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09 Sep 2026
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स्तोत्र संग्रह

शिव रक्षा स्तोत्रम्

शिव रक्षा स्तोत्रम् महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा कथित भगवान सदाशिव का दिव्य रक्षा-कवच है। यहां इसका संपूर्ण संस्कृत पाठ, सरल हिंदी अर्थ, महत्व, लाभ और पाठ-विधि पढ़ें।

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शिव रक्षा स्तोत्रम् का संपूर्ण संस्कृत पाठ

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥

विनियोग

अस्य श्रीशिवरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य याज्ञवल्क्य ऋषिः ।
श्रीसदाशिवो देवता । अनुष्टुप् छन्दः ।
श्रीसदाशिवप्रीत्यर्थं शिवरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः ॥

स्तोत्र पाठ

चरितं देवदेवस्य महादेवस्य पावनम् ।
अपारं परमोदारं चतुर्वर्गस्य साधनम् ॥ १ ॥

गौरीविनायकोपेतं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रकम् ।
शिवं ध्यात्वा दशभुजं शिवरक्षां पठेन्नरः ॥ २ ॥

गङ्गाधरः शिरः पातु फालमर्धेन्दुशेखरः ।
नयने मदनध्वंसी कर्णौ सर्पविभूषणः ॥ ३ ॥

घ्राणं पातु पुरारातिर्मुखं पातु जगत्पतिः ।
जिह्वां वागीश्वरः पातु कन्धरां शितिकन्धरः ॥ ४ ॥

श्रीकण्ठः पातु मे कण्ठं स्कन्धौ विश्वधुरन्धरः ।
भुजौ भूभारसंहर्ता करौ पातु पिनाकधृक् ॥ ५ ॥

हृदयं शङ्करः पातु जठरं गिरिजापतिः ।
नाभिं मृत्युञ्जयः पातु कटिं व्याघ्राजिनाम्बरः ॥ ६ ॥

सक्थिनी पातु दीनार्तशरणागतवत्सलः ।
ऊरू महेश्वरः पातु जानुनी जगदीश्वरः ॥ ७ ॥

जङ्घे पातु जगत्कर्ता गुल्फौ पातु गणाधिपः ।
चरणौ करुणासिन्धुः सर्वाङ्गानि सदाशिवः ॥ ८ ॥

एतां शिवबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत् ।
स भुक्त्वा सकलान् कामान् शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥ ९ ॥

ग्रहभूतपिशाचाद्यास्त्रैलोक्ये विचरन्ति ये ।
दूरादाशु पलायन्ते शिवनामाभिरक्षणात् ॥ १० ॥

अभयङ्करनामेदं कवचं पार्वतीपतेः ।
भक्त्या बिभर्ति यः कण्ठे तस्य वश्यं जगत्त्रयम् ॥ ११ ॥

इमां नारायणः स्वप्ने शिवरक्षां यथाऽदिशत् ।
प्रातरुत्थाय योगीन्द्रो याज्ञवल्क्यस्तथाऽलिखत् ॥ १२ ॥

॥ इति श्रीयाज्ञवल्क्यप्रोक्तं शिवरक्षास्तोत्रम् अथवा अभयङ्करकवचं सम्पूर्णम् ॥



शिव रक्षा स्तोत्रम् का सरल हिंदी अर्थ

विनियोग का अर्थ

इस शिव रक्षा स्तोत्र मंत्र के ऋषि महर्षि याज्ञवल्क्य हैं, इसके आराध्य देव भगवान सदाशिव हैं और इसका छन्द अनुष्टुप् है। भगवान सदाशिव की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए शिव रक्षा स्तोत्र के पाठ का संकल्प किया जाता है।

श्लोक 1 का अर्थ

देवों के देव महादेव का यह परम पवित्र चरित्र अत्यंत महान और असीम फल देने वाला है। यह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का साधन है।

श्लोक 2 का अर्थ

मनुष्य को माता गौरी और भगवान गणेश के साथ विराजमान, पांच मुख, तीन नेत्र और दस भुजाओं वाले भगवान शिव का ध्यान करके शिव रक्षा स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।

श्लोक 3 का अर्थ

गंगा को धारण करने वाले भगवान शिव मेरे सिर की रक्षा करें। मस्तक पर अर्धचंद्र धारण करने वाले मेरे ललाट की रक्षा करें। कामदेव का नाश करने वाले मेरे नेत्रों तथा सर्पों को आभूषण के रूप में धारण करने वाले भगवान मेरे कानों की रक्षा करें।

श्लोक 4 का अर्थ

त्रिपुरासुर के शत्रु भगवान शिव मेरी नाक की रक्षा करें। जगत के स्वामी मेरे मुख की रक्षा करें। वाणी के अधिपति मेरी जीभ और नीलकण्ठ भगवान शिव मेरे गले की रक्षा करें।

श्लोक 5 का अर्थ

श्रीकण्ठ भगवान मेरे कण्ठ की रक्षा करें। संपूर्ण विश्व का भार संभालने वाले मेरे कंधों की रक्षा करें। पृथ्वी का भार दूर करने वाले मेरी भुजाओं तथा पिनाक धनुष धारण करने वाले भगवान शिव मेरे हाथों की रक्षा करें।

श्लोक 6 का अर्थ

कल्याण करने वाले भगवान शंकर मेरे हृदय की रक्षा करें। माता पार्वती के पति मेरे पेट की रक्षा करें। मृत्यु पर विजय प्राप्त करने वाले भगवान मृत्युञ्जय मेरी नाभि और बाघ की खाल धारण करने वाले शिव मेरी कमर की रक्षा करें।

श्लोक 7 का अर्थ

दीन-दुःखी और शरण में आए हुए भक्तों से प्रेम करने वाले भगवान शिव मेरे कूल्हों की रक्षा करें। महेश्वर मेरी जांघों और संपूर्ण संसार के स्वामी मेरे घुटनों की रक्षा करें।

श्लोक 8 का अर्थ

संसार की रचना करने वाले भगवान शिव मेरी पिंडलियों की रक्षा करें। गणों के अधिपति मेरे टखनों की रक्षा करें। करुणा के सागर मेरे चरणों तथा भगवान सदाशिव मेरे संपूर्ण शरीर की रक्षा करें।

श्लोक 9 का अर्थ

जो पुण्यात्मा मनुष्य भगवान शिव की शक्ति से युक्त इस रक्षा स्तोत्र का पाठ करता है, वह जीवन में अपनी उचित इच्छाओं और सुखों को प्राप्त करके अंत में भगवान शिव के सायुज्य अर्थात उनके परम धाम को प्राप्त करता है।

श्लोक 10 का अर्थ

इस स्तोत्र की फलश्रुति के अनुसार तीनों लोकों में विचरण करने वाले ग्रहों, भूतों और पिशाचों आदि के नकारात्मक प्रभाव भगवान शिव के नाम से प्राप्त रक्षा के कारण दूर से ही भाग जाते हैं।

श्लोक 11 का अर्थ

माता पार्वती के पति भगवान शिव के इस कवच का नाम “अभयङ्कर कवच” है। जो व्यक्ति इसे श्रद्धापूर्वक धारण करता अथवा नियमित रूप से इसका पाठ करता है, उसके लिए तीनों लोक अनुकूल हो जाते हैं।

श्लोक 12 का अर्थ

भगवान नारायण ने स्वप्न में महर्षि याज्ञवल्क्य को इस शिव रक्षा स्तोत्र का उपदेश दिया था। प्रातःकाल उठकर योगियों में श्रेष्ठ महर्षि याज्ञवल्क्य ने इसे उसी प्रकार लिख दिया।

शिव रक्षा स्तोत्रम् का परिचय

शिव रक्षा स्तोत्रम् भगवान सदाशिव को समर्पित एक रक्षा-कवच है। इसे “अभयङ्कर कवचम्” के नाम से भी जाना जाता है। स्तोत्र में भगवान शिव के अलग-अलग नामों और स्वरूपों का स्मरण करते हुए सिर से लेकर चरणों तक शरीर के प्रत्येक अंग की रक्षा की प्रार्थना की गई है।

परंपरा के अनुसार भगवान नारायण ने महर्षि याज्ञवल्क्य को स्वप्न में इसका उपदेश दिया था। प्रातःकाल जागने के बाद महर्षि याज्ञवल्क्य ने इसे लिखकर भक्तों के कल्याण के लिए प्रस्तुत किया।

शिव रक्षा स्तोत्रम् का महत्व

यह स्तोत्र भगवान शिव को गंगाधर, अर्धेन्दुशेखर, मदनध्वंसी, वागीश्वर, नीलकण्ठ, श्रीकण्ठ, मृत्युञ्जय और सदाशिव जैसे नामों से संबोधित करता है।

इन दिव्य नामों के माध्यम से भक्त अपने शरीर, मन और जीवन की रक्षा की प्रार्थना करता है। इसका उद्देश्य मन में भगवान शिव के प्रति विश्वास, निर्भयता और आध्यात्मिक सुरक्षा की भावना उत्पन्न करना है।

शिव रक्षा स्तोत्रम् के पाठ के लाभ

धार्मिक मान्यताओं और स्तोत्र की फलश्रुति के अनुसार:

  • भगवान सदाशिव की कृपा और रक्षा प्राप्त होती है।
  • भय तथा नकारात्मक विचारों को दूर करने की प्रेरणा मिलती है।
  • मन में साहस, विश्वास और आध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है।
  • विपरीत परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने में सहायता मिलती है।
  • भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों का स्मरण होता है।
  • धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के लिए प्रार्थना की जाती है।
  • भक्त को मानसिक शांति और सुरक्षा का अनुभव होता है।
  • फलश्रुति में शिव-सायुज्य की प्राप्ति का वर्णन मिलता है।

शिव रक्षा स्तोत्रम् की पाठ-विधि

पाठ से पहले

प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान पर भगवान शिव का चित्र अथवा शिवलिंग स्थापित करें। दीपक और धूप जलाकर भगवान गणेश, माता पार्वती तथा भगवान शिव का स्मरण करें।

पूजन सामग्री

शिवलिंग पर स्वच्छ जल अर्पित करें। इसके बाद बिल्वपत्र, सफेद पुष्प, अक्षत, चंदन और फल चढ़ाए जा सकते हैं।

संकल्प और पाठ

सबसे पहले विनियोग पढ़ें। इसके बाद भगवान शिव के पंचमुखी, त्रिनेत्रधारी और दशभुज स्वरूप का ध्यान करके संपूर्ण शिव रक्षा स्तोत्र का पाठ करें।

पाठ पूरा होने पर “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का 11 बार जाप करें और भगवान शिव से अपनी तथा परिवार की रक्षा एवं कल्याण की प्रार्थना करें।

शिव रक्षा स्तोत्र का पाठ कब करें?

शिव रक्षा स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त सोमवार, प्रदोष व्रत, मासिक शिवरात्रि, महाशिवरात्रि और श्रावण मास में इसका पाठ विशेष शुभ माना जाता है।

यात्रा पर जाने से पहले या मन में भय और असुरक्षा की भावना होने पर भी श्रद्धापूर्वक इसका पाठ किया जा सकता है।

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