सनातन वाणी • भक्ति, ज्ञान और कथा
06 Apr 2026
Sanatan Vani आधुनिक रूप में सनातन ज्ञान
स्तोत्र

अर्गला स्तोत्र

अर्गला स्तोत्र दुर्गा सप्तशती का अत्यंत महत्वपूर्ण स्तोत्र है। इसका पाठ करने से धन, विजय, शत्रु नाश, सुख-समृद्धि और देवी कृपा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र देवी दुर्गा की आराधना में कवच और कीलक के साथ पढ़ा जाता है।

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अर्गला स्तोत्र (मूल पाठ)

॥ ॐ नमश्चण्डिकायै ॥

मार्कण्डेय उवाच —

जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि ।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तुते ॥१॥

जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी ।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते ॥२॥

मधुकैटभविध्वंसि विधात्रि वरदे नमः ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥३॥

महिषासुरनिर्नाशि भक्तानां सुखदे नमः ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥४॥

रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥५॥

शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्रलोचनमर्दिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥६॥

वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥७॥

अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥८॥

नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चापर्णे दुरितापहे ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥९॥

स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१०॥

चण्डिके सततं युद्धे जयन्ती पापनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥११॥

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम् ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१२॥

विधेहि देवि कल्याणं विधेहि विपुलां श्रियम् ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१३॥

विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१४॥

सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१५॥

विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१६॥

प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१७॥

चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रे संवृते परमेश्वरि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१८॥

कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१९॥

हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥२०॥

इन्द्राणिपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥२१॥

देवि प्रचण्डदोरदण्डदैत्यदर्पविनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥२२॥

देवि भक्तजनोद्धारदत्तानन्दोदयेऽम्बिके ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥२३॥

पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् ।
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम् ॥२४॥

इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः ।
स तु सप्तशतीसंख्यां वरमाप्नोति दुर्लभम् ॥२५॥


हिंदी अर्थ

अर्गला स्तोत्र में देवी दुर्गा से प्रार्थना की जाती है —

  • मुझे रूप दें
  • मुझे विजय दें
  • मुझे यश दें
  • मेरे शत्रुओं का नाश करें
  • सौभाग्य दें
  • आरोग्य दें
  • धन-समृद्धि दें
  • सफलता दें

यह स्तोत्र देवी से जीवन की सभी सफलताओं की कामना करता है।


अर्गला स्तोत्र पढ़ने की विधि

  1. स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें
  2. माता दुर्गा की तस्वीर रखें
  3. घी का दीपक जलाएं
  4. लाल फूल अर्पित करें
  5. दुर्गा कवच पढ़ें
  6. अर्गला स्तोत्र पढ़ें
  7. कीलक स्तोत्र पढ़ें
  8. दुर्गा सप्तशती पाठ करें

अर्गला स्तोत्र पढ़ने के फायदे

✔ शत्रु नाश
✔ धन प्राप्ति
✔ सफलता
✔ विजय प्राप्ति
✔ सौभाग्य बढ़ता है
✔ रोग दूर होते हैं
✔ भय समाप्त होता है
✔ देवी कृपा प्राप्त होती है
✔ कार्य सिद्धि होती है


किसे पढ़ना चाहिए

  • दुर्गा सप्तशती पाठ करने वाले
  • शत्रु से परेशान लोग
  • धन की कमी वाले
  • नौकरी/व्यापार में समस्या
  • विवाह में बाधा
  • सफलता चाहने वाले
  • देवी साधना करने वाले

कब पढ़ें

✔ नवरात्रि में
✔ रोज सुबह
✔ दुर्गा पूजा में
✔ सप्तशती पाठ से पहले
✔ शुक्रवार
✔ अष्टमी / नवमी




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