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कथा

सोलह सोमवार व्रत कथा

सोलह सोमवार व्रत कथा

सोलह सोमवार व्रत कथा

एक समय की बात है। एक नगर में एक धनवान साहूकार रहता था। उसके घर में धन-धान्य, मान-सम्मान और सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, परंतु वह संतानहीन था। इस कारण वह और उसकी पत्नी सदा दुःखी रहते थे। दोनों भगवान शिव के परम भक्त थे। वे नित्य शिव मंदिर जाते, विधिपूर्वक पूजा करते और संतान प्राप्ति की प्रार्थना करते।

उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर एक दिन माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा, “प्रभु, यह साहूकार और इसकी पत्नी बड़े श्रद्धालु हैं। ये सच्चे मन से आपकी आराधना करते हैं। कृपा करके इन्हें संतान का सुख दीजिए।”

भगवान शिव बोले, “देवि, इनके भाग्य में संतान नहीं है। फिर भी तुम्हारी प्रार्थना से इन्हें एक पुत्र अवश्य होगा, पर उसकी आयु अल्प होगी।”

कुछ समय बाद साहूकार के घर एक सुंदर पुत्र ने जन्म लिया। घर में हर्ष छा गया। माता-पिता ने बड़े प्रेम से उसका पालन-पोषण किया। जब वह बालक बड़ा होने लगा, तब एक दिन उसके माता-पिता को यह स्मरण हुआ कि उसकी आयु बहुत कम है। वे भीतर ही भीतर चिंतित रहने लगे, परंतु पुत्र को कुछ न बताया।

जब वह बालक पढ़ने-लिखने योग्य हुआ, तब उसे शिक्षा के लिए काशी भेजने का निश्चय किया गया। उसके साथ उसका मामा भी भेजा गया। यात्रा के लिए पर्याप्त धन, वस्त्र और आवश्यक सामग्री दी गई। साहूकार ने अपने पुत्र से कहा, “पुत्र, मार्ग में जहाँ भी योग्य ब्राह्मण मिलें, उनका आदर करना, यज्ञ-दान करना और भगवान शिव का स्मरण करते रहना।”

बालक और उसका मामा यात्रा करते हुए आगे बढ़े। जहाँ भी वे रुकते, ब्राह्मणों को भोजन कराते, दान देते और शिवभक्ति करते। इस प्रकार वे एक नगर में पहुँचे। उस दिन वहाँ के राजा की पुत्री का विवाह था। संयोग से जिस राजकुमार से उसका विवाह होना था, वह एक नेत्र से काना था। राजा को यह चिंता हुई कि यदि वर का दोष सबके सामने प्रकट हो गया, तो अपमान होगा।

तभी राजा की दृष्टि उस सुंदर बालक पर पड़ी। उसने सोचा कि कुछ समय के लिए इसी बालक को वर के रूप में मंडप में बैठा दिया जाए। विवाह की रस्में पूरी हो जाने के बाद उसे सम्मान देकर विदा कर देंगे। राजा ने विनम्रता से बालक और उसके मामा से आग्रह किया। परिस्थिति को देखकर वे तैयार हो गए।

विवाह की रस्में संपन्न हो गईं। जब कन्या विदा होने लगी, तब उस बालक ने चुपके से कन्या की ओढ़नी पर लिख दिया कि “तुम्हारा विवाह मेरे साथ नहीं, बल्कि उस राजकुमार के साथ किया जा रहा है जो एक नेत्र से काना है। मैं तो केवल समय बचाने के लिए यहाँ बैठाया गया था।”

जब राजकुमारी ने यह बात पढ़ी, तो उसने सच्चाई जान ली और विदा होने से मना कर दिया। इस प्रकार बालक और उसका मामा वहाँ से आगे चले गए। वे काशी पहुँचे और कुछ समय बाद एक दिन वही तिथि आई, जिस दिन उस बालक की आयु पूर्ण होनी थी।

उस दिन बालक ने अपने मामा से कहा, “मामा जी, आज मुझे कुछ अशुभ-सा अनुभव हो रहा है।” मामा ने उसे धैर्य बँधाया। बालक ने भगवान शिव का स्मरण किया, परंतु थोड़ी ही देर में वह भूमि पर गिर पड़ा और उसके प्राण निकल गए।

मामा शोक से व्याकुल हो उठा। वह रोने लगा और विलाप करने लगा। उसी समय भगवान शिव और माता पार्वती वहाँ से जा रहे थे। माता पार्वती ने उस विलाप को सुना और भगवान शिव से कहा, “प्रभु, यह रोने की आवाज कैसी है?”

भगवान शिव ने कहा, “यह उसी साहूकार के पुत्र का मामा है, जिसके पुत्र की आयु अल्प थी। आज उसकी आयु पूरी हो गई।”

माता पार्वती ने करुणा से भरकर कहा, “प्रभु, इस बालक को जीवनदान दीजिए। इसके माता-पिता इसे बहुत प्रेम करते हैं। इसकी मृत्यु से वे अत्यंत दुखी हो जाएँगे।”

भगवान शिव ने कहा, “देवि, इसके भाग्य में इतनी ही आयु थी।” परंतु माता पार्वती के बार-बार निवेदन करने पर भगवान शिव ने उस बालक को पुनः जीवनदान दे दिया।

बालक जीवित हो उठा। मामा की खुशी का ठिकाना न रहा। दोनों ने भगवान शिव और माता पार्वती को प्रणाम किया और उनकी कृपा के लिए धन्यवाद दिया।

कुछ समय बाद वे अपने नगर लौटने लगे। मार्ग में वे उसी नगर में पहुँचे जहाँ राजकुमारी का विवाह हुआ था। जब वहाँ के राजा और राजकुमारी को सच्चाई का पता चला, तो उन्होंने प्रसन्न होकर अपनी पुत्री का विवाह उसी बालक से कर दिया। दोनों सुखपूर्वक अपने घर लौटे।

जब साहूकार और उसकी पत्नी ने अपने पुत्र को जीवित और सकुशल देखा, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने पुत्रवधू का स्वागत किया और भगवान शिव की महान कृपा के लिए धन्यवाद दिया।

उसके बाद परिवार ने श्रद्धा और नियमपूर्वक सोलह सोमवार व्रत करना आरंभ किया। भगवान शिव की कृपा से उनके घर में सुख, शांति, समृद्धि और आनंद बना रहा। जो भी स्त्री या पुरुष श्रद्धा, विश्वास और विधिपूर्वक सोलह सोमवार का व्रत करता है, भगवान शिव उसकी मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं और जीवन के कष्ट दूर करते हैं।

बोलो भगवान शिव शंकर की जय।