पुत्रदा एकादशी व्रत कथा (श्रावण)
क्यों मिला राजा को प्यासी गाय का श्राप? 😱 जानिए पुत्रदा एकादशी की वो कथा जिसने बदल दिया राजा महीजित का भाग्य। 👇

॥ श्री श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत कथा (सम्पूर्ण वृत्तांत) ॥ 🐚✨👶
धर्मराज युधिष्ठिर ने पूछा— "हे प्रभु! श्रावण शुक्ल एकादशी का क्या नाम है और इसका क्या महत्व है? कृपा करके विस्तार से बताएं।"
भगवान श्री कृष्ण बोले— "हे युधिष्ठिर! इस एकादशी को 'पुत्रदा एकादशी' कहते हैं। यह संतान सुख देने वाली और समस्त पापों का नाश करने वाली है। इसकी कथा महिष्मति नगरी के राजा महीजित से जुड़ी है। ध्यानपूर्वक सुनो।"
१. राजा महीजित की चिंता और निसंतान दुख
प्राचीन काल में 'महिष्मति' नगरी में महीजित नाम के एक अत्यंत धर्मात्मा और दयालु राजा शासन करते थे। राजा के पास वैभव, धन और शक्ति की कोई कमी नहीं थी, परंतु उनकी कोई संतान नहीं थी। संतान न होने के कारण राजा दिन-रात दुखी रहते थे। वे सोचते थे— "पुत्र के बिना मनुष्य का यह लोक और परलोक दोनों ही सूने हैं।"
२. प्रजा का राजा के प्रति प्रेम और वन गमन
जब राजा की आयु ढलने लगी, तो उनकी प्रजा और मंत्री भी राजा के दुख से व्याकुल हो गए। मंत्रियों ने विचार किया कि राजा के उद्धार के लिए किसी सिद्ध ऋषि की शरण लेनी चाहिए। वे घने जंगलों में ऋषियों की खोज में निकल गए।
३. लोमश ऋषि का दर्शन और समाधान
भटकते-भटकते वे लोमश ऋषि के आश्रम पहुँचे। लोमश ऋषि अत्यंत वृद्ध और त्रिकालदर्शी थे। मंत्रियों ने राजा का दुख उन्हें सुनाया और इसका कारण पूछा।
लोमश ऋषि ने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा और बताया— "हे मंत्रियों! राजा महीजित अपने पूर्व जन्म में एक अत्यंत निर्धन और क्रोधी स्वभाव के वैश्य (व्यापारी) थे। ज्येष्ठ मास की तपती गर्मी में वे प्यास से व्याकुल होकर एक जलाशय पर पहुँचे। वहां एक प्यासी गाय पानी पी रही थी। राजा ने उस गाय को वहां से भगा दिया और स्वयं पानी पी लिया।"
४. पूर्व जन्म का पाप और उपाय
ऋषि ने आगे कहा— "गाय को प्यासा भगा देने के पाप के कारण वे इस जन्म में निसंतान हैं, परंतु उन्होंने अपने जीवन में जो अन्य शुभ कर्म किए, उसी के प्रभाव से उन्हें यह राज्य प्राप्त हुआ है। यदि तुम चाहते हो कि राजा को पुत्र मिले, तो तुम सभी मिलकर श्रावण शुक्ल एकादशी (पुत्रदा एकादशी) का व्रत करो और उसका पुण्य राजा को दान कर दो।"
५. व्रत का अनुष्ठान और फल
मंत्रियों ने वापस आकर राजा को पूरी बात बताई। श्रावण शुक्ल एकादशी आने पर राजा, रानी और पूरी प्रजा ने मिलकर विधि-विधान से व्रत किया। अगले दिन द्वादशी को उन्होंने अपने व्रत का पुण्य राजा महीजित को अर्पित कर दिया।
भगवान विष्णु की कृपा और व्रत के प्रभाव से रानी ने कुछ समय बाद एक अत्यंत तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। पूरी नगरी में उत्सव मनाया गया और राजा के पितर भी तृप्त हो गए।
॥ व्रत का महत्व और फल ॥ 📋💎
| मुख्य लाभ | आध्यात्मिक संदेश |
| संतान सुख | निसंतान दंपत्तियों के लिए यह व्रत सर्वोत्तम औषधि के समान है। |
| पापों का नाश | अनजाने में किए गए जघन्य पापों से भी मुक्ति मिलती है। |
| वंश वृद्धि | परिवार की निरंतरता और पितरों की सद्गति सुनिश्चित होती है। |



