श्री त्रैलोक्यमङ्गलकवचम्
नारद पांचरात्र में वर्णित 'त्रैलोक्य मंगल कवच' भगवान श्रीकृष्ण (गोपाल) का सिद्ध और चमत्कारिक रक्षा स्तोत्र है। इसके पाठ से सर्वत्र विजय और सुख मिलता है।

॥ श्री त्रैलोक्यमङ्गलकवचम् ॥
मूल संस्कृत पाठ
श्रीशिव उवाच । शृणु वक्ष्यामि विप्रर्षे कवचं परमाद्भुतम् । त्रैलोक्यमङ्गलं नाम शौरेश्च परमात्मनः ॥ १॥
पठनाद्धारणाद्यस्य त्रैलोक्यविजयी भवेत् । धनवान् पुत्रवान् लोके दीर्घायुः सुखभाग्भवेत् ॥ २॥
ॐ शिरो मे पातु गोविन्दो भालं माधव एव च । नेत्रे मे पातु नारायणः श्रोत्रे मे पातु केशवः ॥ ३॥
नासां मे पातु विश्वात्मा मुखं मे पातु श्रीपतिः । जिह्वां मे पातु जिष्णुश्च कण्ठं मे पातु श्रीधरः ॥ ४॥
वक्षो मे पातु दामोदरः कुक्षिं मे पातु वामनः । नाभिं मे पातु पद्मनाभः पृष्ठं मे पातु माधवः ॥ ५॥
कटिं मे पातु विश्वात्मा ऊरू मे पातु त्रिविक्रमः । जानुनी मे जगन्नाथो जङ्घे मे पातु जनार्दनः ॥ ६॥
गुल्फौ मे पातु नारायणः पादौ मे पातु श्रीधरः । सर्वाङ्गं पातु मे विष्णुः सर्वसन्धीन्मयो हरिः ॥ ७॥
पूर्वे मे पातु गोविन्दो दक्षिणे पातु माधवः । पश्चिमे पातु श्रीरङ्गो उत्तरे पातु जलेशयः ॥ ८॥
ऊर्ध्वं मे पातु त्रिलोकेशो ह्यधो मे पातु पातालवासः । सर्वतः पातु मे नित्यं सर्वदोषनिवारणः ॥ ९॥
इदं तु कवचं पुण्यं त्रैलोक्यमङ्गलाभिधम् । यः पठेच्छृणुयान्नित्यं स भवेज्जयभाग्भुवि ॥ १०॥
हिन्दी अनुवाद
१. भगवान शिव (नारद जी से) कहते हैं: हे विप्रर्षे (ब्राह्मण ऋषि)! सुनो, मैं परमात्मा शौरि (भगवान श्रीकृष्ण/गोपाल) के उस परम अद्भुत 'त्रैलोक्य मंगल' नामक कवच का वर्णन कर रहा हूँ।
२. जिसके पाठ करने और धारण करने से मनुष्य तीनों लोकों में विजयी हो जाता है, तथा इस संसार में वह अपार धनवान, पुत्रवान, लंबी आयु वाला और सभी सुखों का भोग करने वाला बन जाता है।
३. ॐ भगवान गोविंद मेरे सिर की रक्षा करें। माधव मेरे मस्तक (माथे) की रक्षा करें। भगवान नारायण मेरे दोनों नेत्रों की रक्षा करें और केशव मेरे कानों की रक्षा करें।
४. विश्वात्मा मेरी नासिका (नाक) की रक्षा करें। श्रीपति (माता लक्ष्मी के स्वामी) मेरे मुख की रक्षा करें। जिष्णु (सदा विजयी रहने वाले) मेरी जिह्वा (जीभ) की रक्षा करें और श्रीधर मेरे कंठ (गले) की रक्षा करें।
५. दामोदर मेरे वक्षस्थल (छाती) की रक्षा करें। वामन भगवान मेरी कुक्षि (पेट) की रक्षा करें। पद्मनाभ मेरी नाभि की रक्षा करें और माधव मेरी पीठ की रक्षा करें।
६. विश्वात्मा मेरी कटि (कमर) की रक्षा करें। त्रिविक्रम मेरी जांघों की रक्षा करें। जगन्नाथ मेरे घुटनों की रक्षा करें और जनार्दन मेरी पिंडलियों की रक्षा करें।
७. नारायण मेरे टखनों (Ankles) की रक्षा करें। श्रीधर मेरे पैरों की रक्षा करें। भगवान विष्णु मेरे संपूर्ण अंगों की रक्षा करें और श्री हरि मेरे शरीर के सभी जोड़ों (Joints) की रक्षा करें।
८. पूर्व दिशा में गोविंद मेरी रक्षा करें। दक्षिण दिशा में माधव रक्षा करें। पश्चिम दिशा में श्रीरंग मेरी रक्षा करें और उत्तर दिशा में जल में शयन करने वाले भगवान (क्षीरसागरवासी) मेरी रक्षा करें।
९. ऊपर की ओर तीनों लोकों के स्वामी मेरी रक्षा करें और नीचे पाताल में वास करने वाले भगवान मेरी रक्षा करें। सभी प्रकार के दोषों का निवारण करने वाले भगवान नित्य-निरंतर सब ओर से मेरी रक्षा करें।
१०. (फलश्रुति): यह 'त्रैलोक्य मंगल' नामक कवच अत्यंत पुण्यदायी और पवित्र है। जो भी मनुष्य नित्य इसका पाठ करता है या इसे सुनता है, वह इस पृथ्वी पर सदा विजय और मंगल का भागी होता है।