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09 Sep 2026
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श्री राजराजेश्वरी अष्टकम्

श्री राजराजेश्वरी अष्टकम् माता राजराजेश्वरी के विविध स्वरूपों, दिव्य शक्तियों और करुणा का वर्णन करने वाला आठ श्लोकों का स्तोत्र है।

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श्री राजराजेश्वरी अष्टकम् — मूल संस्कृत पाठ

॥ अथ श्रीराजराजेश्वर्यष्टकम् ॥

अम्बा शाम्भवि चन्द्रमौलिरबलाऽपर्णा उमा पार्वती
काली हैमवती शिवा त्रिनयनी कात्यायनी भैरवी।
सावित्री नवयौवना शुभकरी साम्राज्यलक्ष्मीप्रदा
चिद्रूपी परदेवता भगवती श्रीराजराजेश्वरी॥१॥

अम्बा मोहिनि देवता त्रिभुवनी आनन्दसन्दायिनी
वाणी पल्लवपाणि वेणुमुरलीगानप्रियालोलिनी।
कल्याणी उडुराजबिम्बवदना धूम्राक्षसंहारिणी
चिद्रूपी परदेवता भगवती श्रीराजराजेश्वरी॥२॥

अम्बा नूपुररत्नकङ्कणधरी केयूरहारावली
जातीचम्पकवैजयन्तिलहरी ग्रैवेयकैराजिता।
वीणावेणुविनोदमण्डितकरा वीरासने संस्थिता
चिद्रूपी परदेवता भगवती श्रीराजराजेश्वरी॥३॥

अम्बा रौद्रिणि भद्रकालि बगला ज्वालामुखी वैष्णवी
ब्रह्माणी त्रिपुरान्तकी सुरनुता देदीप्यमानोज्ज्वला।
चामुण्डाश्रितरक्षपोषजननी दाक्षायणी वल्लवी
चिद्रूपी परदेवता भगवती श्रीराजराजेश्वरी॥४॥

अम्बा शूलधनुःकुशाङ्कुशधरी अर्धेन्दुबिम्बाधरी
वाराही मधुकैटभप्रशमनी वाणीरमासेविता।
मल्लाद्यासुरमूकदैत्यमथनी माहेश्वरी चाम्बिका
चिद्रूपी परदेवता भगवती श्रीराजराजेश्वरी॥५॥

अम्बा सृष्टिविनाशपालनकरी आर्या विसंशोभिता
गायत्री प्रणवाक्षरामृतरसः पूर्णानुसन्धीकृता।
ओङ्कारी विनतासुतार्चितपदा उद्दण्डदैत्यापहा
चिद्रूपी परदेवता भगवती श्रीराजराजेश्वरी॥६॥

अम्बा शाश्वत आगमादिविनुता आर्या महादेवता
या ब्रह्मादिपिपीलिकान्तजननी या वै जगन्मोहिनी।
या पञ्चप्रणवादिरेफजननी या चित्कलामालिनी
चिद्रूपी परदेवता भगवती श्रीराजराजेश्वरी॥७॥

अम्बापालितभक्तराजदनिशं अम्बाष्टकं यः पठेत्
अम्बालोककटाक्षवीक्षललितं चैश्वर्यमव्याहतम्।
अम्बा पावनमन्त्रराजपठनादन्ते च मोक्षप्रदा
चिद्रूपी परदेवता भगवती श्रीराजराजेश्वरी॥८॥

इति श्रीराजराजेश्वर्यष्टकं सम्पूर्णम्॥




श्री राजराजेश्वरी अष्टकम् का सरल हिंदी अर्थ

श्लोक 1 का अर्थ

माता राजराजेश्वरी ही अम्बा, शाम्भवी, चन्द्रमौलि, अबला, अपर्णा, उमा और पार्वती हैं। वे ही काली, हिमालय की पुत्री हैमवती, कल्याणस्वरूपा शिवा, तीन नेत्रों वाली त्रिनयनी, कात्यायनी और भैरवी हैं। वे सावित्री, सदा युवती, कल्याण करने वाली और साम्राज्य के समान विशाल ऐश्वर्य प्रदान करने वाली हैं। उन चेतनास्वरूप परम देवी भगवती राजराजेश्वरी को प्रणाम है।

श्लोक 2 का अर्थ

हे माता! आप मोहिनी, देवस्वरूपा, तीनों लोकों की स्वामिनी और आनंद प्रदान करने वाली हैं। आप वाणी अर्थात् सरस्वती का स्वरूप हैं। आपके हाथ कोमल पत्तों जैसे हैं और आपको वीणा तथा बांसुरी का मधुर संगीत प्रिय है। आप कल्याणमयी, चंद्रमा के समान सुंदर मुख वाली और धूम्राक्ष दैत्य का संहार करने वाली हैं। उन चेतनास्वरूप परम देवी राजराजेश्वरी को प्रणाम है।

श्लोक 3 का अर्थ

हे माता! आपने रत्नों से बने नूपुर, कंगन, बाजूबंद और अनेक सुंदर हार धारण किए हैं। जूही, चम्पा और वैजयंती पुष्पों की मालाएं तथा गले के दिव्य आभूषण आपकी शोभा बढ़ाते हैं। आपके हाथ वीणा और बांसुरी के वादन से सुशोभित हैं तथा आप वीरासन में विराजमान हैं। उन चेतनास्वरूप परम देवी राजराजेश्वरी को प्रणाम है।

श्लोक 4 का अर्थ

हे माता! आप रौद्रिणी, भद्रकाली, बगला, ज्वालामुखी, वैष्णवी और ब्रह्माणी हैं। आप त्रिपुर का अंत करने वाली, देवताओं द्वारा स्तुति की जाने वाली और दिव्य प्रकाश से चमकने वाली हैं। आप चामुण्डा, अपनी शरण में आए भक्तों की रक्षा और पालन करने वाली जगन्माता, दाक्षायणी तथा वल्लवी हैं। उन चेतनास्वरूप परम देवी राजराजेश्वरी को प्रणाम है।

श्लोक 5 का अर्थ

हे माता! आप त्रिशूल, धनुष, कुश और अंकुश धारण करती हैं। आपका मुख अथवा अधर अर्धचंद्र के समान सुंदर है। आप वाराही, मधु-कैटभ का शमन करने वाली और सरस्वती तथा लक्ष्मी द्वारा सेवित हैं। आप मल्ल आदि असुरों और मूक दैत्य का नाश करने वाली माहेश्वरी तथा अम्बिका हैं। उन चेतनास्वरूप परम देवी राजराजेश्वरी को प्रणाम है।

श्लोक 6 का अर्थ

हे माता! आप संसार की सृष्टि, पालन और संहार करने वाली तथा दिव्य शोभा से युक्त आर्या हैं। आप गायत्री और प्रणव अर्थात् ॐकार के अमृतमय स्वरूप में स्थित हैं। आप पूर्ण ध्यान का परम लक्ष्य और स्वयं ॐकारस्वरूपिणी हैं। आपके चरणों की देवताओं द्वारा पूजा की जाती है और आप उद्दण्ड दैत्यों का नाश करती हैं। उन चेतनास्वरूप परम देवी राजराजेश्वरी को प्रणाम है।

श्लोक 7 का अर्थ

हे माता! आप शाश्वत, आगम आदि शास्त्रों द्वारा स्तुति की जाने वाली और परम महादेवी हैं। ब्रह्मा से लेकर एक छोटी-सी चींटी तक सभी जीवों की आप ही जननी हैं। आप जगत को मोहित करने वाली महामाया हैं। आप प्रणव आदि पवित्र ध्वनियों और अक्षरों की जननी तथा चेतना की दिव्य कलाओं से सुशोभित हैं। उन चेतनास्वरूप परम देवी राजराजेश्वरी को प्रणाम है।

श्लोक 8 का अर्थ

जो भक्त माता द्वारा संरक्षित होकर दिन-रात इस अम्बाष्टकम् का श्रद्धापूर्वक पाठ करता है, उस पर माता राजराजेश्वरी की कृपादृष्टि होती है। स्तोत्र की फलश्रुति के अनुसार उसे बाधारहित ऐश्वर्य प्राप्त होता है। इस पवित्र मंत्ररूपी स्तोत्र का पाठ करने वाले भक्त को जीवन के अंत में माता मोक्ष प्रदान करती हैं। उन चेतनास्वरूप परम देवी राजराजेश्वरी को प्रणाम है।


राजराजेश्वरी अष्टकम् का परिचय

श्री राजराजेश्वरी अष्टकम् को अम्बाष्टकम् भी कहा जाता है। इसमें आठ श्लोकों के माध्यम से जगन्माता के अनेक स्वरूपों, गुणों और शक्तियों की स्तुति की गई है।

“राजराजेश्वरी” का अर्थ है—राजाओं के भी राजा की परम ईश्वरी, अर्थात् संपूर्ण ब्रह्माण्ड पर शासन करने वाली सर्वोच्च देवी। उन्हें माता ललिता महात्रिपुरसुंदरी का ही एक दिव्य स्वरूप माना जाता है।

इस स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक में माता को—

“चिद्रूपी परदेवता भगवती श्रीराजराजेश्वरी”

कहकर प्रणाम किया गया है। इसका भाव है कि माता शुद्ध चेतना का स्वरूप और सभी देवताओं से परे स्थित परम देवी हैं।


राजराजेश्वरी अष्टकम् का महत्त्व

इस अष्टकम् में देवी के शांत, सुंदर, ज्ञानमय और उग्र—सभी रूपों को एक ही परम शक्ति का स्वरूप बताया गया है। माता ही पार्वती, काली, भैरवी, गायत्री, वैष्णवी, ब्रह्माणी और चामुण्डा हैं।

यह स्तोत्र भक्त को यह समझने की प्रेरणा देता है कि सृष्टि, पालन और संहार करने वाली एक ही आदिशक्ति विभिन्न रूपों में प्रकट होती हैं।


राजराजेश्वरी अष्टकम् के धार्मिक लाभ

धार्मिक मान्यताओं और स्तोत्र की फलश्रुति के अनुसार श्रद्धापूर्वक पाठ करने से—

  • माता राजराजेश्वरी की कृपा प्राप्त होती है।
  • मन में शांति और सकारात्मकता आती है।
  • भय तथा मानसिक चिंता कम करने में सहायता मिलती है।
  • ज्ञान, वाणी और कलात्मक प्रतिभा के विकास की प्रेरणा मिलती है।
  • उचित कार्यों में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए माता का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
  • परिवार में सुख, सौहार्द और समृद्धि की कामना पूर्ण होती है।
  • साधक के भीतर आत्मविश्वास और आध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है।
  • निष्काम भाव से पाठ करने पर आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष की दिशा में प्रगति होती है।

राजराजेश्वरी अष्टकम् की पाठ-विधि

  1. प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. माता राजराजेश्वरी, ललिता त्रिपुरसुंदरी अथवा दुर्गा के चित्र के सामने बैठें।
  3. दीपक और धूप प्रज्वलित करें।
  4. माता को कुमकुम, अक्षत तथा लाल या गुलाबी पुष्प अर्पित करें।
  5. भगवान गणेश और अपने गुरु का स्मरण करें।
  6. आठों श्लोकों का शुद्ध उच्चारण करते हुए श्रद्धापूर्वक पाठ करें।
  7. पाठ पूरा होने के बाद माता से अपनी भूलों के लिए क्षमा मांगें।
  8. अंत में अपने परिवार और समस्त संसार के कल्याण की प्रार्थना करें।

पाठ करने का उचित समय

इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल अथवा संध्याकाल किया जा सकता है। शुक्रवार, पूर्णिमा, नवरात्रि और देवी से संबंधित विशेष पर्वों पर इसका पाठ विशेष रूप से किया जाता है।


जरूरी पाठ-संबंधी टिप्पणी

श्री राजराजेश्वरी अष्टकम् के कुछ संग्रहों में आठ मूल श्लोकों के बाद चार अतिरिक्त श्लोक भी मिलते हैं। प्रमाणित स्तोत्र-संग्रहों के अनुसार प्रचलित अष्टकम् श्लोक 1 से 8 तक है। अतिरिक्त श्लोकों के क्रम और रचयिता को लेकर पाठभेद पाए जाते हैं, इसलिए यहां मूल आठ श्लोकों वाला पाठ दिया गया है।

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