गुरुवार व्रत कथा

गुरुवार व्रत कथा
प्राचीन समय की बात है। एक नगर में एक साहूकार अपनी पत्नी के साथ रहता था। उसके घर में धन-धान्य, ऐश्वर्य और सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, परंतु उसकी पत्नी को अपने धन का बड़ा अभिमान था। वह न तो भगवान की पूजा में मन लगाती थी और न ही दान-पुण्य में रुचि रखती थी। साधु-संत यदि उसके द्वार पर आते, तो वह उन्हें आदर नहीं देती थी। घर में वैभव होते हुए भी उसके मन में संतोष नहीं था।
एक दिन बृहस्पतिवार को भगवान विष्णु भक्त ब्राह्मण के वेश में उसके घर आए। उन्होंने द्वार पर खड़े होकर भिक्षा माँगी। साहूकार की पत्नी उस समय घर के काम में लगी थी। उसने झुंझलाकर कहा, “मेरे पास अभी समय नहीं है, आप आगे जाइए।”
ब्राह्मण शांत भाव से लौट गए। अगले गुरुवार को वे फिर आए और भिक्षा माँगी। इस बार भी उसने उन्हें टाल दिया। तीसरे गुरुवार को भी जब वही हुआ, तब ब्राह्मण ने विनम्रता से कहा, “हे देवी, यदि तुम इस प्रकार दान और धर्म से विमुख रहोगी, तो तुम्हारे घर का वैभव अधिक समय तक नहीं टिकेगा।”
उस स्त्री ने अभिमान में आकर कहा, “यदि ऐसा है तो बताइए, मेरे घर का धन कैसे नष्ट होगा?”
ब्राह्मण ने कहा, “यदि तुम चाहती हो कि धन शीघ्र नष्ट हो जाए, तो गुरुवार के दिन घर को गोबर से लीपो, सिर धोओ, पीले वस्त्र या पीली वस्तुओं का अनादर करो, और घर के पुरुषों से दाढ़ी-बाल कटवाओ। इससे बृहस्पति देव अप्रसन्न हो जाएँगे और घर का सारा वैभव नष्ट हो जाएगा।”
यह कहकर ब्राह्मण चले गए। उस स्त्री ने उनकी बात को सच मान लिया और वैसा ही करने लगी। कुछ ही समय में उसके घर की समृद्धि नष्ट होने लगी। धन समाप्त हो गया, अन्न का अभाव होने लगा, पशु-धन चला गया और घर में दरिद्रता छा गई। परिवार दुःखी रहने लगा।
अब वह स्त्री अपने किए पर पछताने लगी। एक दिन वही ब्राह्मण फिर उसके घर आए। इस बार वह स्त्री बहुत दुःखी थी। उसने उनके चरणों में गिरकर कहा, “मुझे क्षमा करें। मेरे घर की यह दशा क्यों हो गई? कृपा करके इसका उपाय बताइए।”
ब्राह्मण ने कहा, “हे देवी, यह सब तुम्हारे अहंकार और अधर्म का फल है। यदि तुम चाहो तो गुरुवार का व्रत श्रद्धा और नियमपूर्वक करो। बृहस्पति देव और भगवान विष्णु की पूजा करो, पीली वस्तुओं का आदर करो, केले के वृक्ष की पूजा करो, पीले वस्त्र धारण करो, ब्राह्मणों को पीला भोजन या चने की दाल का दान दो, और कथा सुनो। ऐसा करने से तुम्हारे घर का सुख-वैभव फिर लौट आएगा।”
स्त्री ने हाथ जोड़कर कहा, “मैं अवश्य ऐसा करूँगी।”
अगले गुरुवार से उसने पूरे श्रद्धाभाव से व्रत करना शुरू किया। वह प्रातः स्नान करके स्वच्छ पीले वस्त्र पहनती, पूजा स्थान को शुद्ध करती, भगवान विष्णु और बृहस्पति देव का पूजन करती, दीपक जलाती, कथा सुनती और पीली वस्तुओं का दान करती। उसने अहंकार छोड़ दिया, साधु-संतों का आदर करना शुरू किया और दान-पुण्य में मन लगाने लगी।
धीरे-धीरे उसके घर की दशा बदलने लगी। धन-धान्य आने लगा, अन्न के भंडार भरने लगे, परिवार में सुख-शांति लौट आई और घर में फिर से समृद्धि का वास हो गया। वह स्त्री अब विनम्र और धार्मिक बन गई। उसने भगवान का धन्यवाद किया और नियमित रूप से गुरुवार का व्रत करने लगी।
उसकी पड़ोसिनों ने जब उसके घर में फिर से सुख-समृद्धि देखी, तो उससे इसका कारण पूछा। उसने सबको गुरुवार व्रत का महत्त्व बताया। तब बहुत-सी स्त्रियों ने श्रद्धा से यह व्रत करना आरंभ किया और उन्हें भी इसका शुभ फल मिला।
इस प्रकार जो स्त्री या पुरुष श्रद्धा, भक्ति, पवित्रता और नियम के साथ गुरुवार का व्रत करता है, उसके घर में सुख, शांति, धन, संतान-सुख और समृद्धि का वास होता है। बृहस्पति देव और भगवान विष्णु की कृपा से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
बोलो बृहस्पति देव भगवान की जय।



