सनातन वाणी • भक्ति, ज्ञान और कथा
23 Mar 2026
Sanatan Vani आधुनिक रूप में सनातन ज्ञान
व्रत कथा

परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा

जब भगवान ने माँगी ३ कदम जमीन! 😱 जानिए परिवर्तिनी एकादशी की वो कथा जिसने राजा बलि को बनाया अमर। अभी पढ़ें! 👇

परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा
Google AdSense Space

॥ श्री परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा (सम्पूर्ण वृत्तांत) ॥ 🐚✨👣

धर्मराज युधिष्ठिर ने पूछा— "हे जनार्दन! भाद्रपद शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? इसकी विधि क्या है और इससे किस पुण्य की प्राप्ति होती है? कृपा कर विस्तार से बताएं।"

भगवान श्री कृष्ण बोले— "हे युधिष्ठिर! यह एकादशी समस्त पापों को नष्ट करने वाली और अंत में स्वर्ग देने वाली है। इस दिन भगवान के 'वामन' स्वरूप की पूजा की जाती है। इसकी कथा दैत्यराज बलि के उद्धार से जुड़ी है। ध्यानपूर्वक सुनो।"

१. दानवीर राजा बलि का प्रभुत्व

त्रेतायुग में 'बलि' नाम का एक अत्यंत दानवीर और प्रतापी दैत्यराज था। वह भगवान विष्णु का परम भक्त था, लेकिन वह स्वभाव से असुर था। उसने अपने बल और पराक्रम से इन्द्र समेत सभी देवताओं को पराजित कर दिया और तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल) पर अपना अधिकार जमा लिया। इन्द्र का सिंहासन छिन जाने के कारण सभी देवता अत्यंत दुखी होकर भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे।

२. भगवान का 'वामन' अवतार

देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु ने इन्द्र का राज्य वापस दिलाने का आश्वासन दिया। भगवान ने माता अदिति के गर्भ से 'वामन' (बौने ब्राह्मण) के रूप में जन्म लिया। वे हाथ में छतरी और कमंडल लेकर राजा बलि के पास पहुँचे, जहाँ बलि नर्मदा नदी के तट पर यज्ञ कर रहा था।

३. तीन पग भूमि का दान

राजा बलि ने वामन रूपी ब्राह्मण का बड़े आदर से स्वागत किया और पूछा— "हे विप्रवर! आप जो चाहें मांग लें, मैं आपको निराश नहीं करूँगा।"

वामन भगवान बोले— "हे राजन्! मुझे अपने रहने के लिए केवल तीन पग भूमि चाहिए।" बलि के गुरु शुक्राचार्य समझ गए कि यह साक्षात् विष्णु हैं और उन्होंने बलि को दान देने से मना किया। परंतु बलि अपने वचन पर अडिग रहा और उसने संकल्प ले लिया।

४. विराट स्वरूप और ब्रह्माण्ड का मापन

संकल्प लेते ही वामन भगवान ने अपना विराट स्वरूप धारण किया। उन्होंने पहले पग में पूरी पृथ्वी नाप ली। दूसरे पग में उन्होंने स्वर्ग लोक और सम्पूर्ण आकाश नाप लिया। अब तीसरे पग के लिए कोई स्थान शेष नहीं बचा।

भगवान ने पूछा— "हे बलि! अब तीसरा पग कहाँ रखूँ?"

५. राजा बलि का आत्मसमर्पण

राजा बलि ने भक्तिभाव से अपना सिर झुका दिया और कहा— "हे प्रभु! तीसरा पग मेरे मस्तक पर रखें।" भगवान ने अपना पैर बलि के सिर पर रखा, जिससे वह पाताल लोक में चला गया। बलि की भक्ति और वचनबद्धता देखकर भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए।

भगवान ने कहा— "हे बलि! मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूँ। तुम पाताल में निवास करो, मैं सदैव तुम्हारे द्वार का पहरा दूँगा।" इसी कारण भगवान का एक अंश पाताल लोक में बलि के यहाँ रहता है और दूसरा क्षीर सागर में शयन करता है।


॥ व्रत का महत्व और फल ॥ 📋💎

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं— "हे युधिष्ठिर! जो मनुष्य इस दिन वामन भगवान का पूजन करता है, उसे तीनों लोकों के पूजन का फल मिलता है। यह व्रत 'वाजपेय यज्ञ' के समान पुण्य देने वाला है।"

विशेष लाभ:

  • इस दिन व्रत करने से अनजाने में हुए पापों से मुक्ति मिलती है।

  • जो मनुष्य इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उन्हें स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है।

Google AdSense Space