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09 Sep 2026
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स्तोत्र संग्रह

अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम्

माता लक्ष्मी के आठ दिव्य स्वरूपों को समर्पित अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम् का संपूर्ण संस्कृत पाठ और सरल हिंदी अर्थ पढ़ें। इसमें आदिलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, धैर्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, सन्तानलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, विद्यालक्ष्मी और धनलक्ष्मी की स्तुति की गई है।

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॥ श्री अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम् ॥

१. आदिलक्ष्मी

सुमनसवन्दितसुन्दरि माधवि चन्द्रसहोदरि हेममये।
मुनिगणमण्डितमोक्षप्रदायिनि मञ्जुलभाषिणि वेदनुते॥

पङ्कजवासिनि देवसुपूजित सद्गुणवर्षिणि शान्तियुते।
जय जय हे मधुसूदनकामिनि आदिलक्ष्मि सदा पालय माम्॥१॥

२. धान्यलक्ष्मी

अयि कलिकल्मषनाशिनि कामिनि वैदिकरूपिणि वेदमये।
क्षीरसमुद्भवमङ्गलरूपिणि मन्त्रनिवासिनि मन्त्रनुते॥

मङ्गलदायिनि अम्बुजवासिनि देवगणाश्रितपादयुते।
जय जय हे मधुसूदनकामिनि धान्यलक्ष्मि सदा पालय माम्॥२॥

३. धैर्यलक्ष्मी

जयवरवर्णिनि वैष्णवि भार्गवि मन्त्रस्वरूपिणि मन्त्रमये।
सुरगणपूजितशीघ्रफलप्रद ज्ञानविकासिनि शास्त्रनुते॥

भवभयहारिणि पापविमोचनि साधुजनाश्रितपादयुते।
जय जय हे मधुसूदनकामिनि धैर्यलक्ष्मि सदा पालय माम्॥३॥

४. गजलक्ष्मी

जय जय दुर्गतिनाशिनि कामिनि सर्वफलप्रदशास्त्रमये।
रथगजतुरगपदातिसमावृत परिजनमण्डितलोकनुते॥

हरिहरब्रह्मसुपूजितसेवित तापनिवारिणि पादयुते।
जय जय हे मधुसूदनकामिनि गजलक्ष्मि रूपेण पालय माम्॥४॥

५. सन्तानलक्ष्मी

अयि खगवाहिनि मोहिनि चक्रिणि रागविवर्धिनि ज्ञानमये।
गुणगणवारिधि लोकहितैषिणि स्वरसप्तभूषितगाननुते॥

सकलसुरासुरदेवमुनीश्वरमानववन्दितपादयुते।
जय जय हे मधुसूदनकामिनि सन्तानलक्ष्मि सदा पालय माम्॥५॥

६. विजयलक्ष्मी

जय कमलासनि सद्गतिदायिनि ज्ञानविकासिनि गानमये।
अनुदिनमर्चितकुङ्कुमधूसरभूषितवासितवाद्यनुते॥

कनकधरास्तुतिवैभववन्दित शङ्करदेशिकमान्यपदे।
जय जय हे मधुसूदनकामिनि विजयलक्ष्मि सदा पालय माम्॥६॥

७. विद्यालक्ष्मी

प्रणतसुरेश्वरि भारति भार्गवि शोकविनाशिनि रत्नमये।
मणिमयभूषितकर्णविभूषण शान्तिसमावृतहास्यमुखे॥

नवनिधिदायिनि कलिमलहारिणि कामितफलप्रदहस्तयुते।
जय जय हे मधुसूदनकामिनि विद्यालक्ष्मि सदा पालय माम्॥७॥

८. धनलक्ष्मी

धिमिधिमि धिंधिमि धिंधिमि धिंधिमि दुन्दुभिनादसुपूर्णमये।
घुमघुम घुङ्घुम घुङ्घुम घुङ्घुम शङ्खनिनादसुवाद्यनुते॥

वेदपुराणेतिहाससुपूजित वैदिकमार्गप्रदर्शयुते।
जय जय हे मधुसूदनकामिनि धनलक्ष्मि रूपेण पालय माम्॥८॥

॥ इति श्री अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम् का सरल हिंदी अर्थ

१. आदिलक्ष्मी का हिंदी अर्थ

हे आदिलक्ष्मी! अच्छे और पवित्र मन वाले भक्त आपकी वन्दना करते हैं। आप अत्यन्त सुन्दर, भगवान विष्णु की प्रिय और चन्द्रमा की बहन के समान समुद्र से प्रकट होने वाली स्वर्णमयी देवी हैं।

ऋषि-मुनि आपकी पूजा करते हैं। आप मोक्ष प्रदान करने वाली, मधुर वाणी बोलने वाली और वेदों द्वारा स्तुति की जाने वाली हैं।

आप कमल में निवास करती हैं और सभी देवता आपकी पूजा करते हैं। आप सद्गुणों की वर्षा करने वाली तथा शान्ति से परिपूर्ण हैं।

हे मधुसूदन भगवान विष्णु की प्रिय आदिलक्ष्मी! आपकी जय हो। आप सदैव मेरी रक्षा कीजिए।

२. धान्यलक्ष्मी का हिंदी अर्थ

हे धान्यलक्ष्मी! आप कलियुग के पापों और बुरे प्रभावों को नष्ट करने वाली हैं। आप सबके द्वारा चाही जाने वाली, वेदों का स्वरूप और वैदिक ज्ञान से परिपूर्ण हैं।

आप क्षीरसागर से प्रकट हुई हैं और आपका स्वरूप मंगलमय है। आप पवित्र मंत्रों में निवास करती हैं तथा मंत्रों द्वारा आपकी स्तुति की जाती है।

आप सभी को शुभता प्रदान करती हैं और कमल में निवास करती हैं। आपके चरणों का आश्रय देवता भी ग्रहण करते हैं।

हे मधुसूदन भगवान विष्णु की प्रिय धान्यलक्ष्मी! आपकी जय हो। आप सदैव मेरी रक्षा कीजिए।

३. धैर्यलक्ष्मी का हिंदी अर्थ

हे धैर्यलक्ष्मी! आप श्रेष्ठ स्वरूप वाली, भगवान विष्णु की शक्ति और महर्षि भृगु की पुत्री हैं। आप मंत्रों का स्वरूप और मंत्रों की दिव्य शक्ति से परिपूर्ण हैं।

देवता आपकी पूजा करते हैं। आप अपने भक्तों को शीघ्र फल प्रदान करती हैं, उनके ज्ञान का विकास करती हैं और शास्त्रों द्वारा आपकी स्तुति की जाती है।

आप संसार के भय को दूर करती हैं, पापों से मुक्ति प्रदान करती हैं और साधु-सन्त आपके चरणों का आश्रय लेते हैं।

हे मधुसूदन भगवान विष्णु की प्रिय धैर्यलक्ष्मी! आपकी जय हो। आप सदैव मेरी रक्षा कीजिए और मुझे साहस तथा धैर्य प्रदान कीजिए।

४. गजलक्ष्मी का हिंदी अर्थ

हे गजलक्ष्मी! आपकी जय हो। आप बुरे भाग्य और कठिन परिस्थितियों को दूर करने वाली तथा भक्तों को सभी प्रकार के शुभ फल देने वाली हैं। आप शास्त्रों के ज्ञान से परिपूर्ण हैं।

आपके साथ रथ, हाथी, घोड़े, पैदल सैनिक और सेवकों का विशाल समूह रहता है। सम्पूर्ण संसार आपकी महिमा की स्तुति करता है।

भगवान विष्णु, भगवान शिव और ब्रह्माजी भी आपकी पूजा तथा सेवा करते हैं। आपके चरणों की शरण मनुष्य के शारीरिक और मानसिक कष्टों को दूर करने वाली है।

हे मधुसूदन भगवान विष्णु की प्रिय गजलक्ष्मी! आपकी जय हो। आप अपने गजलक्ष्मी स्वरूप में मेरी रक्षा कीजिए।

५. सन्तानलक्ष्मी का हिंदी अर्थ

हे सन्तानलक्ष्मी! आप आकाश में विचरण करने वाले दिव्य वाहन पर विराजमान हैं। आप मन को आकर्षित करने वाली, चक्र धारण करने वाली और ज्ञान से परिपूर्ण हैं। आप जीवन में प्रेम और आनन्द का विस्तार करती हैं।

आप अनन्त गुणों का सागर हैं और सम्पूर्ण संसार का कल्याण चाहती हैं। सातों स्वरों से सजे मधुर गीतों द्वारा आपकी स्तुति की जाती है।

सभी देवता, दैत्य, ऋषि-मुनि और मनुष्य आपके चरणों की वन्दना करते हैं।

हे मधुसूदन भगवान विष्णु की प्रिय सन्तानलक्ष्मी! आपकी जय हो। आप सदैव मेरी और मेरे परिवार की रक्षा कीजिए।

६. विजयलक्ष्मी का हिंदी अर्थ

हे विजयलक्ष्मी! आप कमल के आसन पर विराजमान हैं। आप सद्गति प्रदान करती हैं, ज्ञान का विकास करती हैं और मधुर संगीत का स्वरूप हैं।

भक्त प्रतिदिन कुमकुम से आपकी पूजा करते हैं। आप सुगन्धित वस्तुओं और सुंदर आभूषणों से सुशोभित रहती हैं। वाद्ययंत्रों के मधुर संगीत के साथ आपकी स्तुति की जाती है।

आदि शंकराचार्य द्वारा रचित कनकधारा स्तोत्र से आपकी महिमा की वन्दना की गई है। महान आचार्य शंकर ने भी आपके चरणों का सम्मान किया है।

हे मधुसूदन भगवान विष्णु की प्रिय विजयलक्ष्मी! आपकी जय हो। आप सदैव मेरी रक्षा कीजिए और मुझे धर्मपूर्ण कार्यों में विजय प्रदान कीजिए।

७. विद्यालक्ष्मी का हिंदी अर्थ

हे विद्यालक्ष्मी! देवताओं के स्वामी भी आपके सामने सिर झुकाते हैं। आप ज्ञान और वाणी का स्वरूप, महर्षि भृगु की पुत्री तथा सभी प्रकार के शोक को दूर करने वाली हैं।

आपका स्वरूप बहुमूल्य रत्नों के समान चमकता है। आपने मणियों से बने आभूषण और सुन्दर कर्णाभूषण धारण किए हैं। आपका मुस्कुराता हुआ मुख शान्ति से परिपूर्ण है।

आप नौ प्रकार की निधियाँ प्रदान करती हैं और कलियुग की बुराइयों को दूर करती हैं। आपके वरदायी हाथ भक्तों की उचित मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं।

हे मधुसूदन भगवान विष्णु की प्रिय विद्यालक्ष्मी! आपकी जय हो। आप सदैव मेरी रक्षा कीजिए और मुझे ज्ञान तथा सद्बुद्धि प्रदान कीजिए।

८. धनलक्ष्मी का हिंदी अर्थ

हे धनलक्ष्मी! आपके आगमन पर दुन्दुभि और नगाड़ों से ‘धिमि-धिमि’ की मंगलमय ध्वनि गूँजती है। आपका दिव्य स्वरूप इन शुभ ध्वनियों से परिपूर्ण है।

शंख और अन्य पवित्र वाद्ययंत्रों की मधुर ध्वनि के साथ आपकी स्तुति की जाती है।

वेदों, पुराणों और इतिहास ग्रंथों में आपकी महिमा का वर्णन और पूजन किया गया है। आप भक्तों को वैदिक तथा धर्मपूर्ण मार्ग दिखाने वाली हैं।

हे मधुसूदन भगवान विष्णु की प्रिय धनलक्ष्मी! आपकी जय हो। आप धनलक्ष्मी के रूप में मेरी रक्षा कीजिए और मुझे धर्मपूर्वक अर्जित धन तथा समृद्धि प्रदान कीजिए।

अष्टलक्ष्मी कौन हैं?

अष्टलक्ष्मी माता लक्ष्मी के आठ प्रमुख स्वरूपों का सामूहिक नाम है। ये आठ स्वरूप जीवन की अलग-अलग प्रकार की सम्पदाओं और आवश्यकताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनमें केवल आर्थिक धन ही नहीं, बल्कि ज्ञान, साहस, अन्न, सन्तान, विजय, आध्यात्मिक शक्ति और राजसी समृद्धि भी सम्मिलित हैं। अष्टलक्ष्मी के आठ स्वरूपों का संदर्भ

  1. आदिलक्ष्मी – आध्यात्मिक शक्ति और जीवन के मूल आधार की देवी।
  2. धान्यलक्ष्मी – अन्न, कृषि और पोषण प्रदान करने वाली देवी।
  3. धैर्यलक्ष्मी – साहस, धैर्य और मानसिक शक्ति प्रदान करने वाली देवी।
  4. गजलक्ष्मी – ऐश्वर्य, प्रतिष्ठा और राजसी समृद्धि की देवी।
  5. सन्तानलक्ष्मी – सन्तान और परिवार के कल्याण की देवी।
  6. विजयलक्ष्मी – शुभ कार्यों में सफलता और विजय प्रदान करने वाली देवी।
  7. विद्यालक्ष्मी – विद्या, ज्ञान, कला और बुद्धि प्रदान करने वाली देवी।
  8. धनलक्ष्मी – धन, वैभव और भौतिक समृद्धि प्रदान करने वाली देवी।

अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम् का महत्व

अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम् में मनुष्य के जीवन की आठ प्रकार की सम्पदाओं की कामना की गई है। यह स्तोत्र समझाता है कि समृद्धि का अर्थ केवल धन प्राप्त करना नहीं है। अन्न, स्वास्थ्य, ज्ञान, साहस, परिवार, सफलता, सम्मान और आध्यात्मिक शान्ति भी सच्ची सम्पदा हैं।

इस स्तोत्र के प्रत्येक भाग में माता लक्ष्मी के एक विशेष स्वरूप की स्तुति की गई है और उनसे भक्त की रक्षा करने की प्रार्थना की गई है।

अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम् के पाठ के लाभ

  • माता लक्ष्मी के आठों स्वरूपों की कृपा प्राप्त होने की धार्मिक मान्यता है।
  • जीवन में धन, अन्न और आवश्यक संसाधनों की वृद्धि के लिए इसका पाठ किया जाता है।
  • कठिन परिस्थितियों में साहस और धैर्य बनाए रखने की प्रेरणा मिलती है।
  • शिक्षा, ज्ञान और बुद्धि की प्राप्ति के लिए इसका पाठ शुभ माना जाता है।
  • परिवार और सन्तान के कल्याण की प्रार्थना की जाती है।
  • व्यापार, नौकरी और अन्य शुभ कार्यों में सफलता की कामना की जाती है।
  • घर में सुख, शान्ति और सकारात्मक वातावरण बढ़ता है।
  • आर्थिक समृद्धि के साथ धर्मपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा प्राप्त होती है।

अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम् की पाठ विधि

  1. प्रातःकाल अथवा सायंकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
  2. पूजा स्थान को साफ करके माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु का चित्र स्थापित करें।
  3. माता के सामने घी का दीपक और धूप जलाएँ।
  4. माता लक्ष्मी को कमल, लाल या गुलाबी फूल अर्पित करें।
  5. चावल, फल, खीर अथवा किसी मीठे पदार्थ का भोग लगाएँ।
  6. सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण करें।
  7. इसके बाद माता लक्ष्मी के आठों स्वरूपों का ध्यान करते हुए पूरा स्तोत्र पढ़ें।
  8. पाठ पूरा होने के बाद माता लक्ष्मी से परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।
  9. अन्त में माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की आरती करें।

अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम् का पाठ कब करें?

अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम् का पाठ किसी भी दिन किया जा सकता है। शुक्रवार, पूर्णिमा, दीपावली, धनतेरस, शरद पूर्णिमा और वरलक्ष्मी व्रत के अवसर पर इसका पाठ विशेष शुभ माना जाता है।

नियमित पाठ के लिए सुबह या शाम का शान्त समय अच्छा रहता है। पाठ करते समय शब्दों का स्पष्ट उच्चारण और मन में श्रद्धा रखना सबसे महत्वपूर्ण है।

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