रकार के ज्वर और कष्टों को समाप्त करने की प्रार्थना की गई है। यक्ष, ब्रह्मराक्षस, भूत, प्रेत और पिशाच जैसी भय उत्पन्न करने वाली शक्तियों को दूर करने के लिए हनुमान जी का आह्वान किया गया है।

यहाँ आए “छिन्धि-छिन्धि” का भाव बाधाओं और दुःखों को काटकर समाप्त करना है तथा “उच्चाटय-उच्चाटय” का अर्थ हानिकारक प्रभावों को दूर करना है।

बीज मंत्रों का भाव

ह्रां, ह्रीं, ह्रूं, ह्रैं, ह्रौं, ह्रः, सौं और हं हनुमान जी की शक्ति का आह्वान करने वाले बीजाक्षर हैं। बीज मंत्रों का सामान्य वाक्यों की तरह सीधा शाब्दिक अनुवाद नहीं किया जाता। परम्परा में इनका जप हनुमान जी के तेज, साहस, सुरक्षा और आध्यात्मिक शक्ति का स्मरण करने के लिए किया जाता है।

“एहि एहि एहि” का भाव है—हे हनुमान जी! आइए, प्रकट होकर मेरी रक्षा कीजिए और मेरी प्रार्थना स्वीकार कीजिए।

तृतीय भाग का अर्थ

हे महाहनुमान! आप मनुष्य के कानों, आँखों और मन को प्रभावित करने वाली नकारात्मक शक्तियों से उसकी रक्षा कीजिए। डाकिनी, शाकिनी, दुष्ट प्रवृत्तियों और सभी प्रकार के विषैले प्रभावों को दूर कीजिए।

भक्त के जीवन को घेरने वाली नकारात्मकता, भ्रम, छल और माया को भेदकर नष्ट कीजिए। सभी बुरे प्रभावों को सुखाकर, जलाकर और समाप्त करके भक्त की रक्षा कीजिए।

यहाँ प्रयुक्त “मारय-मारय” और “प्रहारय-प्रहारय” का भाव किसी मनुष्य को नुकसान पहुँचाना नहीं, बल्कि जीवन के भीतर और बाहर उपस्थित बुराइयों, भय, रोगरूपी कष्टों और नकारात्मक प्रभावों को समाप्त करना है।

चतुर्थ भाग का अर्थ

हे महाहनुमान! सभी प्रतिकूल ग्रहों के प्रभाव को दूर कीजिए और विरोधी शक्तियों को कमजोर कीजिए। सभी प्रकार के बन्धनों और रुकावटों से मुक्ति प्रदान कीजिए।

सिरदर्द, पेट के कष्ट और शरीर की दूसरी पीड़ाओं से राहत प्रदान करने की प्रार्थना की गई है। अनन्त, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक और कालिय जैसे नागों तथा अन्य विषैले जीवों के विष को प्रभावहीन करने की प्रार्थना की गई है।

इसका भाव भगवान हनुमान से शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक संकटों से सुरक्षा माँगना है।

पंचम भाग का अर्थ

हे महाहनुमान! राजा, शासन, चोर तथा अन्य प्रकार के भय से मेरी रक्षा कीजिए। दूसरों द्वारा किए गए हानिकारक मंत्र, यंत्र, तंत्र अथवा नकारात्मक प्रयोगों के प्रभाव को नष्ट कीजिए।

सभी शत्रुरूपी बाधाओं का नाश कीजिए और जो कार्य अत्यन्त कठिन या असम्भव दिखाई देता है, उसे अपनी कृपा से सम्भव बनाइए।

“हुं फट् स्वाहा” का भाव है—सभी बाधाओं और नकारात्मक प्रभावों का तत्काल नाश हो तथा यह प्रार्थना दिव्य शक्ति को समर्पित हो।

हनुमान वडवानल स्तोत्र क्या है?

हनुमान वडवानल स्तोत्र एक मंत्रात्मक संस्कृत स्तोत्र है, जिसे परम्परा में रावण के छोटे भाई और भगवान श्रीराम के भक्त विभीषण द्वारा रचित माना जाता है।

वडवानल का अर्थ समुद्र के भीतर स्थित प्रचण्ड अग्नि से है। इस नाम के माध्यम से हनुमान जी के उस अत्यन्त तेजस्वी और शक्तिशाली स्वरूप का स्मरण किया गया है, जो बड़े से बड़े संकट, भय और नकारात्मकता को नष्ट करने में समर्थ है।

इस स्तोत्र में हनुमान जी के पराक्रम, ब्रह्मचर्य, वज्र के समान शरीर, लंका दहन, समुद्र पार करने, माता सीता को धैर्य देने और भगवान श्रीराम की सहायता करने वाली लीलाओं का स्मरण किया गया है।

हनुमान वडवानल स्तोत्र के लाभ

  • भय और नकारात्मक विचारों से मुक्ति की प्रार्थना के लिए इसका पाठ किया जाता है।
  • मन में साहस, आत्मविश्वास और दृढ़ता उत्पन्न होती है।
  • जीवन की कठिन बाधाओं को दूर करने के लिए हनुमान जी से प्रार्थना की जाती है।
  • शत्रु, चोरी और शासन से संबंधित भय की शान्ति के लिए इसका पाठ किया जाता है।
  • ग्रहों के प्रतिकूल प्रभावों से रक्षा की कामना की जाती है।
  • बुरे स्वप्न और अनजाने भय से शान्ति प्राप्त करने के लिए इसका पाठ किया जाता है।
  • कठिन और असम्भव लगने वाले कार्यों में सफलता के लिए प्रार्थना की जाती है।
  • भगवान श्रीराम और हनुमान जी के प्रति श्रद्धा तथा भक्ति मजबूत होती है।

इस स्तोत्र में रोग और विष से राहत की प्रार्थनाएँ भी आती हैं, लेकिन किसी बीमारी, विष या आपात स्थिति में इसका पाठ चिकित्सा का विकल्प नहीं है। ऐसी परिस्थिति में तत्काल योग्य चिकित्सक की सहायता लेना आवश्यक है।

हनुमान वडवानल स्तोत्र की पाठ विधि

  1. मंगलवार या शनिवार को प्रातः अथवा सायंकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
  2. पूजा स्थान में भगवान श्रीराम, माता सीता और हनुमान जी का चित्र स्थापित करें।
  3. हनुमान जी के सामने घी या चमेली के तेल का दीपक जलाएँ।
  4. लाल फूल, सिंदूर, गुड़-चना अथवा बूंदी के लड्डू अर्पित करें।
  5. सबसे पहले भगवान गणेश और श्रीराम का स्मरण करें।
  6. इसके बाद विनियोग और ध्यान मंत्र पढ़ें।
  7. फिर स्पष्ट उच्चारण और एकाग्र मन से पूरा वडवानल स्तोत्र पढ़ें।
  8. पाठ पूरा होने पर हनुमान चालीसा अथवा श्रीराम नाम का जप किया जा सकता है।
  9. अन्त में अपनी भूलों के लिए क्षमा माँगते हुए सभी के कल्याण की प्रार्थना करें।

पाठ करते समय जरूरी सावधानी

हनुमान वडवानल स्तोत्र में अनेक बीज मंत्र और मंत्रात्मक आदेश हैं। सामान्य भक्त इसे श्रद्धापूर्वक पाठ के रूप में पढ़ सकते हैं, लेकिन किसी विशेष अनुष्ठान, निश्चित संख्या के पुरश्चरण अथवा तांत्रिक प्रयोग के लिए योग्य गुरु या विद्वान का मार्गदर्शन लेना उचित है।a

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