अर्गला स्तोत्र
अर्गला स्तोत्र दुर्गा सप्तशती का अत्यंत महत्वपूर्ण स्तोत्र है। इसका पाठ करने से धन, विजय, शत्रु नाश, सुख-समृद्धि और देवी कृपा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र देवी दुर्गा की आराधना में कवच और कीलक के साथ पढ़ा जाता है।
॥ ॐ नमश्चण्डिकायै ॥ मार्कण्डेय उवाच — जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि । जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी । मधुकैटभविध्वंसि विधात्रि वरदे नमः । महिषासुरनिर्नाशि भक्तानां सुखदे नमः । रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि । शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्रलोचनमर्दिनि । वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि । अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि । नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चापर्णे दुरितापहे । स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि । चण्डिके सततं युद्धे जयन्ती पापनाशिनि । देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम् । विधेहि देवि कल्याणं विधेहि विपुलां श्रियम् । विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः । सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके । विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु । प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे । चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रे संवृते परमेश्वरि । कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके । हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि । इन्द्राणिपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि । देवि प्रचण्डदोरदण्डदैत्यदर्पविनाशिनि । देवि भक्तजनोद्धारदत्तानन्दोदयेऽम्बिके । पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् । इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः । अर्गला स्तोत्र में देवी दुर्गा से प्रार्थना की जाती है — यह स्तोत्र देवी से जीवन की सभी सफलताओं की कामना करता है। ✔ शत्रु नाश ✔ नवरात्रि मेंअर्गला स्तोत्र (मूल पाठ)
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तुते ॥१॥
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते ॥२॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥३॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥४॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥५॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥६॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥७॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥८॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥९॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१०॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥११॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१२॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१३॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१४॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१५॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१६॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१७॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१८॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१९॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥२०॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥२१॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥२२॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥२३॥
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम् ॥२४॥
स तु सप्तशतीसंख्यां वरमाप्नोति दुर्लभम् ॥२५॥
हिंदी अर्थ
अर्गला स्तोत्र पढ़ने की विधि
अर्गला स्तोत्र पढ़ने के फायदे
✔ धन प्राप्ति
✔ सफलता
✔ विजय प्राप्ति
✔ सौभाग्य बढ़ता है
✔ रोग दूर होते हैं
✔ भय समाप्त होता है
✔ देवी कृपा प्राप्त होती है
✔ कार्य सिद्धि होती है
किसे पढ़ना चाहिए
कब पढ़ें
✔ रोज सुबह
✔ दुर्गा पूजा में
✔ सप्तशती पाठ से पहले
✔ शुक्रवार
✔ अष्टमी / नवमी