स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्र सम्पूर्ण पाठ, हिन्दी अर्थ, लाभ एवं विधि
स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्र भगवान भैरव के स्वर्णाकर्षण रूप की स्तुति है। इसका पाठ करने से धन, समृद्धि, व्यापार में वृद्धि, आर्थिक बाधाओं से मुक्ति और लक्ष्मी प्राप्ति होती है। यह स्तोत्र विशेष रूप से धन आकर्षण के लिए प्रसिद्ध है।
देवराजसेव्यमानपावनाङ्घ्रिपङ्कजं भानुकोटिभास्वरं भवाब्धितारकं परं शूलटङ्कपाशदण्डपाणिमादिकारणं भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशकं रत्नपादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मकं अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसन्ततिं भूतसंघनायकं विशालकीर्तिदायकं कालभैरवाष्टकं पठन्ति ये मनोहरं देवताओं द्वारा पूजित, सर्प को यज्ञोपवीत धारण करने वाले, चन्द्रशेखर, कृपालु, नारद आदि योगियों द्वारा वंदित कालभैरव को मैं प्रणाम करता हूँ। करोड़ सूर्यों के समान तेजस्वी, संसार सागर से पार लगाने वाले, इच्छित फल देने वाले त्रिनेत्र कालभैरव को मैं प्रणाम करता हूँ। त्रिशूल, खड्ग और पाश धारण करने वाले, ताण्डव प्रिय, अत्यंत शक्तिशाली भैरव को मैं प्रणाम करता हूँ। भोग और मोक्ष देने वाले, भक्तों को प्रिय, स्वर्ण किंकिणी से अलंकृत कालभैरव को मैं प्रणाम करता हूँ। धर्म की रक्षा करने वाले, कर्म बंधन काटने वाले, स्वर्णमय आभा वाले भैरव को मैं प्रणाम करता हूँ। रत्नमय चरण वाले, मृत्यु का अभिमान नष्ट करने वाले कालभैरव को मैं प्रणाम करता हूँ। अट्टहास से ब्रह्मांड को कंपित करने वाले, पाप नाश करने वाले, अष्ट सिद्धि देने वाले कालभैरव को मैं प्रणाम करता हूँ। भूतों के स्वामी, पाप-पुण्य शुद्ध करने वाले, जगत के स्वामी कालभैरव को मैं प्रणाम करता हूँ। ॐ ह्रीं स्वर्णाकर्षण भैरवाय नमःस्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्र (सम्पूर्ण)
व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम्।
नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगम्बरं
काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥1॥
नीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम्।
कालकालमम्बुजाक्षमक्षशूलमक्षरं
काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥2॥
श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम्।
भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियं
काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥3॥
भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम्।
निक्वणन्मनोज्ञहेमकिङ्किणीलसत्कटिं
काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥4॥
कर्मपाशमोचकं सुशर्मदायकं विभुम्।
स्वर्णवर्णशेषपाशशोभिताङ्गमण्डलं
काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥5॥
नित्यमद्वितीयमिष्टदैवतं निरंजनम्।
मृत्युदर्पनाशनं करालदंष्ट्रमोक्षणं
काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥6॥
दृष्टिपातनष्टपापजालमुग्रशासनम्।
अष्टसिद्धिदायकं कपालमालिकाधरं
काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥7॥
काशिवासलोकपुण्यपापशोधकं विभुम्।
नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिं
काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥8॥
फलश्रुति
ज्ञानमुक्तिसाधनं विचित्रपुण्यवर्धनम्।
शोकमोहदैन्यलोभकोपतापनाशनं
ते प्रयान्ति कालभैरवाङ्घ्रिसन्निधिं ध्रुवम्॥
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