योगिनी एकादशी व्रत कथा
एक गलती और मिला सफेद कोढ़ का श्राप! 😱 कैसे एक माली ने पाई कुबेर की कृपा? योगिनी एकादशी की अद्भुत कथा। 👇

॥ श्री योगिनी एकादशी व्रत कथा (सम्पूर्ण वृत्तांत) ॥ 🐚✨🌺
धर्मराज युधिष्ठिर बोले— "हे जनार्दन! आपने ज्येष्ठ शुक्ल 'निर्जला एकादशी' का महात्म्य सुनाकर मेरा उद्धार किया। अब कृपा करके आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम और उसकी कथा बताएं।"
भगवान श्री कृष्ण बोले— "हे युधिष्ठिर! इस एकादशी का नाम 'योगिनी' है। यह भयंकर पापों का नाश करने वाली और संसार रूपी सागर में डूबते हुए मनुष्य के लिए नाव के समान है। इसकी कथा अलकापुरी के राजा कुबेर और उनके माली से जुड़ी है। ध्यानपूर्वक सुनो।"
१. अलकापुरी के राजा कुबेर और माली हेममाली
प्राचीन काल में 'अलकापुरी' नगरी में देवताओं के कोषाध्यक्ष राजा कुबेर शासन करते थे। वे भगवान शिव के परम भक्त थे। कुबेर के यहाँ हेममाली नाम का एक यक्ष माली था। उसका काम प्रतिदिन मानसरोवर से सुंदर फूल लाकर कुबेर के पूजन के लिए देना था।
हेममाली की पत्नी का नाम विशालाक्षी था, जो अत्यंत सुंदर और प्रियभाषिणी थी। हेममाली अपनी पत्नी के प्रति बहुत अधिक आसक्त (मोहित) था।
२. कर्तव्य में चूक और विलासिता
एक दिन हेममाली मानसरोवर से फूल तो ले आया, लेकिन वह सीधे राजा कुबेर के पास जाने के बजाय अपने घर चला गया। पत्नी के प्रेम-पाश में बंधकर वह इतना खो गया कि उसे समय का ज्ञान ही नहीं रहा। उधर, राजा कुबेर दोपहर तक शिव-पूजन के लिए फूलों का इंतज़ार करते रहे।
जब पूजा का समय निकल गया, तो कुबेर ने क्रोध में आकर अपने सेवकों को भेजा और पूछा— "जाओ देखो, वह माली अभी तक फूल लेकर क्यों नहीं आया?"
३. राजा कुबेर का भयंकर श्राप
सेवकों ने वापस आकर बताया— "हे राजन्! वह माली तो अपनी पत्नी के साथ काम-क्रीड़ा में व्यस्त है।" यह सुनकर कुबेर के क्रोध की सीमा न रही। उन्होंने तुरंत हेममाली को दरबार में बुलाया।
कांपते हुए हेममाली को देखकर कुबेर बोले— "अरे पापी! तूने मेरे आराध्य महादेव का अपमान किया है। तू कामवासना के वशीभूत होकर अपने धर्म से विमुख हुआ है। जा, मैं तुझे श्राप देता हूँ कि तू अभी इसी क्षण पृथ्वी पर जाकर सफेद कोढ़ (श्वेत कुष्ठ) का रोगी हो जाएगा और अपनी प्रिय पत्नी से भी तेरा वियोग हो जाएगा।"
४. पृथ्वी पर कष्ट और पश्चाताप
कुबेर के श्राप के प्रभाव से हेममाली स्वर्ग से गिरकर पृथ्वी पर आ गया। उसका शरीर सफेद कोढ़ से गलने लगा और वह भयंकर दुर्गंध और पीड़ा से भर गया। वह घने जंगलों में भटकने लगा। उसे न दिन में चैन मिलता, न रात में नींद। परंतु भगवान शिव की कृपा से उसे अपने पिछले जन्म और अपनी भूल की याद बनी रही।
५. महर्षि मार्कण्डेय का दर्शन और उपाय
भटकते-भटकते हेममाली हिमालय पर्वत पर पहुँचा, जहाँ महर्षि मार्कण्डेय का आश्रम था। हेममाली मुनि के चरणों में गिर पड़ा और रोने लगा। महर्षि ने उससे पूछा— "बेटा! तूने कौन से भयंकर पाप किए हैं जिससे तेरी यह दशा हुई?"
हेममाली ने सत्य-सत्य सारी बात बता दी। मार्कण्डेय ऋषि को उस पर दया आ गई। उन्होंने कहा— "हे हेममाली! तूने सत्य बोला है, इसलिए मैं तुझे उद्धार का मार्ग बताता हूँ। तू आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की 'योगिनी एकादशी' का विधिपूर्वक व्रत कर। इसके पुण्य से तेरा श्राप निश्चित ही नष्ट हो जाएगा।"
६. व्रत का फल और कायाकल्प
हेममाली ने ऋषि के चरणों में सिर झुकाया और पूर्ण श्रद्धा के साथ योगिनी एकादशी का व्रत किया। उसने निराहार रहकर भगवान विष्णु का पूजन और रात्रि जागरण किया।
व्रत के प्रभाव से उसका शरीर दिव्य हो गया और कोढ़ का रोग जड़ से समाप्त हो गया। वह पुनः स्वर्ग लोक में अपनी पत्नी विशालाक्षी के पास पहुँच गया और सुखपूर्वक रहने लगा।
॥ व्रत का महत्व और फल ॥ 📋💎
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं— "हे युधिष्ठिर! योगिनी एकादशी का व्रत समस्त पापों को भस्म करने वाला है। जो मनुष्य इस कथा को पढ़ता या सुनता है, उसे अठासी हज़ार (88,000) ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान फल प्राप्त होता है।