शिव अपराध क्षमापना स्तोत्र
शिव अपराध क्षमापना स्तोत्र में भक्त अपने जीवन में जाने-अनजाने हुए अपराधों और पूजा में हुई भूलों के लिए भगवान शिव से क्षमा मांगता है। यह स्तोत्र मनुष्य को जीवन की नश्वरता समझाकर शिव-भक्ति की ओर प्रेरित करता है।
शिव अपराध क्षमापना स्तोत्र – मूल संस्कृत पाठ
॥ श्रीशिवापराधक्षमापणस्तोत्रम् ॥
आदौ कर्मप्रसङ्गात्कलयति कलुषं मातृकुक्षौ स्थितं मां
विण्मूत्रामेध्यमध्ये क्वथयति नितरां जाठरो जातवेदाः।
यद्यद्वै तत्र दुःखं व्यथयति नितरां शक्यते केन वक्तुं
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो॥१॥
बाल्ये दुःखातिरेको मललुलितवपुः स्तन्यपाने पिपासा
नो शक्तश्चेन्द्रियेभ्यो भवगुणजनिताः जन्तवो मां तुदन्ति।
नानारोगादिदुःखाद्रुदनपरवशः शङ्करं न स्मरामि
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो॥२॥
प्रौढोऽहं यौवनस्थो विषयविषधरैः पञ्चभिर्मर्मसन्धौ
दष्टो नष्टो विवेकः सुतधनयुवतिस्वादुसौख्ये निषण्णः।
शैवीचिन्ताविहीनं मम हृदयमहो मानगर्वाधिरूढं
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो॥३॥
वार्धक्ये चेन्द्रियाणां विकलगतिमतश्चाधिदैवादितापैः
प्राप्तै रोगैर्वियोगैर्व्यसनकृशतनोर्ज्ञप्तिहीनं च दीनम्।
मिथ्यामोहाभिलाषैर्भ्रमति मम मनो धूर्जटेर्ध्यानशून्यं
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो॥४॥
स्नात्वा प्रत्यूषकाले स्नपनविधिविधौ नाहृतं गाङ्गतोयं
पूजार्थं वा कदाचिद्बहुतरगहनेऽखण्डबिल्वीदलं वा।
नानीता पद्ममाला सरसि विकसिता गन्धपुष्पैस्त्वदर्थं
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो॥५॥
दुग्धैर्मध्वाज्ययुक्तैर्दधिगुडसहितैः स्नापितं नैव लिङ्गं
नो लिप्तं चन्दनाद्यैः कनकविरचितैः पूजितं न प्रसूनैः।
धूपैः कर्पूरदीपैर्विविधरसयुतैर्नैव भक्ष्योपहारैः
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो॥६॥
नो शक्यं स्मार्तकर्म प्रतिपदगहने प्रत्यवायाकुलाढ्ये
श्रौते वार्ता कथं मे द्विजकुलविहिते ब्रह्ममार्गानुसारे।
तत्त्वोऽज्ञाते विचारे श्रवणमननयोः किं निदिध्यासितव्यं
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो॥७॥
ध्यात्वा चित्ते शिवाख्यं प्रचुरतरधनं नैव दत्तं द्विजेभ्यो
हव्यं ते लक्षसङ्ख्यैर्हुतवहवदने नार्पितं बीजमन्त्रैः।
नो तप्तं गाङ्गतीरे व्रतजपनियमै रुद्रजाप्यं न जप्तं
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो॥८॥
नग्नो निःसङ्गशुद्धस्त्रिगुणविरहितो ध्वस्तमोहान्धकारो
नासाग्रन्यस्तदृष्टिर्विदितभवगुणो नैव दृष्टः कदाचित्।
उन्मन्यावस्थया त्वां विगतगतिमतिः शङ्करं न स्मरामि
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो॥९॥
स्थित्वा स्थाने सरोजे प्रणवमयमरुत्कुम्भिते सूक्ष्ममार्गे
शान्ते स्वान्ते प्रलीने प्रकटितविभवे दिव्यरूपे शिवाख्ये।
लिङ्गाग्रे ब्रह्मवाक्ये सकलतनुगतं शङ्करं न स्मरामि
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो॥१०॥
हृद्यं वेदान्तवेद्यं हृदयसरसिजे दीप्तमुद्यत्प्रकाशं
सत्यं शान्तस्वरूपं सकलमुनिमनःपद्मषण्डैकवेद्यम्।
जाग्रत्स्वप्ने सुषुप्तौ त्रिगुणविरहितं शङ्करं न स्मरामि
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो॥११॥
चन्द्रोद्भासितशेखरे स्मरहरे गङ्गाधरे शङ्करे
सर्पैर्भूषितकण्ठकर्णविवरे नेत्रोत्थवैश्वानरे।
दन्तित्वक्कृतसुन्दराम्बरधरे त्रैलोक्यसारे हरे
मोक्षार्थं कुरु चित्तवृत्तिममलामन्यैस्तु किं कर्मभिः॥१२॥
किं वाऽनेन धनेन वाजिकरिभिः प्राप्तेन राज्येन किं
किं वा पुत्रकलत्रमित्रपशुभिर्देहेन गेहेन किम्।
ज्ञात्वैतत्क्षणभङ्गुरं सपदि रे त्याज्यं मनो दूरतः
स्वात्मार्थं गुरुवाक्यतो भज मन श्रीपार्वतीवल्लभम्॥१३॥
पौरोहित्यं रजनिचरितं ग्रामणीत्वं नियोगो
माठापत्यं ह्यनृतवचनं साक्षिवादः परान्नम्।
ब्रह्मद्वेषः खलजनरतिः प्राणिनां निर्दयत्वं
मा भूदेवं मम पशुपते जन्मजन्मान्तरेषु॥१४॥
आयुर्नश्यति पश्यतां प्रतिदिनं याति क्षयं यौवनं
प्रत्यायान्ति गताः पुनर्न दिवसाः कालो जगद्भक्षकः।
लक्ष्मीस्तोयतरङ्गभङ्गचपला विद्युच्चलं जीवितं
तस्मान्मां शरणागतं करुणया त्वं रक्ष रक्षाधुना॥१५॥
॥ इति श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ श्रीशिवापराधक्षमापणस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
कुछ संस्करणों में मिलने वाले अतिरिक्त समापन श्लोक
वन्दे देवमुमापतिं सुरगुरुं वन्दे जगत्कारणं
वन्दे पन्नगभूषणं मृगधरं वन्दे पशूनां पतिम्।
वन्दे सूर्यशशाङ्कवह्निनयनं वन्दे मुकुन्दप्रियं
वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम्॥१६॥
गात्रं भस्मसितं सितं च हसितं हस्ते कपालं सितं
खट्वाङ्गं च सितं सितश्च वृषभः कर्णे सिते कुण्डले।
गङ्गा फेनसिता जटा पशुपतेश्चन्द्रः सितो मूर्धनि
सोऽयं सर्वसितो ददातु विभवं पापक्षयं सर्वदा॥१७॥
करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा
श्रवणनयनजं वा मानसं वाऽपराधम्।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व
शिव शिव करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो॥१८॥
शिव अपराध क्षमापना स्तोत्र का सरल हिंदी अर्थ
पहले श्लोक का अर्थ:
हे भगवान शिव! अपने पिछले कर्मों के कारण मैं माता के गर्भ में आया और वहां अत्यंत अपवित्र अवस्था में रहा। गर्भ की अग्नि से मुझे जो दुःख मिला, उसका पूरा वर्णन कौन कर सकता है? उस अवस्था में भी मैं आपका स्मरण नहीं कर पाया। हे महादेव शम्भु! मेरे इस अपराध को क्षमा कीजिए।
दूसरे श्लोक का अर्थ:
बचपन में मेरा शरीर असहाय और मल से लिपटा रहता था। मुझे दूध की भूख-प्यास लगती थी, लेकिन मैं कुछ कहने में समर्थ नहीं था। अनेक रोगों और पीड़ाओं के कारण मैं केवल रोता रहता था और आपका स्मरण नहीं कर पाया। हे शिव! मेरा अपराध क्षमा कीजिए।
तीसरे श्लोक का अर्थ:
युवावस्था में पांचों इंद्रियों के विषैले विषयों ने मेरे विवेक को नष्ट कर दिया। मैं संतान, धन, स्त्री और सांसारिक सुखों में डूब गया। मेरा हृदय आपके चिंतन से खाली होकर अहंकार और अभिमान से भर गया। हे महादेव! मेरे अपराधों को क्षमा कीजिए।
चौथे श्लोक का अर्थ:
बुढ़ापे में मेरी इंद्रियां और बुद्धि कमजोर हो गईं। रोग, वियोग और अनेक दुःखों से शरीर दुर्बल हो गया। फिर भी मेरा मन झूठे मोह और इच्छाओं में भटकता रहा तथा मैंने जटाधारी भगवान शिव का ध्यान नहीं किया। हे शम्भु! मुझे क्षमा कीजिए।
पांचवें श्लोक का अर्थ:
मैंने प्रातःकाल स्नान करके आपके अभिषेक के लिए गंगाजल नहीं लाया। घने वन से अखंड बिल्वपत्र नहीं लाया और तालाब में खिले कमल, सुगंधित पुष्प एवं अन्य पूजन सामग्री भी आपको अर्पित नहीं की। हे शिव! मेरी पूजा में हुई इस कमी को क्षमा कीजिए।
छठे श्लोक का अर्थ:
मैंने आपके शिवलिंग को दूध, शहद, घी, दही और गुड़ से स्नान नहीं कराया। चंदन का लेप, स्वर्ण के आभूषण और पुष्प अर्पित नहीं किए। धूप, कपूर का दीपक और विभिन्न प्रकार के भोग भी नहीं चढ़ाए। हे महादेव! मेरे इस अपराध को क्षमा कीजिए।
सातवें श्लोक का अर्थ:
मैं शास्त्रों में बताए गए कठिन कर्मकांडों को ठीक प्रकार से नहीं कर पाया। वैदिक कर्मों और ब्रह्मज्ञान के मार्ग को भी नहीं समझ सका। मैंने सत्य का विचार, आध्यात्मिक ज्ञान का श्रवण, मनन और गहरा ध्यान भी नहीं किया। हे भगवान शिव! मेरी भूलों को क्षमा कीजिए।
आठवें श्लोक का अर्थ:
मैंने अपने मन में आपका ध्यान करते हुए योग्य व्यक्तियों को पर्याप्त दान नहीं दिया। अग्नि में बीज मंत्रों के साथ अनेक आहुतियां नहीं दीं। गंगा के किनारे तप, व्रत, जप और नियमों का पालन नहीं किया तथा रुद्र मंत्रों का विधिपूर्वक जाप भी नहीं किया। हे शम्भु! मेरा अपराध क्षमा कीजिए।
नौवें श्लोक का अर्थ:
मैं आसक्ति से मुक्त, शुद्ध और तीनों गुणों से परे योगी नहीं बन पाया। मैंने मोह के अंधकार को नष्ट करके नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि स्थिर नहीं की और न ही ध्यान की उन्मनी अवस्था में आपको अनुभव किया। हे शंकर! ध्यान न करने के मेरे अपराध को क्षमा कीजिए।
दसवें श्लोक का अर्थ:
मैं कमलरूपी चक्र में बैठकर प्राणायाम द्वारा सूक्ष्म मार्ग में प्राण को स्थिर नहीं कर पाया। मन के शांत और विलीन होने पर प्रकट होने वाले आपके दिव्य प्रकाशमय स्वरूप का ध्यान भी नहीं किया। मैंने ब्रह्मवाक्यों द्वारा सभी शरीरों में स्थित शिव को नहीं पहचाना। हे महादेव! मुझे क्षमा कीजिए।
ग्यारहवें श्लोक का अर्थ:
भगवान शिव हृदय को प्रिय लगने वाले, वेदांत द्वारा जाने जाने वाले और हृदय-कमल में प्रकाशित होने वाले दिव्य प्रकाश हैं। वे सत्य और शांति का स्वरूप हैं तथा ऋषियों के निर्मल मन द्वारा अनुभव किए जाते हैं। जाग्रत, स्वप्न और गहरी नींद—तीनों अवस्थाओं में स्थित, फिर भी तीनों गुणों से परे शिव का मैंने स्मरण नहीं किया। हे शम्भु! मुझे क्षमा कीजिए।
बारहवें श्लोक का अर्थ:
हे मन! अपने विचारों को चंद्रमा धारण करने वाले, कामदेव का नाश करने वाले, गंगाधर और कल्याणकारी भगवान शिव में स्थिर कर। जिनका कंठ और कान सर्पों से सुशोभित हैं, जिनके तीसरे नेत्र से अग्नि प्रकट होती है और जिन्होंने हाथी की खाल का वस्त्र धारण किया है—मोक्ष के लिए उन्हीं का निर्मल ध्यान कर। अन्य कर्मों में भटकने से क्या लाभ?
तेरहवें श्लोक का अर्थ:
धन, घोड़े, हाथी और राज्य प्राप्त कर लेने से क्या लाभ? पुत्र, पत्नी, मित्र, पशु, शरीर और घर भी स्थायी नहीं हैं। यह सब क्षणभर में नष्ट होने वाला है। इसलिए हे मन! इनका मोह छोड़कर गुरु के उपदेश के अनुसार आत्मकल्याण के लिए माता पार्वती के प्रिय भगवान शिव की आराधना कर।
चौदहवें श्लोक का अर्थ:
हे पशुपति! जन्म-जन्मांतर में मेरे भीतर पद, धर्म अथवा अधिकार का दुरुपयोग, रात के अनुचित कर्म, दूसरों पर शासन करने का अहंकार, झूठ बोलना, झूठी गवाही देना, आध्यात्मिक ज्ञान से द्वेष, दुष्ट लोगों की संगति और प्राणियों के प्रति निर्दयता जैसे दोष कभी उत्पन्न न हों।
पंद्रहवें श्लोक का अर्थ:
हमारी आंखों के सामने प्रतिदिन आयु कम हो रही है और युवावस्था समाप्त होती जा रही है। बीते हुए दिन दोबारा लौटकर नहीं आते तथा काल संपूर्ण संसार को निगलने वाला है। धन पानी की लहर के समान चंचल और जीवन बिजली की चमक की तरह क्षणभंगुर है। इसलिए हे शरण देने वाले भगवान शिव! मैं आपकी शरण में आया हूं। कृपा करके अभी मेरी रक्षा कीजिए।
अतिरिक्त समापन श्लोकों का अर्थ
सोलहवें श्लोक का अर्थ:
मैं माता उमा के पति, देवताओं के गुरु और संसार की उत्पत्ति के कारण भगवान शिव की वंदना करता हूं। मैं सर्पों को आभूषण के रूप में धारण करने वाले, हाथ में मृग रखने वाले और सभी जीवों के स्वामी को प्रणाम करता हूं। सूर्य, चंद्रमा एवं अग्नि जिनके नेत्र हैं, जो भगवान विष्णु के प्रिय, भक्तों के आश्रय और वरदान देने वाले हैं—उन शिव-शंकर को प्रणाम है।
सत्रहवें श्लोक का अर्थ:
भगवान शिव का शरीर भस्म से श्वेत है और उनकी मुस्कान उज्ज्वल है। उनके हाथ का कपाल, खट्वांग, वाहन नंदी और कानों के कुंडल भी उज्ज्वल हैं। उनकी जटाओं में बहती गंगा का झाग सफेद है तथा मस्तक पर चंद्रमा चमक रहा है। ऐसे उज्ज्वल भगवान पशुपति हमें कल्याण प्रदान करें और हमारे पापों का नाश करें।
अठारहवें श्लोक का अर्थ:
मेरे हाथ-पैर, वाणी, शरीर या कर्मों से; कान, आंख अथवा मन से जो भी अपराध हुए हों तथा जो उचित या अनुचित कार्य किए गए हों—हे करुणा के सागर भगवान शिव, श्रीमहादेव शम्भु! उन सभी को क्षमा कीजिए।
शिव अपराध क्षमापना स्तोत्र का परिचय
शिव अपराध क्षमापना स्तोत्र को शिवापराधक्षमापणस्तोत्रम् और शिवापराधभञ्जनस्तोत्रम् भी कहा जाता है। इसकी रचना आदि शंकराचार्य द्वारा की गई मानी जाती है।
इसमें मनुष्य गर्भावस्था से लेकर बचपन, युवावस्था और बुढ़ापे तक अपने जीवन पर विचार करता है। वह स्वीकार करता है कि सांसारिक मोह, अहंकार, असावधानी या असमर्थता के कारण उसने भगवान शिव का उचित स्मरण और पूजन नहीं किया। इसलिए वह महादेव से क्षमा और शरण मांगता है।
अलग-अलग पुस्तकों में विशेष रूप से अंतिम श्लोकों और उनकी संख्या में कुछ पाठभेद मिलते हैं। कई प्रचलित संस्करण 15वें श्लोक पर समाप्त होते हैं, जबकि कुछ में तीन अतिरिक्त प्रार्थना-श्लोक भी पढ़े जाते हैं।
स्तोत्र का मुख्य संदेश
इस स्तोत्र का उद्देश्य केवल पूजा में हुई गलती के लिए क्षमा मांगना नहीं है। यह मनुष्य को अपने पूरे जीवन, कर्मों और व्यवहार का आत्मनिरीक्षण करने की प्रेरणा देता है।
इसका संदेश है कि धन, पद, परिवार, शरीर और युवावस्था स्थायी नहीं हैं। इसलिए अहंकार और मोह में जीवन बिताने के स्थान पर मनुष्य को करुणा, सत्य, भक्ति और आत्मज्ञान के मार्ग पर चलना चाहिए।
शिव अपराध क्षमापना स्तोत्र के लाभ
धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करने से:
- भगवान शिव के सामने अपनी भूल स्वीकार करने का भाव उत्पन्न होता है।
- मन में विनम्रता और पश्चात्ताप की भावना विकसित होती है।
- पूजा के दौरान हुई अनजानी गलतियों के लिए क्षमा मांगी जाती है।
- मन का अपराधबोध और मानसिक अशांति कम करने में सहायता मिलती है।
- अहंकार, मोह और सांसारिक आसक्ति से दूर रहने की प्रेरणा मिलती है।
- जीवन की नश्वरता और समय का महत्व समझ में आता है।
- सत्य, दया और धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प मजबूत होता है।
- भगवान शिव के प्रति भक्ति और समर्पण बढ़ता है।
पाठ करने की विधि
- स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- भगवान शिव या शिवलिंग के सामने शांत होकर बैठें।
- शिवलिंग पर स्वच्छ जल और बिल्वपत्र अर्पित करें।
- घी का दीपक और धूप जलाएं।
- सबसे पहले “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का 11 बार जाप करें।
- स्तोत्र का पाठ विनम्रता और क्षमा-भाव से करें।
- कठिन संस्कृत शब्दों का उच्चारण धीरे और सावधानी से करें।
- पाठ के अंत में अपनी ज्ञात-अज्ञात भूलों के लिए क्षमा मांगें।
- आगे अच्छे कर्म करने और किसी प्राणी के प्रति निर्दयी न होने का संकल्प लें।
- अंतिम क्षमा-प्रार्थना “करचरणकृतं…” भी पढ़ सकते हैं।
पाठ करने का शुभ समय
शिव अपराध क्षमापना स्तोत्र का पाठ शिव पूजा के अंत में किया जा सकता है। सोमवार, प्रदोष व्रत, मासिक शिवरात्रि, महाशिवरात्रि और सावन के महीने में इसका पाठ विशेष शुभ माना जाता है।
प्रतिदिन रात्रि में सोने से पहले भी दिनभर में हुई भूलों पर विचार करते हुए इसका पाठ किया जा सकता है। पाठ में जटिल कर्मकांड से अधिक सच्चा पश्चात्ताप, विनम्रता और सुधार का संकल्प महत्वपूर्ण है।