सनातन वाणी • भक्ति, ज्ञान और शास्त्रीय पाठ
09 Sep 2026
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स्तोत्र संग्रह

श्री सरस्वती अष्टकम्

श्री सरस्वती अष्टकम् माता सरस्वती को समर्पित आठ श्लोकों का दिव्य स्तोत्र है। इसमें देवी से निर्मल ज्ञान की प्रार्थना और नियमित पाठ की फलश्रुति दी गई है।

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श्री सरस्वती अष्टकम् — मूल संस्कृत पाठ

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥

शतानीक उवाच

महामते महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद।
अक्षीणकर्मबन्धस्तु पुरुषो द्विजसत्तम॥१॥

मरणे यज्जपेज्जाप्यं यं च भावमनुस्मरन्।
परं पदमवाप्नोति तन्मे ब्रूहि महामुने॥२॥

शौनक उवाच

इदमेव महाराज पृष्टवांस्ते पितामहः।
भीष्मं धर्मविदां पृष्ठेदं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः॥३॥

युधिष्ठिर उवाच

पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद।
बृहस्पतिस्तुता देवी वागीशाय महात्मने।
आत्मानं दर्शयामास सूर्यकोटिसमप्रभम्॥४॥

सरस्वत्युवाच

वरं वृणीष्व भद्रं ते यत्ते मनसि वर्तते।

बृहस्पतिरुवाच

यदि मे वरदा देवि दिव्यज्ञानं प्रयच्छ मे॥५॥

देव्युवाच

हन्त ते निर्मलं ज्ञानं कुमतिध्वंसकारकम्।
स्तोत्रेणानेन ये भक्त्या मां स्तुवन्ति मनीषिणः॥६॥

बृहस्पतिरुवाच

लभते परमं ज्ञानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥७॥

सरस्वत्युवाच

त्रिसन्ध्यं प्रयतो नित्यं पठेदष्टकमुत्तमम्।
तस्य कण्ठे सदा वासं करिष्यामि न संशयः॥८॥

इति श्रीपद्मपुराणे दिव्यज्ञानप्रदायकं सरस्वत्यष्टकस्तोत्रं सम्पूर्णम्॥


श्री सरस्वती अष्टकम् का सरल हिंदी अर्थ

श्लोक 1 का अर्थ

राजा शतानीक ने महर्षि शौनक से कहा—हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! आप महान बुद्धिमान, अत्यंत ज्ञानी और सभी शास्त्रों के जानकार हैं। कृपया बताइए कि जो मनुष्य अभी कर्मों के बंधन से पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ है, उसके कल्याण का उपाय क्या है?

श्लोक 2 का अर्थ

हे महामुनि! मुझे वह जप और ध्यान बताइए, जिसका मृत्यु के समय स्मरण करने पर मनुष्य परम पद को प्राप्त कर सकता है।

श्लोक 3 का अर्थ

महर्षि शौनक ने कहा—हे महाराज! यही प्रश्न पहले आपके पितामह धर्मराज युधिष्ठिर ने धर्म का ज्ञान रखने वाले श्रेष्ठ पुरुष भीष्म पितामह से पूछा था।

श्लोक 4 का अर्थ

युधिष्ठिर ने कहा—हे पितामह! आप अत्यंत बुद्धिमान और सभी शास्त्रों के ज्ञाता हैं। महात्मा बृहस्पति की स्तुति से प्रसन्न होकर देवी सरस्वती ने करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी स्वरूप में उन्हें दर्शन दिए थे। कृपया उस पवित्र प्रसंग और स्तोत्र के विषय में मुझे बताइए।

श्लोक 5 का अर्थ

देवी सरस्वती ने बृहस्पति से कहा—तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे मन में जो इच्छा है, वह वरदान मांगो।

तब बृहस्पति ने कहा—हे वरदान देने वाली देवी! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो मुझे दिव्य ज्ञान प्रदान कीजिए।

श्लोक 6 का अर्थ

देवी सरस्वती ने कहा—मैं तुम्हें वह निर्मल ज्ञान प्रदान करती हूं जो गलत बुद्धि, भ्रम और अज्ञान को नष्ट करने वाला है। जो बुद्धिमान मनुष्य इस स्तोत्र द्वारा भक्तिपूर्वक मेरी स्तुति करते हैं, उन्हें भी निर्मल ज्ञान प्राप्त होता है।

श्लोक 7 का अर्थ

माता महामाया की कृपा से मनुष्य उस परम ज्ञान को प्राप्त करता है, जिसे प्राप्त करना देवताओं के लिए भी कठिन माना गया है।

श्लोक 8 का अर्थ

माता सरस्वती कहती हैं—जो मनुष्य पवित्र मन से प्रतिदिन तीनों संध्याओं में इस उत्तम अष्टकम् का पाठ करता है, मैं सदैव उसके कंठ अर्थात् उसकी वाणी में निवास करूंगी—इसमें कोई संदेह नहीं है।


सरस्वती अष्टकम् का परिचय

श्री सरस्वती अष्टकम् ज्ञान, बुद्धि और वाणी की अधिष्ठात्री देवी माता सरस्वती को समर्पित आठ श्लोकों का पौराणिक स्तोत्र है। यह पद्मपुराण से संबंधित बताया गया है।

इसमें राजा शतानीक और महर्षि शौनक के संवाद के माध्यम से धर्मराज युधिष्ठिर, भीष्म पितामह, देवगुरु बृहस्पति तथा माता सरस्वती से जुड़ा प्रसंग प्रस्तुत किया गया है।

देवगुरु बृहस्पति माता सरस्वती से सांसारिक वस्तु के स्थान पर दिव्य एवं निर्मल ज्ञान मांगते हैं। प्रसन्न होकर माता उन्हें ऐसा ज्ञान प्रदान करती हैं जो भ्रम, अज्ञान और कुमति को नष्ट करने वाला है।


सरस्वती अष्टकम् का महत्त्व

इस स्तोत्र का मुख्य संदेश है कि मनुष्य को माता सरस्वती से केवल सांसारिक सफलता नहीं, बल्कि विवेक, निर्मल बुद्धि और आत्मकल्याण प्रदान करने वाला दिव्य ज्ञान मांगना चाहिए।

अष्टकम् की फलश्रुति में माता सरस्वती स्वयं कहती हैं कि जो साधक इसका नियमित पाठ करता है, वे उसके कंठ में निवास करती हैं। इसका भाव है कि साधक की वाणी, विचार और ज्ञान पर देवी की कृपा बनी रहती है।


सरस्वती अष्टकम् के धार्मिक लाभ

धार्मिक मान्यताओं और स्तोत्र की फलश्रुति के अनुसार इसके नियमित पाठ से—

  • ज्ञान और विवेक के विकास की प्रेरणा मिलती है।
  • अज्ञान, भ्रम और नकारात्मक विचार दूर करने में सहायता मिलती है।
  • वाणी में स्पष्टता और मधुरता आती है।
  • पढ़ाई में एकाग्रता बनाए रखने में सहायता मिलती है।
  • स्मरणशक्ति और सीखने की क्षमता विकसित करने की प्रेरणा मिलती है।
  • विद्यार्थियों, शिक्षकों, लेखकों और कलाकारों को माता का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
  • आध्यात्मिक ज्ञान के प्रति रुचि बढ़ती है।
  • मनुष्य को अपने कर्म और जीवन के परम उद्देश्य पर विचार करने की प्रेरणा मिलती है।

सरस्वती अष्टकम् की पाठ-विधि

  1. प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. माता सरस्वती के चित्र या प्रतिमा के सामने बैठें।
  3. दीपक और धूप प्रज्वलित करें।
  4. माता को सफेद या पीले पुष्प अर्पित करें।
  5. सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण करें।
  6. माता के श्वेत, शांत और ज्ञानमय स्वरूप का ध्यान करें।
  7. आठों श्लोकों का स्पष्ट उच्चारण करते हुए पाठ करें।
  8. पाठ पूरा होने के बाद माता से ज्ञान, सद्बुद्धि और शुद्ध वाणी की प्रार्थना करें।

सरस्वती अष्टकम् का पाठ कब करें?

इस स्तोत्र की फलश्रुति में त्रिसन्ध्यं, अर्थात् प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल पाठ करने का उल्लेख मिलता है। सामान्य साधक अपनी सुविधा के अनुसार प्रतिदिन प्रातःकाल अथवा पढ़ाई शुरू करने से पहले भी इसका पाठ कर सकता है।

वसंत पंचमी, सरस्वती पूजा, विद्यारंभ संस्कार और परीक्षा से पहले इसका श्रद्धापूर्वक पाठ किया जाता है।


जरूरी पाठ-संबंधी टिप्पणी

“सरस्वती अष्टकम्” नाम से एक से अधिक संस्कृत रचनाएं उपलब्ध हैं। यहां “महामते महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद” से आरंभ होने वाला और पद्मपुराण से संबंधित सर्वाधिक प्रचलित पाठ दिया गया है।

तीसरे श्लोक में “पृष्ठेदं” पाठ मिलता है, जबकि कुछ प्रकाशनों में इसे अर्थ की स्पष्टता के लिए “श्रेष्ठं” अथवा अलग शब्द-विन्यास में छापा गया है। यहां संस्कृत स्रोत में प्राप्त पारंपरिक पाठ सुरक्षित रखा गया है।

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