सनातन वाणी • भक्ति, ज्ञान और शास्त्रीय पाठ
09 Sep 2026
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देवी अपराध क्षमापण स्तोत्रम्

देवी अपराध क्षमापण स्तोत्रम् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माता जगदम्बा से पूजा में हुई गलतियों और अपराधों की क्षमा मांगने वाली भावपूर्ण स्तुति है।

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देवी अपराध क्षमापण स्तोत्रम् का संपूर्ण संस्कृत पाठ

॥ अथ देव्यपराधक्षमापणस्तोत्रम् ॥

न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः ।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥ १ ॥

विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् ।
तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ २ ॥

पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः ।
मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ ३ ॥

जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ ४ ॥

परित्यक्ता देवा विविधविधसेवाकुलतया
मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि ।
इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥ ५ ॥

श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः ।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥ ६ ॥

चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः ।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥ ७ ॥

न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः ।
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ॥ ८ ॥

नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः
किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः ।
श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥ ९ ॥

आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि ।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥ १० ॥

जगदम्ब विचित्रमत्र किं
परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि ।
अपराधपरम्परापरं
न हि माता समुपेक्षते सुतम् ॥ ११ ॥

मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि ।
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु ॥ १२ ॥

॥ इति श्रीदेव्यपराधक्षमापणस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥



देवी अपराध क्षमापण स्तोत्रम् का सरल हिंदी अर्थ

श्लोक 1 का अर्थ

हे माता! मैं न आपका मंत्र जानता हूं, न यंत्र और न ही ठीक प्रकार से आपकी स्तुति करना जानता हूं। मुझे आपका आवाहन, ध्यान, स्तुति-कथा, पूजा की मुद्राएं अथवा करुण स्वर में प्रार्थना करना भी नहीं आता। मैं केवल इतना जानता हूं कि आपकी शरण में आने से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

श्लोक 2 का अर्थ

हे सबका उद्धार करने वाली कल्याणमयी माता! पूजा की विधि न जानने, धन का अभाव होने, आलस्य और उचित साधना करने में असमर्थता के कारण मुझसे आपके चरणों की सेवा में जो कमी हुई है, उसे क्षमा करें। संसार में बुरा पुत्र हो सकता है, लेकिन माता कभी बुरी नहीं होती।

श्लोक 3 का अर्थ

हे माता! पृथ्वी पर आपके बहुत से सरल और योग्य पुत्र हैं, लेकिन उनके बीच मैं अत्यंत चंचल और अयोग्य पुत्र हूं। फिर भी मेरा त्याग करना आपके लिए उचित नहीं है, क्योंकि पुत्र बुरा हो सकता है, परंतु माता कभी बुरी नहीं होती।

श्लोक 4 का अर्थ

हे जगत की माता! मैंने आपके चरणों की सेवा नहीं की और न ही आपको बहुत-सा धन अर्पित किया। इसके बाद भी आप मुझसे अनुपम प्रेम करती हैं। वास्तव में पुत्र बुरा हो सकता है, लेकिन माता कभी बुरी नहीं होती।

श्लोक 5 का अर्थ

अनेक प्रकार की सेवाओं और सांसारिक उलझनों के कारण मैंने दूसरे देवताओं की आराधना भी छोड़ दी। इस प्रकार मेरे जीवन के पचासी से अधिक वर्ष बीत गए। हे गणेशजी की माता! यदि अब भी आपकी कृपा मुझ पर नहीं होगी तो मुझ निराश्रित के लिए आपके अतिरिक्त और किसकी शरण बची है?

श्लोक 6 का अर्थ

हे अपर्णा! आपके मंत्र का केवल एक अक्षर भी कान में प्रवेश कर जाए तो सामान्य और अयोग्य व्यक्ति भी मधु के समान मीठी वाणी बोलने लगता है। निर्धन मनुष्य भी भय से मुक्त होकर करोड़ों स्वर्ण मुद्राओं जैसी समृद्धि का आनंद प्राप्त करता है। तब विधिपूर्वक आपके मंत्र-जप से मिलने वाले फल को कौन जान सकता है?

श्लोक 7 का अर्थ

भगवान शिव शरीर पर चिता की भस्म लगाते हैं, विष उनका आहार है, दिशाएं ही उनके वस्त्र हैं, वे जटाधारी हैं और गले में सर्पों के राजा को माला की तरह धारण करते हैं। हाथ में कपाल रखने तथा भूतों के स्वामी होने पर भी वे जगदीश्वर के पद पर विराजमान हैं। हे भवानी! यह सब आपके साथ विवाह करने का ही फल है।

श्लोक 8 का अर्थ

हे चंद्रमा के समान मुख वाली माता! मुझे न मोक्ष की इच्छा है, न सांसारिक वैभव की कामना, न विशेष ज्ञान की अपेक्षा और न ही भौतिक सुखों की चाह है। मेरी केवल यही प्रार्थना है कि मेरा जीवन “मृडानी, रुद्राणी, शिवा और भवानी” जैसे आपके पवित्र नामों का जप करते हुए बीते।

श्लोक 9 का अर्थ

हे माता श्यामा! मैंने विधिपूर्वक विभिन्न पूजन-सामग्रियों से आपकी आराधना नहीं की। दुख और नकारात्मक विचारों से घिरकर मैंने अपनी वाणी से न जाने कितने कठोर शब्द कहे हैं। फिर भी यदि आप मुझ अनाथ पर थोड़ी-सी कृपा करती हैं, तो हे माता! यह केवल आपके करुणामय स्वभाव के अनुरूप ही होगा।

श्लोक 10 का अर्थ

हे दुर्गा! हे करुणा के सागर की स्वामिनी! संकटों में फंसने पर ही मैं आपका स्मरण करता हूं। कृपया इसे मेरी चालाकी या कपट न समझें, क्योंकि भूख और प्यास से परेशान बच्चा अपनी माता को ही याद करता है।

श्लोक 11 का अर्थ

हे जगदम्बा! यदि आपके हृदय में मेरे लिए पूर्ण करुणा है तो इसमें आश्चर्य ही क्या है? मेरा जीवन अपराधों की लंबी श्रृंखला से भरा हो सकता है, लेकिन माता अपने अपराधी पुत्र की भी उपेक्षा नहीं करती।

श्लोक 12 का अर्थ

हे महादेवी! मेरे समान कोई अपराधी नहीं है और आपके समान पापों को नष्ट करने वाली भी कोई नहीं है। इस सत्य को जानकर आप मेरे लिए जो उचित समझें, वही करें।

देवी अपराध क्षमापण स्तोत्रम् का परिचय

देवी अपराध क्षमापण स्तोत्रम् आदि गुरु श्री शंकराचार्य द्वारा रचित माता जगदम्बा की अत्यंत भावपूर्ण स्तुति है। इसमें भक्त माता के सामने अपनी अयोग्यता, पूजा में हुई भूलों, आलस्य और अपराधों को स्वीकार करते हुए क्षमा की प्रार्थना करता है।

इस स्तोत्र का सबसे प्रसिद्ध संदेश है—“कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति”, अर्थात पुत्र बुरा हो सकता है, लेकिन माता कभी बुरी नहीं होती।

देवी अपराध क्षमापण स्तोत्रम् का महत्व

यह स्तोत्र हमें बताता है कि माता की कृपा प्राप्त करने के लिए केवल कठिन पूजा-विधियों का ज्ञान आवश्यक नहीं है। सच्चा पश्चात्ताप, विनम्रता, विश्वास और माता की शरण ग्रहण करने का भाव भी उपासना का महत्वपूर्ण भाग है।

इसमें भक्त स्वयं को विद्वान या सिद्ध दिखाने के बजाय अपनी कमियों को स्वीकार करता है। यही स्वीकार भाव अहंकार को कम करके मन को भक्ति के योग्य बनाता है।

देवी अपराध क्षमापण स्तोत्रम् के पाठ के लाभ

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धापूर्वक पाठ करने से:

  • पूजा-पाठ में अनजाने में हुई त्रुटियों के लिए क्षमा मांगी जाती है।
  • मन में विनम्रता और समर्पण की भावना बढ़ती है।
  • अपराधबोध और नकारात्मक विचारों को शांत करने में आध्यात्मिक सहायता मिलती है।
  • माता जगदम्बा के प्रति विश्वास और भक्ति मजबूत होती है।
  • अहंकार, आलस्य और अपनी गलतियों को पहचानने की प्रेरणा मिलती है।
  • संकट के समय मानसिक साहस और आशा प्राप्त होती है।
  • मन को शांति और भावनात्मक सहारा मिलता है।
  • भक्त में अपने व्यवहार को सुधारने का संकल्प उत्पन्न होता है।

देवी अपराध क्षमापण स्तोत्रम् की पाठ-विधि

पाठ से पहले

स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान पर माता दुर्गा, पार्वती, काली अथवा अपने आराध्य देवी-स्वरूप का चित्र स्थापित करें। दीपक और धूप जलाकर भगवान गणेश तथा अपने गुरु का स्मरण करें।

माता को क्या अर्पित करें?

माता को लाल पुष्प, अक्षत, कुमकुम, फल और अपनी श्रद्धा के अनुसार सात्त्विक भोग अर्पित किया जा सकता है।

पाठ करने का तरीका

माता का ध्यान करते हुए संपूर्ण स्तोत्र को धीरे-धीरे और भावपूर्वक पढ़ें। पाठ के समय अपने द्वारा जाने-अनजाने में हुई गलतियों को स्वीकार करते हुए उन्हें दोबारा न करने का संकल्प लें।

यह स्तोत्र केवल शब्दों में क्षमा मांगने के लिए नहीं, बल्कि अपने व्यवहार को सुधारने की प्रेरणा प्राप्त करने के लिए भी पढ़ना चाहिए।

इस स्तोत्र का पाठ कब करें?

देवी अपराध क्षमापण स्तोत्रम् का पाठ दैनिक देवी-पूजा के अंत में किया जा सकता है। नवरात्रि, दुर्गाष्टमी, शुक्रवार, पूर्णिमा और माता से संबंधित पर्वों पर इसका पाठ विशेष रूप से किया जाता है।

दुर्गा सप्तशती, देवी कवच, अर्गला स्तोत्र, कीलक स्तोत्र या किसी भी देवी उपासना के बाद पूजा में हुई भूलों की क्षमा मांगने के लिए भी इसका पाठ किया जा सकता है।

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