सनातन वाणी • भक्ति, ज्ञान और कथा
29 Mar 2026
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स्तोत्र

श्री त्रैलोक्यविजय नृसिंह कवचम्

त्रैलोक्य विजय नृसिंह कवच (Trailokya Vijaya Narsimha Kavach) भगवान नृसिंह का एक अत्यंत उग्र और शक्तिशाली स्तोत्र है। तंत्र शास्त्र और संहिताओं में वर्णित यह कवच घोर संकटों, प्रबल शत्रुओं, तंत्र-मंत्र की बाधाओं और नकारात्मक शक्तियों के तत्काल नाश के लिए अचूक माना गया है। मान्यता है कि इसके पाठ से व्यक्ति अभेद्य हो जाता है और तीनों लोकों में विजय प्राप्त करता है। यहाँ पढ़ें त्रैलोक्य विजय नृसिंह कवच का मूल संस्कृत पाठ और उसका संपूर्ण हिन्दी अनुवाद।

श्री त्रैलोक्यविजय नृसिंह कवचम्
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॥ श्री त्रैलोक्यविजय नृसिंह कवचम् ॥

मूल संस्कृत पाठ

शृणु वक्ष्यामि देवेशि कवचं परमाद्भुतम् । त्रैलोक्यविजयं नाम सर्वरक्षाकरं नृणाम् ॥ १॥

यस्य प्रपठनान्मर्त्यस् त्रैलोक्यविजयी भवेत् । धनवान् पुत्रवान् लोके दीर्घायुः सुखभाग्भवेत् ॥ २॥

ॐ शिरो मे नृहरिः पातु भालं मे पातु केशवः । नेत्रे मे नरसिंहश्च मुखं मे सिंहविक्रमः ॥ ३॥

श्रोत्रे मे पातु देवेशो नासां मे पातु धूर्जटिः । दन्तान् मे पातु गोविन्दो जिह्वां मे पातु चेश्वरः ॥ ४॥

कण्ठं मे पातु वैकुण्ठः स्कन्धौ मे पातु श्रीपतिः । भुजौ मे पातु सर्वात्मा करौ मे पातु भार्गवः ॥ ५॥

वक्षो मे पातु दामोदरः कुक्षिं मे पातु वामनः । नाभिं मे पातु पद्मनाभः पृष्ठं मे पातु माधवः ॥ ६॥

कटिं मे पातु विश्वात्मा ऊरू मे पातु त्रिविक्रमः । जानुनी मे जगन्नाथो जङ्घे मे पातु जनार्दनः ॥ ७॥

गुल्फौ मे पातु नारायणः पादौ मे पातु श्रीधरः । सर्वाङ्गं पातु मे विष्णुः सर्वसन्धीन्मयो हरिः ॥ ८॥

पूर्वे मे पातु गोविन्दो दक्षिणे पातु नृहरिः । पश्चिमे पातु गरुडध्वज उत्तरे पातु श्रीपतिः ॥ ९॥

ऊर्ध्वं मे पातु वैकुण्ठो ह्यधो मे पातु माधवः । सर्वतः पातु मे नित्यं सर्वदोषनिवारणः ॥ १०॥

इदं तु कवचं पुण्यं त्रैलोक्यविजयाभिधम् । यः पठेच्छृणुयान्नित्यं स भवेज्जयभाग्भुवि ॥ ११॥

भूतप्रेतपिशाचाश्च शाकिनीडाकिनीगणाः । पलायन्ते स्मृतादेव नृसिंहकवचाद् यतः ॥ १२॥

सर्वव्याधिप्रशमनं सर्वबाधानिवारणम् । त्रैलोक्यविजयं नाम कवचं परमाद्भुतम् ॥ १३॥


हिन्दी अनुवाद

१. (भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं) हे देवेशि! सुनो, मैं मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाले उस परम अद्भुत 'त्रैलोक्य विजय' नामक कवच का वर्णन कर रहा हूँ।

२. जिसके पाठ करने से मनुष्य तीनों लोकों में विजयी हो जाता है, तथा इस संसार में वह धनवान, पुत्रवान, दीर्घायु (लंबी उम्र वाला) और सभी सुखों को भोगने वाला बन जाता है।

३. ॐ भगवान नृहरि मेरे सिर की रक्षा करें। केशव मेरे मस्तक (माथे) की रक्षा करें। भगवान नरसिंह मेरे दोनों नेत्रों की रक्षा करें और सिंह के समान पराक्रम वाले भगवान मेरे मुख की रक्षा करें।

४. देवों के ईश मेरे कानों की रक्षा करें। धूर्जटि (प्रलयंकारी रूप वाले) मेरी नाक की रक्षा करें। गोविंद मेरे दांतों की रक्षा करें और ईश्वर मेरी जिह्वा (जीभ) की रक्षा करें।

५. वैकुंठनाथ मेरे कंठ (गले) की रक्षा करें। श्रीपति (लक्ष्मीपति) मेरे कन्धों की रक्षा करें। सर्वात्मा (सभी की आत्मा में बसने वाले) मेरी भुजाओं की रक्षा करें और भार्गव मेरे दोनों हाथों की रक्षा करें।

६. दामोदर मेरे वक्षस्थल (छाती) की रक्षा करें। वामन भगवान मेरी कुक्षि (पेट) की रक्षा करें। पद्मनाभ मेरी नाभि की रक्षा करें और माधव मेरी पीठ की रक्षा करें।

७. विश्वात्मा मेरी कटि (कमर) की रक्षा करें। त्रिविक्रम मेरी जांघों की रक्षा करें। जगन्नाथ मेरे घुटनों की रक्षा करें और जनार्दन मेरी पिंडलियों की रक्षा करें।

८. नारायण मेरे टखनों (Ankles) की रक्षा करें। श्रीधर मेरे पैरों की रक्षा करें। भगवान विष्णु मेरे संपूर्ण अंगों की रक्षा करें और श्री हरि मेरे शरीर के सभी जोड़ों की रक्षा करें।

९. पूर्व दिशा में गोविंद मेरी रक्षा करें। दक्षिण दिशा में भगवान नृहरि रक्षा करें। पश्चिम दिशा में गरुड़ध्वज मेरी रक्षा करें और उत्तर दिशा में श्रीपति मेरी रक्षा करें।

१०. ऊपर की ओर वैकुंठनाथ मेरी रक्षा करें और नीचे की ओर माधव मेरी रक्षा करें। सभी दोषों का निवारण करने वाले भगवान नित्य-निरंतर सब ओर से मेरी रक्षा करें।

११. यह 'त्रैलोक्य विजय' नामक कवच अत्यंत पुण्यदायी है। जो भी मनुष्य नित्य इसका पाठ करता है या इसे सुनता है, वह इस पृथ्वी पर सदा विजय का भागी होता है।

१२. इस नृसिंह कवच का केवल स्मरण करने मात्र से ही भूत, प्रेत, पिशाच, शाकिनी और डाकिनी आदि सभी नकारात्मक शक्तियां दूर भाग जाती हैं।

१३. यह परम अद्भुत 'त्रैलोक्य विजय' नामक कवच सभी प्रकार की शारीरिक-मानसिक व्याधियों (रोगों) को शांत करने वाला और जीवन की हर बाधा का निवारण करने वाला है।

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