सनातन वाणी • भक्ति, ज्ञान और शास्त्रीय पाठ
09 Sep 2026
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स्तोत्र संग्रह

चंद्रशेखर अष्टकम्

चंद्रशेखर अष्टकम् भगवान शिव की स्तुति में ऋषि मार्कण्डेय द्वारा रचित माना जाता है। इसमें भगवान चंद्रशेखर की शरण लेकर मृत्यु के भय से रक्षा की प्रार्थना की गई है।

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चंद्रशेखर अष्टकम् – मूल संस्कृत पाठ

चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर पाहि माम्।
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्ष माम्॥१॥

रत्नसानुशरासनं रजताद्रिशृङ्गनिकेतनं
शिञ्जिनीकृतपन्नगेश्वरमच्युतानलसायकम्।
क्षिप्रदग्धपुरत्रयं त्रिदिवालयैरभिवन्दितं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥२॥

पञ्चपादपपुष्पगन्धपदाम्बुजद्वयशोभितं
फाललोचनजातपावकदग्धमन्मथविग्रहम्।
भस्मदिग्धकलेबरं भवनाशनं भवमव्ययं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥३॥

मत्तवारणमुख्यचर्मकृतोत्तरीयमनोहरं
पङ्कजासनपद्मलोचनपूजिताङ्घ्रिसरोरुहम्।
देवसिन्धुतरङ्गशीकरसिक्तशुभ्रजटाधरं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥४॥

यक्षराजसखं भगाक्षहरं भुजङ्गविभूषणं
शैलराजसुतापरिष्कृतचारुवामकलेबरम्।
क्ष्वेडनीलगलं परश्वथधारिणं मृगधारिणं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥५॥

कुण्डलीकृतकुण्डलेश्वरकुण्डलं वृषवाहनं
नारदादिमुनीश्वरस्तुतवैभवं भुवनेश्वरम्।
अन्धकान्तकमाश्रितामरपादपं शमनान्तकं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥६॥

भेषजं भवरोगिणामखिलापदामपहारिणं
दक्षयज्ञविनाशनं त्रिगुणात्मकं त्रिविलोचनम्।
भुक्तिमुक्तिफलप्रदं सकलाघसङ्घनिबर्हणं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥७॥

भक्तवत्सलमर्चितं निधिमक्षयं हरिदम्बरं
सर्वभूतपतिं परात्परमप्रमेयमनुत्तमम्।
सोमवारुणभूहुताशनसोमपानिलखाकृतिं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥८॥

विश्वसृष्टिविधायिनं पुनरेव पालनतत्परं
संहरन्तमपि प्रपञ्चमशेषलोकनिवासिनम्।
क्रीडयन्तमहर्निशं गणनाथयूथसमन्वितं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥९॥

फलश्रुति

मृत्युभीतमृकण्डुसूनुकृतस्तवं शिवसन्निधौ
यत्र कुत्र च यः पठेन्न हि तस्य मृत्युभयं भवेत्।
पूर्णमायुररोगतामखिलार्थसम्पदमादरं
चन्द्रशेखर एव तस्य ददाति मुक्तिमयत्नतः॥१०॥

अतिरिक्त प्रचलित श्लोक

संसारसर्पदष्टानां जन्तूनामविवेकिनाम्।
चन्द्रशेखरपादाब्जस्मरणं परमौषधम्॥

॥ इति मार्कण्डेयकृतं श्रीचन्द्रशेखराष्टकम् ॥



चंद्रशेखर अष्टकम् का सरल हिंदी अर्थ

प्रारंभिक प्रार्थना का अर्थ:
हे मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाले भगवान शिव! मेरी रक्षा कीजिए। हे चंद्रशेखर! मुझे सभी प्रकार के भय और संकटों से बचाइए।

दूसरे श्लोक का अर्थ:
भगवान शिव रत्नों से सुशोभित पर्वत को धनुष के समान धारण करते हैं और कैलाश पर्वत की चोटी पर निवास करते हैं। नागराज उनके धनुष की डोरी हैं तथा भगवान विष्णु और अग्नि उनके बाण के रूप में स्थित हैं। उन्होंने क्षणभर में तीनों पुरियों का विनाश किया और देवताओं ने उनकी वंदना की। जब मैंने ऐसे भगवान चंद्रशेखर की शरण ले ली है, तब यमराज मेरा क्या कर सकते हैं?

तीसरे श्लोक का अर्थ:
भगवान शिव के दोनों चरण कमलों की शोभा दिव्य वृक्षों के सुगंधित पुष्पों से बढ़ रही है। उन्होंने अपने तीसरे नेत्र से निकली अग्नि द्वारा कामदेव के शरीर को भस्म कर दिया था। उनका शरीर पवित्र भस्म से सुशोभित है। वे संसार के बंधनों का नाश करने वाले और स्वयं अविनाशी हैं। जब मैं भगवान चंद्रशेखर की शरण में हूं, तब यमराज मेरा क्या कर सकते हैं?

चौथे श्लोक का अर्थ:
भगवान शिव ने मदमस्त हाथी की खाल को अपने ऊपरी वस्त्र के रूप में धारण किया है। ब्रह्माजी और कमलनयन भगवान विष्णु उनके चरण कमलों की पूजा करते हैं। उनकी उज्ज्वल जटाएं देवनदी गंगा की लहरों के जलकणों से भीगी हुई हैं। जब मैंने ऐसे भगवान चंद्रशेखर का आश्रय लिया है, तब यमराज मेरा क्या कर सकते हैं?

पांचवें श्लोक का अर्थ:
भगवान शिव धन के स्वामी कुबेर के मित्र हैं। उन्होंने भग देवता की आंखों का नाश किया और सर्पों को आभूषण के रूप में धारण किया है। पर्वतराज हिमालय की पुत्री माता पार्वती उनके सुंदर वाम भाग में विराजमान हैं। विष पीने के कारण उनका कंठ नीला है तथा वे हाथों में फरसा और मृग धारण करते हैं। जब मैं चंद्रशेखर की शरण में हूं, तब यमराज मेरा क्या कर सकते हैं?

छठे श्लोक का अर्थ:
भगवान शिव सर्पराज को कुंडल के रूप में धारण करते हैं और नंदी बैल उनका वाहन है। नारद आदि महान ऋषि उनके दिव्य वैभव की स्तुति करते हैं। वे संपूर्ण संसार के स्वामी, अंधकासुर का अंत करने वाले और शरण में आए देवताओं के लिए कल्पवृक्ष के समान हैं। वे स्वयं मृत्यु के देवता यम का भी अंत करने में समर्थ हैं। उनकी शरण में रहने पर यमराज मेरा क्या कर सकते हैं?

सातवें श्लोक का अर्थ:
भगवान शिव संसाररूपी रोग से पीड़ित प्राणियों की औषधि हैं और सभी विपत्तियों को दूर करने वाले हैं। उन्होंने दक्ष के यज्ञ का विनाश किया था। वे तीनों गुणों के आधार और तीन नेत्रों वाले हैं। वे भक्तों को सांसारिक सुख और मोक्ष प्रदान करते हैं तथा समस्त पापों का नाश करते हैं। जब मैं चंद्रशेखर की शरण में हूं, तब यमराज मेरा क्या कर सकते हैं?

आठवें श्लोक का अर्थ:
भगवान शिव अपने भक्तों से प्रेम करने वाले और सभी के द्वारा पूजित हैं। वे कभी समाप्त न होने वाले दिव्य वैभव के भंडार हैं। वे सभी प्राणियों के स्वामी, श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ, समझ और माप से परे तथा सबसे उत्तम हैं। चंद्रमा, जल, पृथ्वी, अग्नि, वायु और आकाश सहित संपूर्ण जगत उन्हीं के स्वरूप में स्थित है। जब मैं भगवान चंद्रशेखर की शरण में हूं, तब यमराज मेरा क्या कर सकते हैं?

नौवें श्लोक का अर्थ:
भगवान शिव संपूर्ण विश्व की रचना करने वाले, उसका पालन करने वाले और समय आने पर उसका संहार करने वाले हैं। वे सभी लोकों और प्राणियों में निवास करते हैं। वे गणों के स्वामी भगवान गणेश और अपने गणों के साथ दिन-रात दिव्य लीला करते हैं। जब मैंने भगवान चंद्रशेखर की शरण ग्रहण कर ली है, तब यमराज मेरा क्या कर सकते हैं?

फलश्रुति का हिंदी अर्थ

मृत्यु के भय से व्याकुल मृकण्डु ऋषि के पुत्र मार्कण्डेय ने भगवान शिव के सामने इस स्तोत्र की रचना और स्तुति की थी। जो मनुष्य इसे श्रद्धापूर्वक पढ़ता है, उसे मृत्यु का भय नहीं रहता। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान चंद्रशेखर उसे पूर्ण आयु, आरोग्य, आवश्यक सुख-संपदा और अंत में सहज मुक्ति प्रदान करते हैं।

अतिरिक्त श्लोक का हिंदी अर्थ

संसाररूपी सर्प के डसने से पीड़ित और सही-गलत का ज्ञान न रखने वाले प्राणियों के लिए भगवान चंद्रशेखर के चरण कमलों का स्मरण सबसे उत्तम औषधि है।

चंद्रशेखर अष्टकम् का परिचय

चंद्रशेखर अष्टकम् भगवान शिव को समर्पित एक प्रसिद्ध संस्कृत स्तोत्र है। इसकी रचना ऋषि मार्कण्डेय द्वारा की गई मानी जाती है। चंद्रशेखर का अर्थ है—मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाले भगवान शिव।

पौराणिक कथा के अनुसार ऋषि मार्कण्डेय की आयु केवल सोलह वर्ष निश्चित थी। जब यमराज उनके प्राण लेने आए, तब मार्कण्डेय शिवलिंग से लिपटकर भगवान शिव की आराधना करने लगे। भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने अपने भक्त की रक्षा की। इसलिए इस स्तोत्र में बार-बार कहा गया है—जब मैंने भगवान चंद्रशेखर की शरण ले ली है, तब यमराज मेरा क्या कर सकते हैं?

चंद्रशेखर अष्टकम् का महत्व

इस स्तोत्र में भगवान शिव के दिव्य स्वरूप, उनके अस्त्रों, आभूषणों, कैलाश निवास, गंगाधर स्वरूप, नीलकंठ रूप और त्रिपुरासुर-विनाश जैसी लीलाओं का वर्णन किया गया है।

इसका मुख्य संदेश यह है कि भगवान शिव की शरण में रहने वाले भक्त को मृत्यु सहित किसी भी भय से घबराने की आवश्यकता नहीं है। यहां मृत्यु पर विजय का भाव केवल शारीरिक मृत्यु से नहीं, बल्कि भय, मोह, अज्ञान और संसार के बंधनों से मुक्ति से भी जुड़ा है।

चंद्रशेखर अष्टकम् के पाठ के लाभ

धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करने से:

  • मन में व्याप्त मृत्यु और अनिष्ट का भय कम होता है।
  • भगवान शिव के प्रति भक्ति और विश्वास बढ़ता है।
  • संकटों का सामना करने का आत्मबल प्राप्त होता है।
  • मन को शांति और सकारात्मकता मिलती है।
  • चिंता और नकारात्मक विचारों को शांत करने में सहायता मिलती है।
  • रोग के समय मानसिक शक्ति और धैर्य मिलता है।
  • भगवान शिव की कृपा और आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है।
  • जीवन के अंतिम लक्ष्य अर्थात मोक्ष की ओर बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।

चंद्रशेखर अष्टकम् की पाठ विधि

  1. प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. पूजा स्थान पर भगवान शिव या शिवलिंग के सामने बैठें।
  3. शिवलिंग पर स्वच्छ जल अर्पित करें।
  4. संभव हो तो बेलपत्र, सफेद फूल, धूप और दीप अर्पित करें।
  5. सबसे पहले “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का 11 बार जाप करें।
  6. इसके बाद चंद्रशेखर अष्टकम् का शांत मन से पाठ करें।
  7. प्रत्येक श्लोक के अंत में आने वाली पंक्ति को श्रद्धा से बोलें।
  8. पाठ पूरा होने पर भगवान शिव से अपनी भूलों के लिए क्षमा मांगें।
  9. अंत में अपनी और अपने परिवार की रक्षा तथा कल्याण की प्रार्थना करें।

पाठ करने का शुभ समय

चंद्रशेखर अष्टकम् का पाठ प्रतिदिन सुबह या शाम किया जा सकता है। सोमवार, प्रदोष व्रत, मासिक शिवरात्रि, महाशिवरात्रि और सावन के महीने में इसका पाठ विशेष शुभ माना जाता है। भय, बीमारी, मानसिक चिंता या कठिन परिस्थिति के समय भी श्रद्धापूर्वक इसका पाठ किया जा सकता है।

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