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कथा

एकादशी व्रत कथा

एकादशी व्रत कथा

एकादशी व्रत कथा

प्राचीन समय की बात है। धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, “हे जनार्दन! एकादशी तिथि का क्या महत्त्व है? इसका व्रत क्यों किया जाता है और इससे क्या फल प्राप्त होता है? कृपा करके विस्तार से बताइए।”

तब भगवान श्रीकृष्ण बोले, “हे धर्मराज! एकादशी व्रत अत्यंत पुण्यदायी, पापों का नाश करने वाला और मोक्ष प्रदान करने वाला है। जो मनुष्य श्रद्धा, भक्ति और नियमपूर्वक एकादशी का व्रत करता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।”

भगवान श्रीकृष्ण ने आगे कहा, “प्राचीन काल में एक मुर नाम का अत्यंत बलवान और भयंकर दैत्य था। उसने देवताओं को पराजित करके तीनों लोकों में आतंक फैला दिया। देवता भयभीत होकर भगवान शिव के पास गए, परंतु उन्होंने कहा कि इस संकट का निवारण केवल भगवान विष्णु ही कर सकते हैं। तब सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गए और उनसे अपनी रक्षा की प्रार्थना की।”

भगवान विष्णु ने देवताओं को आश्वासन दिया और मुर दैत्य से युद्ध करने चले गए। भगवान और दैत्य के बीच बहुत दिनों तक भयंकर युद्ध हुआ। मुर अत्यंत शक्तिशाली था। जब युद्ध लंबा खिंच गया, तब भगवान विष्णु थोड़ी देर विश्राम करने के लिए एक गुफा में चले गए।

मुर दैत्य भी उनका पीछा करते हुए वहाँ पहुँच गया। वह भगवान विष्णु को विश्राम करते देखकर उन्हें मारने के लिए आगे बढ़ा। उसी समय भगवान विष्णु के शरीर से एक दिव्य और तेजस्विनी कन्या प्रकट हुई। वह अत्यंत सुंदर, शक्तिशाली और प्रकाशमयी थी। उसने मुर दैत्य को ललकारा और उससे युद्ध करने लगी। कुछ ही समय में उस दिव्य कन्या ने मुर दैत्य का वध कर दिया।

जब भगवान विष्णु जागे, तो उन्होंने उस तेजस्विनी कन्या को देखा और पूछा, “हे देवी! तुम कौन हो? और इस दैत्य का वध किसने किया?”

कन्या ने विनम्रतापूर्वक कहा, “हे प्रभु! मैं आपके शरीर से उत्पन्न हुई हूँ। इस दैत्य ने जब आपको सोते समय मारने का प्रयास किया, तब मैंने इसका वध कर दिया।”

भगवान विष्णु उस कन्या से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, “तुमने देवताओं और संसार की रक्षा की है। इसलिए आज से तुम ‘एकादशी’ नाम से प्रसिद्ध होगी, क्योंकि तुम्हारा प्राकट्य एकादशी तिथि को हुआ है। जो भी स्त्री या पुरुष इस दिन व्रत करेगा, वह पापों से मुक्त होगा, उसे सुख, शांति, पुण्य और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होगी।”

तब से एकादशी तिथि को भगवान विष्णु की विशेष पूजा की जाती है। इस दिन भक्तजन उपवास रखते हैं, भगवान का स्मरण करते हैं, कथा सुनते हैं, भजन-कीर्तन करते हैं और सात्विक आचरण अपनाते हैं। मान्यता है कि एकादशी का व्रत करने से मन शुद्ध होता है, इंद्रियाँ संयमित होती हैं और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।

एक अन्य कथा के अनुसार, एक नगर में एक धर्मात्मा राजा राज्य करता था। वह स्वयं भी धर्म का पालन करता और प्रजा को भी धर्ममार्ग पर चलने की प्रेरणा देता था। एक बार उसके राज्य में एक पापाचारी व्यक्ति रहता था, जिसने जीवन में अनेक पाप किए थे। संयोगवश एक दिन उसने भोजन न मिलने के कारण एकादशी का उपवास कर लिया और रातभर जागरण में समय बिताया। अगले दिन उसका देहांत हो गया।

जब यमदूत उसे लेने आए, तब देखा गया कि अनजाने में भी उसने एकादशी व्रत का पुण्य प्राप्त कर लिया है। उसके पाप क्षीण हो गए और उसे उत्तम गति प्राप्त हुई। इससे एकादशी व्रत की महिमा और भी स्पष्ट होती है कि यह व्रत जानकर या अनजाने में भी बड़ा फल देने वाला है, यदि उसमें भगवान का स्मरण जुड़ जाए।

जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक एकादशी का व्रत करता है, दशमी से ही संयम रखता है, एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करता है, कथा सुनता है और द्वादशी को विधिपूर्वक पारण करता है, उसके जीवन के कष्ट दूर होते हैं। उसके घर में सुख-शांति आती है, पाप नष्ट होते हैं और अंत में भगवान विष्णु के धाम की प्राप्ति होती है।

इसलिए एकादशी का व्रत अत्यंत पवित्र, कल्याणकारी और मोक्षदायक माना गया है। यह केवल अन्न त्याग का व्रत नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म से पवित्र रहने का भी व्रत है। जो भक्त सच्चे मन से एकादशी का पालन करता है, भगवान विष्णु उस पर अपनी विशेष कृपा बरसाते हैं।

बोलो श्री हरि विष्णु भगवान की जय।