सनातन वाणी • भक्ति, ज्ञान और शास्त्रीय पाठ
09 Sep 2026
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स्तोत्र संग्रह

दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्

श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित भगवान शिव के आदिगुरु स्वरूप की ज्ञानमयी स्तुति है। यहां इसका शुद्ध संस्कृत पाठ, सरल हिंदी अर्थ, महत्व, लाभ और पाठ-विधि पढ़ें।

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श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् का संपूर्ण संस्कृत पाठ

शान्तिपाठः

ॐ यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं
यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै ।
तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं
मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

ध्यानश्लोकाः

मौनव्याख्याप्रकटितपरब्रह्मतत्त्वं युवानं
वर्षिष्ठान्ते वसदृषिगणैरावृतं ब्रह्मनिष्ठैः ।
आचार्येन्द्रं करकलितचिन्मुद्रमानन्दरूपं
स्वात्मारामं मुदितवदनं दक्षिणामूर्तिमीडे ॥ १ ॥

वटविटपिसमीपे भूमिभागे निषण्णं
सकलमुनिजनानां ज्ञानदातारमारात् ।
त्रिभुवनगुरुमीशं दक्षिणामूर्तिदेवं
जननमरणदुःखच्छेददक्षं नमामि ॥ २ ॥

चित्रं वटतरोर्मूले वृद्धाः शिष्या गुरुर्युवा ।
गुरोस्तु मौनं व्याख्यानं शिष्यास्तु छिन्नसंशयाः ॥ ३ ॥

निधये सर्वविद्यानां भिषजे भवरोगिणाम् ।
गुरवे सर्वलोकानां दक्षिणामूर्तये नमः ॥ ४ ॥

ॐ नमः प्रणवार्थाय शुद्धज्ञानैकमूर्तये ।
निर्मलाय प्रशान्ताय दक्षिणामूर्तये नमः ॥ ५ ॥

अथ स्तोत्रम्

विश्वं दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं निजान्तर्गतं
पश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोद्भूतं यथा निद्रया ।
यः साक्षात्कुरुते प्रबोधसमये स्वात्मानमेवाद्वयं
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ १ ॥

बीजस्यान्तरिवाङ्कुरो जगदिदं प्राङ्निर्विकल्पं पुन-
र्मायाकल्पितदेशकालकलनावैचित्र्यचित्रीकृतम् ।
मायावीव विजृम्भयत्यपि महायोगीव यः स्वेच्छया
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ २ ॥

यस्यैव स्फुरणं सदात्मकमसत्कल्पार्थगं भासते
साक्षात्तत्त्वमसीति वेदवचसा यो बोधयत्याश्रितान् ।
यत्साक्षात्करणाद्भवेन्न पुनरावृत्तिर्भवाम्भोनिधौ
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ३ ॥

नानाच्छिद्रघटोदरस्थितमहादीपप्रभाभास्वरं
ज्ञानं यस्य तु चक्षुरादिकरणद्वारा बहिः स्पन्दते ।
जानामीति तमेव भान्तमनुभात्येतत्समस्तं जगत्
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ४ ॥

देहं प्राणमपीन्द्रियाण्यपि चलां बुद्धिं च शून्यं विदुः
स्त्रीबालान्धजडोपमास्त्वहमिति भ्रान्ता भृशं वादिनः ।
मायाशक्तिविलासकल्पितमहाव्यामोहसंहारिणे
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ५ ॥

राहुग्रस्तदिवाकरेन्दुसदृशो मायासमाच्छादनात्
सन्मात्रः करणोपसंहरणतो योऽभूत्सुषुप्तः पुमान् ।
प्रागस्वाप्समिति प्रबोधसमये यः प्रत्यभिज्ञायते
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ६ ॥

बाल्यादिष्वपि जाग्रदादिषु तथा सर्वास्ववस्थास्वपि
व्यावृत्तास्वनुवर्तमानमहमित्यन्तः स्फुरन्तं सदा ।
स्वात्मानं प्रकटीकरोति भजतां यो मुद्रया भद्रया
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ७ ॥

विश्वं पश्यति कार्यकारणतया स्वस्वामिसम्बन्धतः
शिष्याचार्यतया तथैव पितृपुत्राद्यात्मना भेदतः ।
स्वप्ने जाग्रति वा य एष पुरुषो मायापरिभ्रामित-
स्तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ८ ॥

भूरम्भांस्यनलोऽनिलोऽम्बरमहर्नाथो हिमांशुः पुमान्
इत्याभाति चराचरात्मकमिदं यस्यैव मूर्त्यष्टकम् ।
नान्यत्किञ्चन विद्यते विमृशतां यस्मात्परस्माद्विभो-
स्तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ९ ॥

सर्वात्मत्वमिति स्फुटीकृतमिदं यस्मादमुष्मिंस्तवे
तेनास्य श्रवणात्तदर्थमननाद्ध्यानाच्च सङ्कीर्तनात् ।
सर्वात्मत्वमहाविभूतिसहितं स्यादीश्वरत्वं स्वतः
सिद्ध्येत्तत्पुनरष्टधा परिणतं चैश्वर्यमव्याहतम् ॥ १० ॥

वटविटपिसमीपे भूमिभागे निषण्णं
सकलमुनिजनानां ज्ञानदातारमारात् ।
त्रिभुवनगुरुमीशं दक्षिणामूर्तिदेवं
जननमरणदुःखच्छेददक्षं नमामि ॥

॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ
श्रीदक्षिणामूर्तिस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥



दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् का सरल हिंदी अर्थ

शान्तिपाठ का अर्थ

मैं उस परम देव की शरण ग्रहण करता हूं, जिन्होंने सृष्टि के आरंभ में ब्रह्माजी को उत्पन्न किया और उन्हें वेदों का ज्ञान प्रदान किया। वे परमात्मा हमारी बुद्धि में आत्मज्ञान का प्रकाश करते हैं। मोक्ष की इच्छा रखने वाला मैं उन्हीं की शरण में जाता हूं। हमारे जीवन में आध्यात्मिक, दैविक और भौतिक—तीनों प्रकार की शांति बनी रहे।

ध्यान-श्लोकों का सरल हिंदी अर्थ

ध्यान श्लोक 1 का अर्थ

मैं युवा स्वरूप भगवान दक्षिणामूर्ति की स्तुति करता हूं, जो मौन रहकर ही परब्रह्म के सत्य को प्रकट करते हैं। उनके चारों ओर आयु में वृद्ध और ब्रह्मज्ञान में स्थित ऋषि बैठे हैं। वे श्रेष्ठ गुरु हैं, हाथ में चिन्मुद्रा धारण करते हैं, आनंदस्वरूप हैं, अपने आत्मस्वरूप में रमण करते हैं और उनका मुख प्रसन्न है।

ध्यान श्लोक 2 का अर्थ

मैं वटवृक्ष के नीचे भूमि पर विराजमान भगवान दक्षिणामूर्ति को प्रणाम करता हूं। वे समीप बैठे सभी मुनियों को आत्मज्ञान प्रदान करने वाले, तीनों लोकों के गुरु और जन्म-मरण से उत्पन्न दुःखों का नाश करने में समर्थ हैं।

ध्यान श्लोक 3 का अर्थ

यह अत्यंत आश्चर्यजनक दृश्य है कि वटवृक्ष के नीचे युवा गुरु विराजमान हैं और उनके शिष्य वृद्ध हैं। गुरु मौन रहकर ही उपदेश दे रहे हैं, फिर भी शिष्यों के सभी संशय समाप्त हो रहे हैं।

ध्यान श्लोक 4 का अर्थ

जो समस्त विद्याओं के भंडार, संसाररूपी रोग से पीड़ित जीवों के चिकित्सक और सभी लोकों के गुरु हैं, उन भगवान दक्षिणामूर्ति को प्रणाम है।

ध्यान श्लोक 5 का अर्थ

ॐकार के वास्तविक अर्थ, शुद्ध ज्ञान के एकमात्र स्वरूप, विकाररहित और परम शांत भगवान दक्षिणामूर्ति को प्रणाम है।

मुख्य स्तोत्र का सरल हिंदी अर्थ

श्लोक 1 का अर्थ

यह संपूर्ण संसार दर्पण में दिखाई देने वाले नगर की तरह वास्तव में हमारे आत्मस्वरूप के भीतर स्थित है। माया के कारण यह स्वप्न के समान बाहर प्रकट हुआ दिखाई देता है। जो ज्ञान प्राप्त होने पर अपने अद्वैत आत्मस्वरूप का साक्षात्कार करा देते हैं, उन गुरुस्वरूप भगवान दक्षिणामूर्ति को प्रणाम है।

श्लोक 2 का अर्थ

जिस प्रकार विशाल वृक्ष अपने प्रकट होने से पहले बीज के अंदर छिपा रहता है, उसी प्रकार सृष्टि से पहले यह संसार परमात्मा में बिना किसी भेद के स्थित था। बाद में माया ने देश, काल और अनेक प्रकार की रचनाओं के माध्यम से इसे विविध रूपों में प्रकट किया। जो जादूगर या महायोगी के समान अपनी इच्छा से इस संसार को प्रकट करते हैं, उन भगवान दक्षिणामूर्ति को प्रणाम है।

श्लोक 3 का अर्थ

जिनकी चेतना के प्रकाश से यह असत्य और परिवर्तनशील संसार भी सत्य जैसा दिखाई देता है, जो अपनी शरण में आए लोगों को वेद के महावाक्य “तत्त्वमसि”—अर्थात “तुम वही परम तत्त्व हो”—का बोध कराते हैं और जिनका साक्षात्कार होने पर मनुष्य संसाररूपी समुद्र में दोबारा नहीं लौटता, उन भगवान दक्षिणामूर्ति को प्रणाम है।

श्लोक 4 का अर्थ

जिस प्रकार अनेक छिद्रों वाले घड़े के अंदर रखा दीपक अपने प्रकाश को छिद्रों के माध्यम से बाहर फैलाता है, उसी प्रकार आत्मा का ज्ञान नेत्र, कान और दूसरी इंद्रियों द्वारा बाहर प्रकट होता है। उसी चेतना के प्रकाशित होने से मनुष्य कहता है कि “मैं जानता हूं” और उसी के प्रकाश से यह संपूर्ण संसार दिखाई देता है। उन गुरुस्वरूप भगवान दक्षिणामूर्ति को प्रणाम है।

श्लोक 5 का अर्थ

कुछ भ्रमित लोग शरीर, प्राण, इंद्रियों, चंचल बुद्धि अथवा शून्य को ही अपना वास्तविक स्वरूप मानते हैं। उनका विचार अज्ञान से उत्पन्न है। माया की शक्ति से पैदा हुए इस महान भ्रम का नाश करने वाले भगवान दक्षिणामूर्ति को प्रणाम है।

श्लोक 6 का अर्थ

जिस प्रकार राहु से ढके हुए सूर्य और चंद्रमा दिखाई नहीं देते, उसी प्रकार गहरी नींद में माया के आवरण तथा इंद्रियों के शांत हो जाने से चेतना प्रकट नहीं होती। फिर भी जागने के बाद मनुष्य पहचानता है कि “मैं अभी तक सो रहा था।” इससे सिद्ध होता है कि नींद में भी उसका आत्मस्वरूप विद्यमान था। इस सत्य का ज्ञान कराने वाले भगवान दक्षिणामूर्ति को प्रणाम है।

श्लोक 7 का अर्थ

बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था बदलती रहती हैं। इसी प्रकार जाग्रत, स्वप्न और गहरी नींद की अवस्थाएं भी आती-जाती रहती हैं। लेकिन इन सभी परिवर्तनों के बीच भीतर प्रकाशित होने वाली “मैं हूं” की चेतना सदैव एक समान रहती है। जो अपनी कल्याणकारी चिन्मुद्रा द्वारा भक्तों को इसी आत्मस्वरूप का ज्ञान कराते हैं, उन भगवान दक्षिणामूर्ति को प्रणाम है।

श्लोक 8 का अर्थ

माया से भ्रमित मनुष्य संसार को कार्य और कारण, स्वामी और सेवक, गुरु और शिष्य तथा पिता और पुत्र जैसे अलग-अलग संबंधों के रूप में देखता है। यह भेद उसे जाग्रत और स्वप्न—दोनों अवस्थाओं में दिखाई देता है। इस माया का वास्तविक स्वरूप समझाने वाले भगवान दक्षिणामूर्ति को प्रणाम है।

श्लोक 9 का अर्थ

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चंद्रमा और जीव—ये भगवान की आठ मूर्तियां मानी गई हैं। इन्हीं आठ रूपों में यह संपूर्ण चर और अचर संसार दिखाई देता है। विचार करने पर उस सर्वव्यापक परमात्मा के अतिरिक्त कुछ भी अलग नहीं मिलता। उन गुरुस्वरूप भगवान दक्षिणामूर्ति को प्रणाम है।

श्लोक 10 का अर्थ

इस स्तोत्र में स्पष्ट किया गया है कि एक ही आत्मा सभी प्राणियों में विद्यमान है। इस स्तोत्र को सुनने, इसके अर्थ पर विचार करने, ध्यान करने और इसका पाठ करने से साधक को सर्वात्मभाव का ज्ञान प्राप्त होता है। फलश्रुति के अनुसार इससे ईश्वरत्व का बोध और आठ प्रकार के दिव्य ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं।

अंतिम श्लोक का अर्थ

मैं वटवृक्ष के नीचे भूमि पर विराजमान भगवान दक्षिणामूर्ति को प्रणाम करता हूं। वे सभी मुनियों को ज्ञान देने वाले, तीनों लोकों के गुरु तथा जन्म और मृत्यु से उत्पन्न दुःखों को समाप्त करने में समर्थ हैं।

भगवान दक्षिणामूर्ति कौन हैं?

दक्षिणामूर्ति भगवान शिव का आदिगुरु स्वरूप हैं। वे ज्ञान, ध्यान, योग, वेदांत और आत्मबोध के अधिष्ठाता माने जाते हैं। उन्हें सामान्यतः वटवृक्ष के नीचे दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठे हुए दिखाया जाता है।

उनके आसपास सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार जैसे वृद्ध ऋषि बैठे होते हैं। भगवान युवा स्वरूप में मौन रहते हुए उन्हें आत्मज्ञान प्रदान करते हैं। उनका मौन इस बात का प्रतीक है कि परम सत्य केवल शब्दों से नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष आत्मानुभव से जाना जाता है।

दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् का महत्व

दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् केवल भगवान शिव की स्तुति नहीं, बल्कि अद्वैत वेदांत का गहन दार्शनिक ग्रंथ भी है। इसमें आत्मा, ब्रह्म, माया, संसार, जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति जैसी अवस्थाओं का वर्णन किया गया है।

यह स्तोत्र समझाता है कि शरीर, मन और जीवन की अवस्थाएं बदलती रहती हैं, लेकिन उन्हें अनुभव करने वाली आत्मचेतना सदैव एक समान रहती है। वही चेतना सभी जीवों में विद्यमान परम तत्त्व है।

दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् के पाठ के लाभ

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धापूर्वक पाठ और मनन करने से:

  • भगवान शिव और गुरु की कृपा प्राप्त होती है।
  • ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा और एकाग्रता बढ़ती है।
  • मन के भ्रम और अज्ञान को दूर करने की प्रेरणा मिलती है।
  • विद्यार्थी तथा ज्ञान-साधक मानसिक स्थिरता प्राप्त करते हैं।
  • आत्मचिंतन और ध्यान में रुचि बढ़ती है।
  • गुरु के प्रति श्रद्धा और सम्मान की भावना विकसित होती है।
  • जीवन की बदलती परिस्थितियों में आत्मबोध बनाए रखने की प्रेरणा मिलती है।
  • अद्वैत वेदांत के मूल सिद्धांतों को समझने में सहायता मिलती है।

दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् की पाठ-विधि

पाठ से पहले

प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान पर भगवान दक्षिणामूर्ति, भगवान शिव अथवा अपने गुरु का चित्र स्थापित करें। दीपक और धूप जलाकर भगवान गणेश तथा गुरु का स्मरण करें।

पाठ करने का तरीका

सबसे पहले शान्तिपाठ करें। इसके बाद भगवान दक्षिणामूर्ति का ध्यान करते हुए पांच ध्यान-श्लोक पढ़ें। फिर मुख्य दस श्लोकों का शांत मन और स्पष्ट उच्चारण से पाठ करें।

केवल पाठ करने के बजाय प्रत्येक श्लोक के अर्थ पर कुछ समय विचार करना विशेष उपयोगी माना जाता है, क्योंकि यह स्तोत्र आत्मज्ञान और वेदांत के सिद्धांतों को समझाता है।

पाठ करने का शुभ समय

इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल किया जा सकता है। गुरुवार, सोमवार, गुरु पूर्णिमा, महाशिवरात्रि और श्रावण मास में इसका पाठ विशेष शुभ माना जाता है।

विद्यार्थी अध्ययन शुरू करने से पहले इसके छोटे ध्यान-मंत्र—“निधये सर्वविद्यानां…”—का पाठ कर सकते हैं।

दक्षिणामूर्ति का सरल ध्यान-मंत्र

निधये सर्वविद्यानां भिषजे भवरोगिणाम् ।
गुरवे सर्वलोकानां दक्षिणामूर्तये नमः ॥

सरल अर्थ: समस्त विद्याओं के भंडार, संसाररूपी रोग के चिकित्सक और सभी लोकों के गुरु भगवान दक्षिणामूर्ति को प्रणाम है।

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