पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा
पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा का महत्व, कथा और पूजा विधि पढ़ें।

॥ श्री पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा ॥ 🌸🤱
कथा प्रारम्भ:
भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं— हे धर्मराज! पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम 'पुत्रदा' है। अब तुम इसकी कथा ध्यानपूर्वक सुनो। प्राचीन काल में भद्रावती नामक नगर में सुकेतुमान नाम का एक राजा राज्य करता था। उसकी रानी का नाम शैव्या था।
राजा के पास अपार धन-सम्पदा, राज्य और सुख-सुविधाएँ थीं, परंतु उसकी कोई संतान नहीं थी। इस कारण राजा और रानी सदैव चिंतित और दुखी रहते थे। राजा को यह सोचकर अत्यंत कष्ट होता था कि उसकी मृत्यु के पश्चात उसे और उसके पूर्वजों को पिण्डदान कौन देगा? पुत्र के बिना पितर और देवता भी तृप्त नहीं होते। राजा को अपना राजपाट और सुख-भोग सब व्यर्थ प्रतीत होते थे।
इसी चिंता में डूबा हुआ राजा एक दिन चुपचाप घोड़े पर सवार होकर वन की ओर चल दिया। वन में विचरण करते हुए राजा ने अनेक पशु-पक्षियों को देखा, परंतु उसके मन की अशांति दूर नहीं हुई। चलते-चलते दोपहर हो गई और राजा को प्यास लगने लगी। पानी की खोज में वह एक सरोवर के पास पहुँचा। वहाँ उसने देखा कि सरोवर के तट पर ऋषियों के आश्रम बने हुए हैं और बहुत से मुनि वेदपाठ कर रहे हैं।
राजा ने घोड़े से उतरकर मुनियों को प्रणाम किया। मुनियों ने प्रसन्न होकर राजा से कहा— "हे राजन्! हम तुमसे प्रसन्न हैं, तुम यहाँ किस प्रयोजन से आए हो? अपनी इच्छा बताओ।" राजा ने हाथ जोड़कर पूछा— "महाराज, आप कौन हैं और यहाँ किसलिए एकत्रित हुए हैं?"
मुनियों ने उत्तर दिया— "हे राजन्! हम विश्वेदेव हैं और आज 'पुत्रदा एकादशी' है। जो मनुष्य इस दिन व्रत करता है, उसे उत्तम संतान की प्राप्ति होती है। हम यहाँ इस सरोवर पर स्नान करने आए हैं।" राजा ने विनती की— "हे मुनिवर! मेरी कोई संतान नहीं है, जिसके कारण मैं अत्यंत दुखी हूँ। यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो कृपा करके मुझे पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद दें।"
मुनियों ने कहा— "हे राजन्! आज ही पुत्रदा एकादशी है। तुम विधि-विधान से इस एकादशी का व्रत करो। भगवान श्रीहरि की कृपा से तुम्हें अवश्य ही पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी।" ऋषियों के वचनों को मानकर राजा ने उसी स्थान पर एकादशी का पूर्ण व्रत किया और अगले दिन द्वादशी को पारण किया।
व्रत के प्रभाव से और मुनियों के आशीर्वाद से कुछ समय पश्चात रानी शैव्या ने गर्भ धारण किया और समय आने पर एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। वह पुत्र आगे चलकर अत्यंत वीर, यशस्वी और प्रजापालक राजा बना। अतः जो मनुष्य इस कथा को पढ़ता या सुनता है, उसे अंत में स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
॥ व्रत के नियम और पूजन विधि ॥ 📋✨
उपवास का संकल्प: दशमी की रात्रि से ही ब्रह्मचर्य का पालन करें और एकादशी के दिन सुबह जल्दी स्नान करके भगवान विष्णु के सम्मुख व्रत का संकल्प लें।
श्रीहरि पूजन: भगवान विष्णु (नारायण) की प्रतिमा को गंगाजल से स्नान कराकर पीले वस्त्र, पीला चंदन, पुष्प और धूप-दीप अर्पित करें।
फल और नैवेद्य: भगवान को ऋतु फलों और विशेष रूप से पंचामृत का भोग लगाएँ। तुलसी दल अवश्य अर्पित करें।
चावल निषेध: एकादशी के दिन घर में चावल बनाना और खाना पूर्णतः वर्जित है।
रात्रि जागरण: सम्भव हो तो रात्रि में सोएँ नहीं, बल्कि भगवान के भजनों और मंत्रों का कीर्तन करें।
द्वादशी पारण: अगले दिन द्वादशी तिथि को ब्राह्मणों को भोजन कराकर और दान-दक्षिणा देकर ही अपना व्रत खोलें।
॥ धार्मिक महत्व और लाभ ॥ 🔱💎
संतान प्राप्ति: जैसा कि नाम से स्पष्ट है, 'पुत्रदा' एकादशी का मुख्य फल योग्य और दीर्घायु संतान की प्राप्ति है।
पितृ ऋण से मुक्ति: पुत्र होने से पितरों को पिण्डदान मिलता है, जिससे वे नरक के दुखों से मुक्त होकर स्वर्ग को प्राप्त होते हैं।
पापों का नाश: यह व्रत जाने-अनजाने में किए गए जघन्य पापों को भी नष्ट करने की शक्ति रखता है।
मोक्ष प्रदायिनी: जो भक्त इस व्रत को निष्काम भाव से करते हैं, उन्हें जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति मिलकर वैकुण्ठ धाम की प्राप्ति होती है।