संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा
आग की भट्टी में भी नहीं जला मासूम बच्चा! 😱 जानिए संकष्टी चतुर्थी की वो कथा जो हर संकट को टाल देती है। 👇

॥ श्री संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा (सम्पूर्ण वृत्तांत) ॥ 🐘✨🔱
प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है। एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से पूछा— "हे कृष्ण! किस व्रत के करने से मनुष्य के समस्त संकट दूर हो जाते हैं और उसे सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है? कृपया विस्तार से बताएं।"
भगवान श्री कृष्ण ने कहा— "हे कुन्तीपुत्र! आषाढ़ मास (या विभिन्न महीनों) की संकष्टी चतुर्थी का व्रत महापुण्यदायी है। मैं तुम्हें वह कथा सुनाता हूँ जो प्राचीन काल में प्रचलित थी।"
१. कुम्हार और राजा की आज्ञा
प्राचीन समय में एक नगर में एक कुम्हार रहता था। वह मिट्टी के बर्तन बनाता था, लेकिन एक बार जब उसने आवा (बर्तन पकाने की भट्टी) लगाया, तो बर्तन कच्चे ही रह गए, वे पके नहीं। उसने बार-बार प्रयास किया, लेकिन हर बार बर्तन कच्चे ही निकलते।
हारकर कुम्हार राजा के पास पहुँचा। राजा ने राज-पंडितों को बुलाया और उपाय पूछा। पंडितों ने अपनी गणना के बाद कहा— "महाराज! यदि इस आवे में किसी बच्चे की बलि दी जाए, तो आवा पक जाएगा और बर्तन सिद्ध हो जाएंगे।"
२. बुढ़िया का पुत्र और संकष्टी का व्रत
राजा की आज्ञा से नगर में घोषणा कर दी गई कि जिस परिवार में एक से अधिक पुत्र हैं, उन्हें एक पुत्र बलि के लिए देना होगा। उस नगर में एक गरीब बुढ़िया रहती थी, जिसका एक ही पुत्र था। कुम्हार ने धोखे से उसी बुढ़िया के इकलौते पुत्र को बलि के लिए चुन लिया।
वह दिन संकष्टी चतुर्थी का था। बुढ़िया अत्यंत दुखी थी, लेकिन राजा की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकती थी। उसने अपने पुत्र को विदा करते समय उसे गणेश जी का एक 'सुपारी' रूपी प्रतीक दिया और कहा— "बेटा! भगवान गणेश तेरी रक्षा करेंगे। तू बस उनका नाम जपता रहना।"
३. गणेश जी का चमत्कार
बुढ़िया का पुत्र आवे के भीतर बैठा दिया गया और ऊपर से मिट्टी-ईंधन डालकर आग लगा दी गई। बुढ़िया घर पर बैठकर निर्जल व्रत करने लगी और भगवान गणेश से अपने पुत्र के प्राणों की भीख मांगने लगी।
चमत्कार यह हुआ कि पूरी रात भयंकर आग जलने के बावजूद, वह आवा पूरी तरह ठंडा रहा। अगले दिन जब कुम्हार ने आवा खोला, तो वह दंग रह गया। उसके सारे बर्तन न केवल अच्छी तरह पक चुके थे, बल्कि बुढ़िया का पुत्र भी जीवित और सुरक्षित बैठा था। भगवान गणेश की कृपा से उस बालक का बाल भी बांका नहीं हुआ था।
४. राजा का पश्चाताप और फल
जब राजा को इस बात का पता चला, तो उसने बुढ़िया को बुलाया। बुढ़िया ने बताया कि यह सब संकष्टी चतुर्थी व्रत का प्रभाव है। राजा ने अपनी गलती मानी और पूरे राज्य में घोषणा करवाई कि आज से हर मास की चतुर्थी को भगवान गणेश का पूजन किया जाएगा।
॥ व्रत की विधि और नियम ॥ 📋💎
| नियम | विवरण |
| पूजन | भगवान गणेश का अभिषेक कर उन्हें दूर्वा, मोदक और लाल फूल चढ़ाएं। |
| उपवास | यह व्रत सूर्योदय से शुरू होता है और चंद्रोदय के बाद समाप्त होता है। |
| चंद्र दर्शन | रात में चंद्रमा को अर्घ्य देना अनिवार्य है, इसके बिना व्रत पूर्ण नहीं होता। |
| अर्घ्य मंत्र | 'गगनार्णवमाणिक्य चन्द्र दाक्षायणीपते। गृहाणार्घ्यं मया दत्तं गणेशप्रतिरूपक॥' |



