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02 May 2026
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व्रत कथा

देवउठनी एकादशी व्रत कथा

४ महीने बाद जागेंगे भगवान विष्णु! 😱 जानिए देवउठनी एकादशी की वो कथा जिसने तुलसी को बनाया भगवान की प्रिया। अभी पढ़ें! 👇

देवउठनी एकादशी व्रत कथा
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॥ श्री देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी व्रत कथा ॥ 🐚✨🔱

धर्मराज युधिष्ठिर ने पूछा— "हे जनार्दन! आपने 'रमा एकादशी' का महात्म्य सुनाकर मेरा संशय दूर किया। अब कृपा करके कार्तिक शुक्ल एकादशी के बारे में बताएं। इसका नाम क्या है और इसकी कथा क्या है?"

भगवान श्री कृष्ण बोले— "हे पाण्डुपुत्र! इस एकादशी का नाम 'प्रबोधिनी' है। यह अत्यंत पवित्र और समस्त पापों का नाश करने वाली है। ब्रह्मा जी ने नारद मुनि को जो उपदेश दिया था, वही मैं तुम्हें सुनाता हूँ।"

१. भगवान विष्णु के अनियमित शयन की समस्या

प्राचीन काल में माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की— "हे प्रभु! आप जब जागते हैं तो वर्षों तक जागते रहते हैं और जब सोते हैं तो हज़ारों वर्षों तक सोते ही रह जाते हैं। इससे पूरी सृष्टि का संतुलन बिगड़ जाता है और मेरे लिए भी सेवा का समय अनिश्चित रहता है। अतः आप नियम से प्रतिवर्ष वर्षा ऋतु में विश्राम करें, ताकि मुझे और अन्य देवताओं को भी विश्राम मिले।"

भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी की बात मान ली और कहा— "प्रिये! अब से मैं हर वर्ष चार मास (चातुर्मास) के लिए शयन करूँगा। मेरी यह निद्रा 'अल्प-निद्रा' कहलाएगी और जो भक्त इस दौरान मेरी सेवा करेंगे, उन्हें अक्षय पुण्य मिलेगा।"

२. शंखासुर का वध और वेदों की रक्षा

एक बार शंखासुर नाम का एक बलशाली दैत्य हुआ। उसने देवताओं को पराजित कर वेदों को चुरा लिया और समुद्र की गहराई में छिप गया। भगवान विष्णु ने 'मत्स्य अवतार' लेकर शंखासुर का वध किया और वेदों को पुनः देवताओं को सौंपा। इस भीषण युद्ध के बाद भगवान अत्यंत थक गए थे, इसलिए वे कार्तिक मास की शुक्ल एकादशी को विश्राम करने चले गए और चार महीने बाद पुनः जागृत हुए।

३. तुलसी-शालिग्राम विवाह (वृन्दा की कथा)

देवउठनी एकादशी का एक मुख्य भाग 'तुलसी विवाह' है, जिसकी कथा जलंधर और उसकी पत्नी वृन्दा से जुड़ी है।

असुर जलंधर की पत्नी वृन्दा अत्यंत पतिव्रता थी। उसके सतीत्व के कारण जलंधर अजेय हो गया था। देवताओं की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने छल से वृन्दा का सतीत्व भंग किया, जिससे जलंधर मारा गया। वृन्दा ने क्रोध में आकर भगवान विष्णु को 'पत्थर' (शालिग्राम) होने का श्राप दे दिया।

बाद में माता लक्ष्मी की प्रार्थना पर वृन्दा ने अपना श्राप वापस लिया और स्वयं सती हो गई। उसी की राख से तुलसी का पौधा जन्मा। भगवान विष्णु ने कहा— "हे वृन्दा! तुम्हारे सतीत्व का मान रखने के लिए मैं पत्थर (शालिग्राम) के रूप में रहूँगा और बिना तुलसी के भोग के कभी भोजन ग्रहण नहीं करूँगा।" इसीलिए देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी और शालिग्राम का विवाह बड़े धूमधाम से कराया जाता है।

४. व्रत की विधि और भगवान को जगाना

इस दिन भक्त दिन भर उपवास रखते हैं और शाम को आंगन में गन्ने का मण्डप बनाकर भगवान विष्णु के चरणों की पूजा करते हैं। शंख, घंटा और घड़ियाल बजाकर भगवान को जगाया जाता है और यह मंत्र बोला जाता है:

"उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पते।

त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्॥"

(अर्थ: हे गोविन्द! जागिए, जागिए। हे जगत के स्वामी! अपनी निद्रा त्यागिए। आपके सोने से पूरा संसार सो जाता है और आपके जागने से ही चराचर जगत जागृत होता है।)


॥ व्रत का महत्व और फल ॥ 📋💎

मुख्य लाभआध्यात्मिक संदेश
पाप मुक्तिहज़ारों जन्मों के किए गए पापों से मुक्ति मिलती है।
मांगलिक कार्यविवाह, गृह-प्रवेश आदि शुभ कार्यों की शुरुआत होती है।
अक्षय पुण्यइस दिन किया गया दान कभी समाप्त नहीं होता।
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