सनातन वाणी • भक्ति, ज्ञान और शास्त्रीय पाठ
05 Sep 2026
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स्तोत्र संग्रह

आदित्य हृदय स्तोत्र

पढ़ें आदित्य हृदय स्तोत्र का सम्पूर्ण संस्कृत पाठ, सरल हिंदी अर्थ, विनियोग और पाठ का महत्व। यह पवित्र स्तोत्र भय, चिंता और शोक दूर कर आत्मबल एवं विजय प्रदान करने वाला माना गया है।

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विनियोग

ॐ अस्य आदित्यह्रदय स्तोत्रस्य अगस्त्यऋषि: अनुष्टुप्छन्दः आदित्यह्रदयभूतो

भगवान् ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया ब्रह्माविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः

पूर्व पिठिता 

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्‌ । रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्‌ ॥1॥

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्‌ । उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा ॥2॥

राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्मं सनातनम्‌ । येन सर्वानरीन्‌ वत्स समरे विजयिष्यसे ॥3॥

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्‌ । जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्‌ ॥4॥

सर्वमंगलमागल्यं सर्वपापप्रणाशनम्‌ । चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम्‌ ॥5॥

मूल -स्तोत्र 
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्‌ । पुजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्‌ ॥6॥

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावन: । एष देवासुरगणांल्लोकान्‌ पाति गभस्तिभि: ॥7॥

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिव: स्कन्द: प्रजापति: । महेन्द्रो धनद: कालो यम: सोमो ह्यापां पतिः ॥8॥

पितरो वसव: साध्या अश्विनौ मरुतो मनु: । वायुर्वहिन: प्रजा प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकर: ॥9॥

आदित्य: सविता सूर्य: खग: पूषा गभस्तिमान्‌ । सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकर: ॥10॥

हरिदश्व: सहस्त्रार्चि: सप्तसप्तिर्मरीचिमान्‌ । तिमिरोन्मथन: शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान्‌ ॥11॥

हिरण्यगर्भ: शिशिरस्तपनोऽहस्करो रवि: । अग्निगर्भोऽदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशन: ॥12॥

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजु:सामपारग: । घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ॥13॥

आतपी मण्डली मृत्यु: पिगंल: सर्वतापन:। कविर्विश्वो महातेजा: रक्त:सर्वभवोद् भव: ॥14॥

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावन: । तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्‌ नमोऽस्तु ते ॥15॥

नम: पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नम: । ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नम: ॥16॥

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नम: । नमो नम: सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नम: ॥17॥

नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नम: । नम: पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते ॥18॥

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे । भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नम: ॥19॥

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने । कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नम: ॥20॥

तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे । नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥21॥

नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभु: । पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि: ॥22॥

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठित: । एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्‌ ॥23॥

देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतुनां फलमेव च । यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमं प्रभु: ॥24॥

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च । कीर्तयन्‌ पुरुष: कश्चिन्नावसीदति राघव ॥25॥

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगप्ततिम्‌ । एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥26॥

अस्मिन्‌ क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि । एवमुक्ता ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम्‌ ॥27॥

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्‌ तदा ॥ धारयामास सुप्रीतो राघव प्रयतात्मवान्‌ ॥28॥

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान्‌ । त्रिराचम्य शूचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्‌ ॥29॥

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थं समुपागतम्‌ । सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत्‌ ॥30॥

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमना: परमं प्रहृष्यमाण: ।

निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥31॥

।।सम्पूर्ण ।

विनियोग का सरल अर्थ

इस आदित्यहृदय स्तोत्र के ऋषि महर्षि अगस्त्य हैं, इसका छंद अनुष्टुप् है और इसके देवता भगवान आदित्य के हृदयस्वरूप ब्रह्मा हैं। समस्त विघ्नों के नाश, ब्रह्मविद्या की प्राप्ति तथा प्रत्येक कार्य में विजय पाने के उद्देश्य से इस स्तोत्र का पाठ किया जाता है।

आदित्य हृदय स्तोत्र का सरल हिंदी भावार्थ

श्लोक 1–2 का अर्थ

युद्ध करते-करते थक चुके भगवान श्रीराम रणभूमि में चिंतित मुद्रा में खड़े थे। उसी समय उन्होंने रावण को एक बार फिर युद्ध के लिए अपने सामने उपस्थित देखा।

देवताओं के साथ युद्ध देखने आए महर्षि अगस्त्य श्रीराम के पास पहुँचे और उनसे इस प्रकार बोले।

श्लोक 3 का अर्थ

हे महाबाहु श्रीराम! मैं तुम्हें एक अत्यंत प्राचीन, गोपनीय और कल्याणकारी उपदेश देता हूँ। हे वत्स! इसका श्रद्धापूर्वक स्मरण और जप करने से तुम युद्ध में अपने सभी शत्रुओं पर विजय प्राप्त करोगे।

श्लोक 4–5 का अर्थ

यह पवित्र स्तोत्र ‘आदित्यहृदय’ के नाम से प्रसिद्ध है। यह शत्रुओं का नाश करने वाला, विजय प्रदान करने वाला, अविनाशी और परम कल्याणकारी है।

यह समस्त मंगलों में श्रेष्ठ मंगलकारी, सभी पापों को नष्ट करने वाला तथा चिंता और शोक को दूर करने वाला है। इसका पाठ मनुष्य की आयु, आत्मबल और उत्साह बढ़ाने वाला उत्तम साधन है।

श्लोक 6 का अर्थ

अनंत किरणों से प्रकाशित, प्रतिदिन उदय होने वाले, देवताओं और असुरों द्वारा वंदित, संपूर्ण संसार को प्रकाश देने वाले तथा सभी लोकों के स्वामी भगवान सूर्य की तुम श्रद्धापूर्वक उपासना करो।

श्लोक 7 का अर्थ

भगवान सूर्य समस्त देवताओं की सम्मिलित शक्ति के स्वरूप हैं। वे स्वयं तेजस्वी हैं और अपनी किरणों के माध्यम से संसार में जीवन, ऊर्जा तथा चेतना का संचार करते हैं। उनकी किरणें देवताओं, असुरों और समस्त प्राणियों सहित सभी लोकों का पालन करती हैं।

श्लोक 8–9 का अर्थ

भगवान सूर्य ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, प्रजापति, इन्द्र, कुबेर, काल, यमराज, चन्द्रमा और वरुण के स्वरूप हैं।

वे ही पितरों, वसुओं, साध्यों, अश्विनीकुमारों, मरुद्गणों और मनु के रूप में स्थित हैं। वे वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण तथा ऋतुओं के नियंता हैं। संसार को प्रकाशित करने के कारण वे प्रभाकर कहलाते हैं।

श्लोक 10 का अर्थ

वे अदिति के पुत्र होने के कारण आदित्य, संसार की उत्पत्ति करने के कारण सविता और सर्वत्र प्रकाश फैलाने के कारण सूर्य कहलाते हैं। वे आकाश में विचरण करने वाले खग, जगत का पोषण करने वाले पूषा और किरणों से संपन्न होने के कारण गभस्तिमान हैं।

वे स्वर्ण के समान चमकने वाले, प्रकाश के स्रोत, सृष्टि के सुनहरे बीज को धारण करने वाले तथा दिन का निर्माण करने वाले दिवाकर हैं।

श्लोक 11 का अर्थ

उनका रथ पीतवर्ण अथवा हरित आभा वाले घोड़ों से युक्त है। वे सहस्रों किरणों से प्रकाशित, सात घोड़ों वाले और किरणों के स्वामी हैं।

वे अंधकार का विनाश करने वाले, सुख प्रदान करने वाले, विश्व को आकार देने वाले, संपूर्ण ब्रह्मांड को जीवन देने वाले मार्तण्ड तथा किरणों से संपन्न अंशुमान हैं।

श्लोक 12 का अर्थ

वे सृष्टि को अपने भीतर धारण करने वाले हिरण्यगर्भ, शीतलता प्रदान करने वाले शिशिर, ताप उत्पन्न करने वाले तपन, दिन का निर्माण करने वाले अहस्कर और सबको प्रकाशित करने वाले रवि हैं।

वे अग्नि को अपने भीतर धारण करने वाले, माता अदिति के पुत्र, शंख के समान निर्मल तथा शीत का नाश करने वाले हैं।

श्लोक 13 का अर्थ

वे आकाश के स्वामी और अंधकार को भेदने वाले हैं। वे ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के ज्ञाता तथा उनके वास्तविक तत्त्व को जानने वाले हैं।

वे बादलों के माध्यम से वर्षा कराने वाले, जल के हितैषी और विंध्य पर्वत के आकाशीय मार्ग में तीव्र गति से विचरण करने वाले हैं।

श्लोक 14 का अर्थ

वे ताप देने वाले, गोलाकार स्वरूप वाले, मृत्यु के नियंता, सुनहरी अथवा ताम्रवर्ण आभा वाले और समस्त संसार को ऊष्मा प्रदान करने वाले हैं।

वे त्रिकालदर्शी, संपूर्ण विश्व में व्याप्त, परम तेजस्वी, लाल आभा से युक्त तथा समस्त प्राणियों की उत्पत्ति के मूल कारण हैं।

श्लोक 15 का अर्थ

भगवान सूर्य नक्षत्रों, ग्रहों और तारों के अधिपति हैं। वे संपूर्ण जगत का पालन-पोषण करने वाले तथा तेजस्वियों में भी सबसे अधिक तेजस्वी हैं।

बारह मास और बारह स्वरूपों में प्रकट होने वाले हे द्वादशात्मा सूर्यदेव! आपको बार-बार नमस्कार है।

श्लोक 16 का अर्थ

उदयाचल के रूप में पूर्व दिशा में प्रकट होने वाले और अस्ताचल के रूप में पश्चिम दिशा में जाने वाले भगवान सूर्य को नमस्कार है।

ग्रहों, नक्षत्रों और समस्त प्रकाशमान पिंडों के स्वामी तथा दिन के अधिपति भगवान सूर्य को प्रणाम है।

श्लोक 17 का अर्थ

विजय के स्वरूप, शुभता और सफलता प्रदान करने वाले तथा तेजस्वी घोड़ों से युक्त भगवान सूर्य को बार-बार नमस्कार है।

सहस्रों किरणों से प्रकाशित और माता अदिति के पुत्र भगवान आदित्य को पुनः-पुनः प्रणाम है।

श्लोक 18 का अर्थ

प्रचंड शक्ति वाले, पराक्रमी, अत्यंत वेगवान और अपनी किरणों को दूर-दूर तक फैलाने वाले भगवान सूर्य को नमस्कार है।

अपनी किरणों से कमल के फूलों को खिलाने वाले और प्रचंड तेज से युक्त सूर्यदेव को प्रणाम है।

श्लोक 19 का अर्थ

आप ब्रह्मा, शिव और विष्णु के भी स्वामी हैं। आप दिव्य प्रकाश से संपन्न तथा सूर्य-मंडल के तेजस्वी अधिपति हैं।

आप संसार को प्रकाशित करने वाले, समय आने पर सबको अपने भीतर समाहित करने वाले तथा रौद्र रूप धारण करने वाले हैं। आपको नमस्कार है।

श्लोक 20 का अर्थ

आप अज्ञानरूपी अंधकार को मिटाने वाले, शीत और जड़ता को समाप्त करने वाले तथा शत्रुओं का विनाश करने वाले हैं।

आपकी शक्ति और स्वरूप की कोई सीमा नहीं है। आप कृतघ्नता का नाश करने वाले, समस्त ज्योतियों के स्वामी तथा दिव्य स्वरूप हैं। आपको प्रणाम है।

श्लोक 21 का अर्थ

आपका तेज तपाए हुए शुद्ध स्वर्ण के समान चमकता है। आप संसार के समस्त कार्यों को संपन्न करने वाले विश्वकर्मा स्वरूप हैं।

आप अंधकार को पूरी तरह नष्ट करने वाले, प्रकाश के मूल स्रोत तथा संसार के प्रत्येक कर्म के साक्षी हैं। आपको बार-बार नमस्कार है।

श्लोक 22 का अर्थ

हे रघुनन्दन! भगवान सूर्य ही समय आने पर समस्त प्राणियों का संहार करते हैं और पुनः उन्हीं से नई सृष्टि का जन्म होता है।

वे ही जगत का पालन करते हैं, अपनी किरणों से पृथ्वी को ताप देते हैं और जल को आकर्षित करके वर्षा का कारण बनते हैं।

श्लोक 23 का अर्थ

जब सभी प्राणी निद्रा में होते हैं, तब भी भगवान सूर्य जाग्रत रहकर संसार की व्यवस्था का संचालन करते हैं। वे प्रत्येक प्राणी के भीतर अंतर्यामी रूप से विद्यमान हैं।

वे ही अग्निहोत्र हैं और अग्निहोत्र करने वाले साधक को प्राप्त होने वाला पुण्यफल भी उन्हीं का स्वरूप है।

श्लोक 24 का अर्थ

समस्त देवता, सभी प्रकार के यज्ञ और उन यज्ञों से प्राप्त होने वाला फल भी भगवान सूर्य के ही स्वरूप हैं।

संसार में जितने भी कर्तव्य, धार्मिक अनुष्ठान और शुभ कर्म किए जाते हैं, उन सबका फल प्रदान करने में भगवान सूर्य ही पूर्ण रूप से समर्थ हैं।

श्लोक 25 का अर्थ

हे राघव! विपत्ति, कठिनाई, निर्जन अथवा दुर्गम स्थान और भय उत्पन्न करने वाली परिस्थितियों में जो मनुष्य श्रद्धा से भगवान सूर्य का स्मरण करता है, वह निराशा और दुःख में डूबता नहीं है।

सूर्यदेव का स्मरण उसके भीतर साहस, धैर्य और कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति उत्पन्न करता है।

श्लोक 26 का अर्थ

इसलिए तुम एकाग्र मन से देवताओं के भी देवता और संपूर्ण जगत के स्वामी भगवान सूर्य की आराधना करो।

इस आदित्यहृदय स्तोत्र का तीन बार पाठ करने के बाद तुम युद्ध में निश्चित रूप से विजय प्राप्त करोगे।

श्लोक 27 का अर्थ

हे महाबाहु श्रीराम! इसी क्षण तुम रावण का वध करने में समर्थ हो जाओगे।

श्रीराम को यह उपदेश देने के बाद महर्षि अगस्त्य जिस प्रकार वहाँ आए थे, उसी प्रकार अपने स्थान के लिए प्रस्थान कर गए।

श्लोक 28 का अर्थ

महर्षि अगस्त्य के वचन सुनकर परम तेजस्वी श्रीराम का शोक और मानसिक भ्रम दूर हो गया। उनका मन प्रसन्नता तथा आत्मविश्वास से भर उठा।

संयमित और पवित्र मन वाले श्रीराम ने आदित्यहृदय स्तोत्र के उपदेश को अपने हृदय में पूर्ण श्रद्धा से धारण कर लिया।

श्लोक 29 का अर्थ

भगवान सूर्य की ओर देखते हुए श्रीराम ने आदित्यहृदय स्तोत्र का तीन बार जप किया। इसके बाद उनके हृदय में अद्भुत प्रसन्नता, ऊर्जा और उत्साह उत्पन्न हुआ।

उन्होंने तीन बार आचमन करके स्वयं को शुद्ध किया और फिर महान पराक्रम के साथ अपना धनुष उठा लिया।

श्लोक 30 का अर्थ

श्रीराम ने अपने सामने खड़े रावण को देखा। अब उनका हृदय उत्साह, आत्मविश्वास और विजय के संकल्प से भर चुका था।

वे रावण का अंत करने के उद्देश्य से आगे बढ़े और अपनी पूरी शक्ति तथा पराक्रम के साथ उसके वध का निश्चय किया।

श्लोक 31 का अर्थ

देवताओं के मध्य उपस्थित भगवान सूर्य ने प्रसन्न मन से श्रीराम की ओर देखा। वे जान चुके थे कि राक्षसों के राजा रावण के विनाश का समय आ गया है।

अत्यंत प्रसन्न होकर भगवान सूर्य ने श्रीराम को संकेत दिया—हे रघुनन्दन! अब शीघ्रता करो और रावण का अंत करो।

समापन

इस प्रकार भगवान सूर्य की महिमा का वर्णन करने वाला ‘आदित्यहृदय स्तोत्र’ पूर्ण होता है। महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण के युद्धकाण्ड में वर्णित यह पवित्र स्तोत्र महर्षि अगस्त्य ने युद्धभूमि में भगवान श्रीराम को सुनाया था।

आदित्यहृदय स्तोत्र मनुष्य के मन से भय, चिंता, निराशा और शोक को दूर करके उसके भीतर साहस, आत्मबल, उत्साह तथा सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करने वाला माना गया है।

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