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02 May 2026
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व्रत कथा

निर्जला एकादशी व्रत कथा

क्या भीम को मिला 25 एकादशियों का फल? 😱 जानिए निर्जला एकादशी की वो कथा जिसने शक्तिशाली भीम को भी झुका दिया। 👇

निर्जला एकादशी व्रत कथा
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॥ श्री निर्जला एकादशी व्रत कथा (सम्पूर्ण वृत्तांत) ॥ 🐚✨🔥

जब वेदव्यास जी ने पाण्डवों को चारों पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प कराया, तब भीमसेन ने अपनी एक विशेष समस्या उनके सामने रखी।

१. भीमसेन की दुविधा और वृक-अग्नि

भीमसेन बोले— "हे परम पूज्य पितामह! मेरे परिवार के सभी लोग— भ्राता युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव— प्रत्येक एकादशी को व्रत रखते हैं और मुझे भी व्रत रखने को कहते हैं। परंतु महाराज, मेरी समस्या यह है कि मैं भगवान की भक्ति और पूजा-अर्चना तो बहुत प्रेम से कर सकता हूँ, लेकिन मैं भूखा नहीं रह सकता।"

भीम ने आगे कहा— "मेरे उदर (पेट) में 'वृक' नाम की एक भयंकर अग्नि प्रज्वलित रहती है। जब तक मैं पर्याप्त भोजन न कर लूँ, वह शांत नहीं होती। अतः मेरे लिए महीने में दो दिन उपवास करना असंभव है। क्या कोई ऐसा उपाय है जिससे बिना हर एकादशी को भूखे रहे, मुझे मोक्ष और एकादशियों का पुण्य मिल सके?"

२. महर्षि व्यास का समाधान

भीमसेन की बात सुनकर व्यास जी मुस्कुराए और बोले— "हे भीम! यदि तुम नरक से बचना चाहते हो और स्वर्गलोक की प्राप्ति की इच्छा रखते हो, तो तुम्हें एकादशी के दिन भोजन नहीं करना चाहिए।"

भीमसेन भयभीत होकर बोले— "हे ऋषिवर! मैं तो एक समय भोजन किए बिना भी नहीं रह सकता, तो पूरा दिन और रात उपवास कैसे करूँगा? कृपया मुझे कोई ऐसा एक ही व्रत बताएं, जिसे करने से मुझे साल भर की सभी एकादशियों का फल मिल जाए।"

३. निर्जला एकादशी का विधान

तब व्यास जी ने कहा— "हे कुन्तीपुत्र! ध्यान से सुनो। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है, उसे 'निर्जला एकादशी' कहते हैं। इस व्रत में आचमन के अलावा जल की एक बूंद भी ग्रहण करना वर्जित है।

सूर्योदय से लेकर अगले दिन (द्वादशी) के सूर्योदय तक जल और अन्न का त्याग करना होता है। जो मनुष्य इस दिन निर्जल रहकर व्रत करता है, उसे वर्ष भर की सभी २४ एकादशियों का फल केवल इस एक व्रत से मिल जाता है। स्वयं भगवान ने मुझसे कहा है कि इस व्रत का पुण्य अक्षय है।"

४. भीमसेन का कठिन संकल्प

व्यास जी के वचनों को सुनकर भीमसेन इस कठिन व्रत को करने के लिए तैयार हो गए। ज्येष्ठ मास की भीषण गर्मी में, जब प्यास से कंठ सूखने लगता है, भीम ने बिना जल और अन्न के यह व्रत किया।

अगले दिन सुबह होते-होते भीमसेन भूख और प्यास के कारण मूर्छित हो गए। तब उनके भाइयों ने उन्हें गंगाजल पिलाकर उनकी मूर्छा दूर की और व्रत का पारण कराया। भीमसेन द्वारा किए जाने के कारण ही इसे 'भीमसेनी एकादशी' कहा जाने लगा।


॥ व्रत के नियम और विधि ॥ 📋💎

नियमविवरण
संकल्पदशमी की रात को ही तामसिक भोजन का त्याग करें और एकादशी को निर्जल रहने का संकल्प लें।
दान का महत्वइस दिन जल से भरे कलश, छतरी, पंखा, और खरबूजे का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
पूजाभगवान विष्णु (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) का ध्यान करें और रात्रि जागरण करें।
पारणद्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन कराकर और दान देकर ही स्वयं अन्न-जल ग्रहण करें।

॥ व्रत का फल ॥ 🌟

भगवान व्यास के अनुसार, जो व्यक्ति निर्जला एकादशी का व्रत पूरी निष्ठा से करता है, उसके करोड़ों जन्मों के पाप जलकर राख हो जाते हैं। उसे अंत समय में यमदूत नहीं, बल्कि भगवान विष्णु के पार्षद लेने आते हैं और वह वैकुण्ठ धाम को प्राप्त होता है।

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