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23 Mar 2026
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व्रत कथा

तुलसी विवाह कथा

तुलसी विवाह कथा का महत्व, कथा और पूजा विधि पढ़ें।

तुलसी विवाह कथा
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॥ श्री तुलसी विवाह (वृन्दा-जालंधर) कथा ॥ 🌿💍

कथा प्रारम्भ:

प्राचीन काल में जालंधर नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली असुर राजा था। वह समुद्र का पुत्र था और उसका विवाह वृन्दा नाम की कन्या से हुआ था। वृन्दा भगवान विष्णु की परम भक्त और अत्यंत पतिव्रता स्त्री थी। वृन्दा के पतिव्रत धर्म की शक्ति के कारण जालंधर इतना शक्तिशाली हो गया था कि उसे कोई भी देव या दानव युद्ध में पराजित नहीं कर सकता था।

जालंधर ने अपनी शक्ति के मद में आकर स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया और देवताओं को पराजित कर दिया। भयभीत होकर सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गए और रक्षा की प्रार्थना की। भगवान विष्णु जानते थे कि जब तक वृन्दा का सतीत्व और पतिव्रत धर्म सुरक्षित है, तब तक जालंधर का वध करना असंभव है।

इधर जालंधर और भगवान शिव के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। जब जालंधर युद्ध के लिए जा रहा था, तब वृन्दा ने विजय के संकल्प के साथ पूजा प्रारम्भ की और कहा कि जब तक पति युद्ध से लौट नहीं आते, वह पूजा का त्याग नहीं करेगी। वृन्दा के तप के प्रभाव से महादेव के प्रहार भी जालंधर का कुछ नहीं बिगाड़ पा रहे थे।

देवताओं के कल्याण के लिए भगवान विष्णु ने एक युक्ति निकाली। उन्होंने जालंधर का रूप धारण किया और वृन्दा के महल में पहुँच गए। अपने पति को जीवित और विजयी समझकर वृन्दा अत्यंत प्रसन्न हुई और उसने अपनी पूजा छोड़ दी। पूजा के खंडित होते ही वृन्दा का पतिव्रत धर्म भंग हो गया और उधर युद्ध भूमि में भगवान शिव ने जालंधर का वध कर दिया।

जब वृन्दा को सत्य का बोध हुआ कि उसके सम्मुख खड़े व्यक्ति स्वयं भगवान विष्णु हैं, तो वह अत्यंत दुखी और क्रोधित हुई। उसने भगवान विष्णु को पत्थर हो जाने का श्राप दे दिया। भगवान विष्णु ने वृन्दा के श्राप को स्वीकार किया और वे पत्थर के 'शालिग्राम' बन गए।

सृष्टि के पालनहार के पत्थर बन जाने से चराचर जगत में हाहाकार मच गया। देवताओं और लक्ष्मी माता की प्रार्थना पर वृन्दा ने अपना श्राप वापस ले लिया और स्वयं जालंधर के शव के साथ सती हो गई। वृन्दा की राख से जो पौधा उत्पन्न हुआ, उसे भगवान विष्णु ने 'तुलसी' नाम दिया और आशीर्वाद दिया कि "तुम मुझे लक्ष्मी से भी अधिक प्रिय रहोगी। मेरा एक रूप पत्थर (शालिग्राम) के रूप में रहेगा, जिसकी पूजा तुलसी के बिना अधूरी मानी जाएगी।"

भगवान विष्णु ने यह भी कहा कि "जो मनुष्य कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन तुलसी के साथ मेरे शालिग्राम स्वरूप का विवाह सम्पन्न कराएगा, उसे कन्यादान के समान पुण्य प्राप्त होगा।" तभी से प्रत्येक वर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवोत्थानी एकादशी) को तुलसी विवाह का उत्सव मनाया जाता है।


॥ तुलसी विवाह के नियम और पूजन विधि ॥ 📋✨

  1. मंडप निर्माण: घर के आंगन में तुलसी के पौधे के चारों ओर गन्ने का सुन्दर मंडप बनाया जाता है।

  2. शृंगार: तुलसी माता को लाल चुनरी ओढ़ाई जाती है और उनका सोलह शृंगार (चूड़ी, बिंदी, मेहंदी आदि) किया जाता है।

  3. शालिग्राम स्थापना: भगवान शालिग्राम को चौकी पर स्थापित कर उन्हें पीले वस्त्र पहनाए जाते हैं।

  4. विवाह रस्म: विवाह की तरह ही शालिग्राम और तुलसी के फेरे करवाए जाते हैं और गठबंधन किया जाता है।

  5. नैवेद्य: इस दिन भगवान को विशेष रूप से आंवला, बेर, शकरकंद और सिंघाड़े का भोग लगाया जाता है।

  6. दीपदान: पूरे घर और मंदिर में घी के दीपक जलाए जाते हैं।

  7. कथा श्रवण: विवाह सम्पन्न होने के बाद श्रद्धापूर्वक इस कथा को सुना जाता है और अंत में मंगलाष्टक का पाठ किया जाता है।


॥ तुलसी विवाह का धार्मिक महत्व ॥ 🔱🌟

  • देव प्रबोधन: यह दिन चातुर्मास की समाप्ति और भगवान विष्णु के जागने का प्रतीक है।

  • प्रकृति और ईश्वर का मिलन: तुलसी (प्रकृति) और शालिग्राम (ईश्वर) का विवाह जीव और शिव के मिलन को दर्शाता है।

  • पवित्रता का संदेश: यह पर्व सती वृन्दा के पातिव्रत्य धर्म और भक्ति की महिमा को उजागर करता है।

  • मांगलिक कार्यों का आरम्भ: इस विवाह के बाद से ही हिन्दू धर्म में विवाह और अन्य सभी शुभ कार्य पुनः प्रारम्भ होते हैं।


॥ तुलसी विवाह के लाभ और फल ॥ 💎🌈

  • कन्यादान का पुण्य: जिन लोगों के पुत्री नहीं होती, वे तुलसी विवाह करवाकर कन्यादान का फल प्राप्त कर सकते हैं।

  • दांपत्य सुख: वैवाहिक जीवन में आ रहे तनाव और क्लेश इस व्रत और विवाह उत्सव से दूर हो जाते हैं।

  • मोक्ष की प्राप्ति: मान्यता है कि तुलसी जी की सेवा और पूजन करने वाले व्यक्ति को अंत समय में यमदूतों का भय नहीं रहता और उसे विष्णु लोक की प्राप्ति होती है।

  • ग्रह शांति: शालिग्राम और तुलसी की पूजा से घर के वास्तु दोष और ग्रहों के अशुभ प्रभाव शांत होते हैं।

  • मनोकामना पूर्ति: सच्चे मन से तुलसी विवाह का उत्सव मनाने से भक्तों की सभी रुकी हुई कामनाएं पूर्ण होती हैं।

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