मोहिनी एकादशी व्रत कथा
मोहिनी एकादशी व्रत कथा का महत्व, कथा और पूजा विधि पढ़ें।

॥ श्री मोहिनी एकादशी व्रत कथा ॥
मोहिनी एकादशी हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण एकादशी मानी जाती है, जो वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को आती है। यह व्रत सभी पापों का नाश करने वाला और मोक्ष दिलाने वाला माना जाता है।
कथा प्रारम्भ:
एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा— "हे जनार्दन! वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? इसकी विधि क्या है और इसके करने से क्या फल मिलता है? कृपा करके विस्तारपूर्वक बताने की कृपा करें।"
भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया— "हे कुंतीपुत्र युधिष्ठिर! यह एक अत्यंत पुण्यदायी और सभी पापों का नाश करने वाली एकादशी है, जिसे 'मोहिनी एकादशी' कहा जाता है। इस कथा को स्वयं ऋषि वशिष्ठ ने भगवान राम को सुनाई थी, जब वे सीता माता को खोने के बाद दुखी होकर वन-वन भटक रहे थे। अब मैं तुम्हें वही कथा सुनाता हूँ।"
पौराणिक कथा:
प्राचीन काल में भद्रावती नामक एक अत्यंत सुंदर और समृद्ध शहर था, जो राजा धृतिमान के शासनकाल में फलता-फूलता था। इस शहर में धनपाल नामक एक अत्यंत धनी और गुणी वैश्य (व्यापारी) रहता था। वह भगवान विष्णु का परम भक्त था और बहुत ही धर्मपरायण था। वह निरंतर दान-पुण्य करता था और दूसरों की मदद करता था।
धनपाल के पाँच बेटे थे। चार बड़े बेटे तो अपने पिता की तरह ही गुणी और धर्मपरायण थे, लेकिन सबसे छोटा बेटा, जिसका नाम धृष्टबुद्धि था, बहुत ही दुष्ट और अधर्मी था। वह पूरी तरह से गलत आदतों में डूबा हुआ था। वेश्यागमन, शराब पीना, मांस खाना और जुआ खेलना उसके नित्य के काम थे। उसने अपने पिता की मेहनत से कमाई गई बहुत सारी दौलत इन बुरे कामों में बर्बाद कर दी।
धनपाल ने धृष्टबुद्धि को बहुत समझाया, लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ। अंततः, निराश होकर धनपाल ने धृष्टबुद्धि को अपने घर से निकाल दिया। उसके रिश्तेदारों और समाज ने भी उसे त्याग दिया।
अकेला और दरिद्र, धृष्टबुद्धि वन-वन भटकने लगा। भूख और प्यास से व्याकुल, उसे अपने किए पर बहुत पश्चाताप हुआ। उसे अपनी गलतियों का एहसास हुआ और वह दुखी होकर रोने लगा। भटकते-भटकते वह ऋषि कौंडिन्य के आश्रम में पहुँचा। वह ऋषि के चरणों में गिर पड़ा और अपने पाप कबूल किए।
उसने ऋषि कौंडिन्य से पूछा— "हे ऋषिवर! मैंने बहुत सारे पाप किए हैं। क्या कोई ऐसा मार्ग है जिससे मेरे पाप नष्ट हो सकें और मुझे उद्धार मिल सके?"
ऋषि कौंडिन्य को धृष्टबुद्धि पर दया आ गई। उन्होंने उसे वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की 'मोहिनी एकादशी' का व्रत करने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि यह व्रत सभी पापों को नष्ट कर देता है और उद्धार दिलाता है। उन्होंने बताया कि भगवान विष्णु ने अमृत बांटने के लिए इसी दिन मोहिनी रूप धारण किया था, इसलिए इस एकादशी को 'मोहिनी एकादशी' कहा जाता है।
ऋषि के बताए अनुसार, धृष्टबुद्धि ने अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मोहिनी एकादशी का व्रत किया। उसने जागरण किया और भगवान विष्णु की पूजा की। उसने निराहार रहकर भगवान का स्मरण किया।
व्रत का परिणाम:
मोहिनी एकादशी व्रत के प्रभाव से धृष्टबुद्धि के सभी पाप नष्ट हो गए। उसका हृदय शुद्ध हो गया और उसे दिव्य देह प्राप्त हुई। अंत में, वह गरुड़ पर बैठकर विष्णु लोक (वैकुण्ठ) गया।
व्रत का महत्व और विधि:
पापों का नाश: मोहिनी एकादशी व्रत सभी पापों का नाश करने वाला माना जाता है।
मोक्ष प्राप्ति: यह व्रत करने वाले को मोक्ष की प्राप्ति होती है और वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।
विधि:
दशमी के दिन से ही सात्विक भोजन करें।
एकादशी के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें।
व्रत का संकल्प लें।
भगवान विष्णु की पूजा करें और उन्हें तुलसी अर्पित करें।
दिन भर निराहार रहकर भगवान का स्मरण करें।
रात्रि में जागरण करें।
द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान-दक्षिणा देकर ही व्रत खोलें।