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कथा

सत्यनारायण कथा

सत्यनारायण कथा

श्री सत्यनारायण व्रत कथा एवं आरती

प्रथम अध्याय

एक समय नैमिषारण्य तीर्थ में शौनक आदि सभी ऋषियों तथा मुनियों ने पुराणशास्त्र के वेत्ता श्रीसूतजी महाराज से पूछा - महामुने! किस व्रत अथवा तपस्या से मनोवांछित फल प्राप्त होता है, उसे हम सब सुनना चाहते हैं।

श्री सूतजी बोले - इसी प्रकार देवर्षि नारदजी के द्वारा भी पूछे जाने पर भगवान श्रीकमलापतिजी ने उनसे जैसा कहा था, उसे कह रहा हूँ, आप लोग सावधान होकर सुनें। एक समय योगी नारदजी लोगों के कल्याण की कामना से विविध लोकों में भ्रमण करते हुए पृथ्वीलोक में आये और यहां उन्होंने अपने कर्मफल के अनुसार नाना योनियों में उत्पन्न सभी प्राणियों को अनेक प्रकार के क्लेश, दुःख, भोगते हुए देखा तथा ‘किस उपाय से इनके दुःखों का सुनिश्चित रूप से नाश हो सकता है’, ऐसा मन में विचार करके वे विष्णुलोक को गये।

वहाँ चार भुजाओं वाले शंख, चक्र, गदा, पद्म तथा वनमाला से विभूषित शुक्लवर्ण भगवान श्री नारायणजी का दर्शन कर उन देवाधिदेव की वे स्तुति करने लगे। नारद जी बोले - हे वाणी और मन से परे स्वरूप वाले, अनन्तशक्तिसम्पन्न, आदि-मध्य और अन्त से रहित, निर्गुण और सकल कल्याणमय गुणों से सम्पन्न, भक्तों की पीड़ा नष्ट करने वाले परमात्मन्! आपको नमस्कार है।

स्तुति सुनने के अनन्तर भगवान श्रीविष्णु जी ने नारद जी से कहा - महाभाग! आप किस प्रयोजन से यहाँ आये हैं, आपके मन में क्या है?

नारद जी बोले - भगवन! पृथ्वीलोक में अपने पापकर्मों के द्वारा विभिन्न योनियों में उत्पन्न सभी लोग बहुत प्रकार के क्लेशों से दुःखी हो रहे हैं। हे नाथ! किस लघु उपाय से उनके कष्टों का निवारण हो सकेगा, यदि आपकी मेरे ऊपर कृपा हो तो वह सब मैं सुनना चाहता हूँ। उसे बताइये।

श्री भगवान ने कहा - हे वत्स! संसार के ऊपर अनुग्रह करने की इच्छा से आपने बहुत अच्छी बात पूछी है। जिस व्रत के करने से प्राणी मोह से मुक्त हो जाता है, उसे आपको बताता हूँ, सुनें। हे वत्स! स्वर्ग और पृथ्वीलोक में दुर्लभ भगवान सत्यनारायण का एक महान व्रत है। आपके स्नेह के कारण इस समय मैं उसे कह रहा हूँ। अच्छी प्रकार विधि-विधान से भगवान सत्यनारायणजी का व्रत करके मनुष्य शीघ्र ही सुख प्राप्त कर परलोक में मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

भगवान की ऐसी वाणी सुनकर नारदजी ने कहा - प्रभो! इस व्रत को करने का फल क्या है? इसका विधान क्या है? इस व्रत को किसने किया और इसे कब करना चाहिए? यह सब विस्तारपूर्वक बतलाइये।

भगवान ने कहा - यह श्री सत्यनारायणजी व्रत दुःख-शोक आदि का शमन करने वाला, धन-धान्य की वृद्धि करने वाला, सौभाग्य और संतान देने वाला तथा सर्वत्र विजय प्रदान करने वाला है। जिस-किसी भी दिन भक्ति और श्रद्धा से समन्वित होकर मनुष्य ब्राह्मणों और बन्धु-बान्धवों के साथ धर्म में तत्पर होकर सायंकाल में भगवान श्रीसत्यनारायणजी की पूजा करे।

नैवेद्य के रूप में उत्तम कोटि के भोजनीय पदार्थ को सवाया मात्रा में भक्तिपूर्वक अर्पित करना चाहिए। केले के फल, घी, दूध, गेहूँ का चूर्ण अथवा गेहूँ के चूर्ण के अभाव में साठी का चूर्ण, शक्कर या गुड़ - यह सब योग्य सामग्री सवाया मात्रा में एकत्र कर निवेदित करनी चाहिए।

बन्धु-बान्धवों के साथ श्री सत्यनारायण भगवानजी की कथा सुनकर ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।

भक्तिपूर्वक प्रसाद ग्रहण करके नृत्य-गीत आदि का आयोजन करें। तदनन्तर भगवान सत्यनारायण का स्मरण करते हुए अपने घर को जायें। ऐसा करने से मनुष्यों की अभिलाषा अवश्य पूर्ण होती है। विशेष रूप से कलियुग में, पृथ्वीलोक में यह सबसे छोटा एवं सरल उपाय है।

॥ इति श्री स्कन्दपुराणे रेवाखण्डे सत्यनारायण व्रत कथायाम् प्रथम अध्यायः सम्पूर्णम् ॥

द्वितीय अध्याय

सूतजी ने कहा - “हे ऋषियों! जिन्होंने पहले समय में इस व्रत को किया है उनका इतिहास कहता हूँ, आप सब ध्यान से सुनें। सुंदर काशीपुरी नगरी में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहता था। वह ब्राह्मण भूख और प्यास से बेचैन होकर पृथ्वी पर घूमता रहता था।

ब्राह्मणों से प्रेम करने वाले श्री विष्णु भगवानजी ने ब्राह्मण को देखकर एक दिन बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण कर ब्राह्मण के पास जाकर आदर के साथ पूछा - ‘हे विप्रदेव! तुम नित्य ही दुःखी होकर पृथ्वी पर क्यों घूमते हो?’ तब उस ब्राह्मण ने कहा - ‘मैं भिक्षा के लिए पृथ्वी पर फिरता हूँ। हे भगवन्! यदि आप इससे छुटकारा पाने का कोई उपाय जानते हों तो कृपा कर मुझे बतायें।’

वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किये श्री विष्णुजी ने कहा - ‘हे ब्राह्मण! श्री सत्यनारायण भगवान मनवांछित फल देने वाले हैं। इसलिए तुम उनका पूजन करो, इससे मनुष्य सब दुःखों से मुक्त हो जाता है।’

ब्राह्मण को व्रत का सारा विधान बताकर बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण करने वाले श्री भगवानजी अन्तर्ध्यान हो गये। जिस व्रत को वृद्ध ब्राह्मण ने बताया है, मैं उसको अवश्य करूँगा, यह निश्चय कर वह ब्राह्मण घर चला गया।

अगले दिन वह जल्दी उठा और श्री सत्यनारायणजी का व्रत करने का निश्चय कर भिक्षा माँगने के लिए चल दिया। उस दिन उसको भिक्षा में बहुत धन मिला, जिससे उसने पूजा का सामान खरीदा और घर आकर अपने बंधु-बांधवों के साथ श्री सत्यनारायणजी का व्रत किया।

इसके करने से वह ब्राह्मण सब दुःखों से छूटकर अनेक प्रकार की सुख-सम्पत्तियों से युक्त हुआ। तभी से वह विप्र हर मास व्रत करने लगा। इसी प्रकार सत्यनारायणजी के व्रत को जो शास्त्रविधि के अनुसार करेगा, वह सब पापों से छूटकर मोक्ष को प्राप्त होगा। आगे भी जो मनुष्य पृथ्वी पर श्री सत्यनारायणजी का व्रत करेगा वह सब दुःखों से छूट जाएगा।

इस तरह नारदजी से सत्यनारायण भगवान का कहा हुआ व्रत मैंने आपसे कहा। तब ऋषियों ने कहा - “हे मुनीश्वर! संसार में इस विप्र से सुनकर किस-किस ने इस व्रत को किया, यह हम सब सुनना चाहते हैं।”

श्री सूतजी ने कहा - “हे मुनियों! जिस-जिस प्राणी ने इस व्रत को किया है उन सबकी कथा सुनो। एक समय वह ब्राह्मण धन और ऐश्वर्य के अनुसार बंधु-बांधवों के साथ व्रत-पूजन कर रहा था, कि उसी समय एक लकड़हारा आया। उसने लकड़ियाँ बाहर रख दीं और विप्र के घर में चला गया।

प्यास से व्याकुल लकड़हारे ने विप्र को व्रत करते देखा। वह प्यास को भूल गया। उसने उस विप्र को नमस्कार किया और पूछा - ‘हे विप्र! आप यह किसका पूजन कर रहे हैं? इस व्रत से क्या फल मिलता है? कृपा करके मुझे बतायें।’

ब्राह्मण ने कहा - ‘सब मनोकामनाओं को पूरा करने वाला यह श्री सत्यनारायणजी का व्रत है। इनकी ही कृपा से मेरे यहाँ धन-धान्य आदि की वृद्धि हुई है।’

विप्र से इस व्रत के बारे में जानकर वह लकड़हारा बहुत प्रसन्न हुआ। भगवान का चरणामृत ले और भोजन करने के बाद वह अपने घर को चला गया।

अगले दिन लकड़हारे ने अपने मन में संकल्प किया कि आज ग्राम में लकड़ी बेचने से जो धन मिलेगा उसी से भगवान सत्यनारायणजी का उत्तम व्रत करूँगा। मन में ऐसा विचार कर वह लकड़हारा लकड़ियाँ अपने सिर पर रखकर जिस नगर में धनवान लोग रहते थे, वहाँ गया। उस दिन उसे उन लकड़ियों के चौगुने दाम मिले।

वह बूढ़ा लकड़हारा अति प्रसन्न होकर पक्के केले, शक्कर, शहद, घी, दूध, दही और गेहूँ का चूर्ण इत्यादि श्री सत्यनारायण भगवान के व्रत की सभी सामग्री लेकर अपने घर आ गया। फिर उसने अपने बंधु-बांधवों को बुलाकर विधि-विधान के साथ भगवान का पूजन और व्रत किया।

उस व्रत के प्रभाव से वह बूढ़ा लकड़हारा धन-पुत्र आदि से युक्त हुआ और संसार के समस्त सुख भोगकर वैकुण्ठ को चला गया।

॥ इति श्री स्कन्दपुराणे रेवाखण्डे सत्यनारायण व्रत कथायाम् द्वितीयो अध्यायः सम्पूर्णम् ॥

तृतीय अध्याय

श्री सूतजी ने कहा - “हे श्रेष्ठ मुनियों! अब एक और कथा कहता हूँ। पूर्वकाल में उल्कामुख नाम का एक बुद्धिमान राजा था। वह सत्यवक्ता और जितेन्द्रिय था। प्रतिदिन देवस्थानों पर जाता तथा गरीबों को धन देकर उनके कष्ट दूर करता था। उसकी पत्नी सुन्दर और सती-साध्वी थी।

भद्रशीला नदी के तट पर उन दोनों ने श्री सत्यनारायण भगवानजी का व्रत किया। साधु नामक एक वैश्य, राजा को व्रत करते देख उनसे पूछने लगा - ‘हे राजन्! भक्तियुक्त चित्त से यह आप क्या कर रहे हैं? मेरी सुनने की इच्छा है।’

तब महाराज उल्कामुख ने कहा - ‘हे साधु वैश्य! मैं अपने बंधु-बांधवों के साथ सन्तान की प्राप्ति के लिए महाशक्तिमान सत्यनारायण भगवानजी का व्रत व पूजन कर रहा हूँ।’

उसने कहा - ‘हे राजन्! मुझे भी इसका सब विधान बताइए। मैं भी आपके कथानुसार इस व्रत को करूँगा। मुझे कोई संतान नहीं है। विश्वास है कि इससे निश्चय ही मेरे यहाँ भी संतान होगी।’

राजा से सब विधान सुन, व्यापार से निवृत्त हो, वह वैश्य खुशी-खुशी अपने घर आया। वैश्य ने अपनी पत्नी लीलावती से संतान देने वाले उस व्रत का समाचार सुनाया और प्रण किया कि जब हमारे यहाँ संतान होगी तब मैं इस व्रत को करूँगा।

एक दिन उसकी पत्नी लीलावती सांसारिक धर्म में प्रवृत्त होकर गर्भवती हो गई। उसने एक सुन्दर कन्या को जन्म दिया। कन्या का नाम कलावती रखा गया।

इसके बाद लीलावती ने अपने पति को स्मरण दिलाया कि आपने जो भगवान का व्रत करने का संकल्प किया था अब आप उसे पूरा कीजिए। साधु वैश्य ने कहा - ‘हे प्रिये! मैं कन्या के विवाह पर इस व्रत को करूँगा।’

इस प्रकार अपनी पत्नी को आश्वासन दे वह व्यापार करने चला गया। काफी दिनों पश्चात वह लौटा तो उसने नगर में सखियों के साथ अपनी पुत्री को खेलते देखा। वैश्य ने तत्काल कलावती के लिए कोई सुयोग्य वर की तलाश की। कंचननगर के एक सुयोग्य वणिक-पुत्र से अपने बंधु-बांधवों सहित प्रसन्नचित्त होकर अपनी पुत्री का विवाह उसके साथ कर दिया।

वैश्य विवाह के समय भी सत्यनारायण भगवान का व्रत करना भूल गया। इस पर श्री सत्यनारायण भगवान की लीला हुई। अपने कार्य में कुशल साधु नामक वैश्य अपने जामाता सहित नाव को लेकर व्यापार करने के लिए समुद्र के समीप स्थित रत्नसारपुर नगर में गया। दोनों ससुर-जमाई राजा चंद्रकेतु के नगर में व्यापार करने लगे।

एक दिन भगवान सत्यनारायणजी की माया से प्रेरित एक चोर राजा का धन चुराकर भागा जा रहा था। राजा के दूतों को अपने पीछे आते देखकर चोर ने घबराकर राजा के धन को उनकी नाव में रख कर भाग गया, जहाँ ससुर-जमाई थे।

जब राजा के धन को उनकी नाव में रखा देखा तो पकड़कर राजा के समीप जाकर बोले - ‘हम ये दो चोर पकड़कर लाए हैं, आप आज्ञा दें।’ राजा ने कारागार में डालने की आज्ञा दे दी। इस प्रकार राजा की आज्ञा से उनको कठिन कारावास में डाल दिया गया तथा उनका धन भी ले लिया।

सत्यनारायण भगवानजी की लीला के अनुसार साधु वैश्य की पत्नी लीलावती व पुत्री कलावती भी घर पर बहुत दुःखी हुईं। उनके घर में रखा धन चोर ले गये। एक दिन शारीरिक व मानसिक पीड़ा तथा भूख-प्यास से अति दुःखित हो भोजन की चिंता में कलावती एक ब्राह्मण के घर गई। उसने श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत होते देखा। उसने कथा सुनी तथा प्रसाद ग्रहण कर रात को घर आई।

माता ने कलावती से पूछा - ‘हे पुत्री! तू अब तक कहाँ रही व तेरे मन में क्या है?’ कलावती बोली - ‘हे माता! मैंने श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत होते देखा है।’

तब कलावती के वचन सुनकर लीलावती ने सत्यनारायण भगवानजी के पूजन की तैयारी की। उसने परिवार और बंधुओं सहित श्री सत्यनारायण भगवानजी का पूजन व व्रत किया और वर माँगा कि मेरे पति और दामाद शीघ्र ही घर लौट आएँ। साथ ही प्रार्थना की कि हम सबका अपराध क्षमा करो।

श्री सत्यनारायण भगवानजी इस व्रत से संतुष्ट हो गये। उन्होंने राजा चंद्रकेतु को स्वप्न में दर्शन देकर कहा - ‘हे राजन्! जिन दोनों वैश्यों को तुमने बंदी बना रखा है, वे निर्दोष हैं, उन्हें प्रातः ही छोड़ देना।’

राजा से वचन कहकर भगवान अन्तर्ध्यान हो गये। प्रातःकाल राजा चंद्रकेतु ने सभा में सबको अपना स्वप्न सुनाया और सैनिकों को आज्ञा दी कि दोनों वणिक-पुत्रों को कैद से मुक्त कर सभा में लाया जाए। दोनों ने आते ही राजा को प्रणाम किया।

राजा ने उनसे कहा - ‘हे महानुभावो! तुम्हें भावीवश ऐसा कठिन दुःख प्राप्त हुआ है। अब तुम्हें कोई भय नहीं है, तुम मुक्त हो।’ ऐसा कहकर राजा ने उनको नये-नये वस्त्राभूषण दिये तथा उनका जितना धन लिया था उससे दूना लौटाकर आदर से विदा किया। दोनों वैश्य अपने घर को चल दिये।

॥ इति श्री स्कन्दपुराणे रेवाखण्डे सत्यनारायण व्रत कथायाम् तृतीयो अध्यायः सम्पूर्णम् ॥

चतुर्थ अध्याय

श्री सूतजी ने कहा - “वैश्य और उसके जमाई ने मंगलाचार करके यात्रा आरंभ की और अपने नगर की ओर चल पड़े। उनके थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर दंडी वेषधारी श्री भगवानजी ने उससे पूछा - ‘हे वैश्य! तेरी नाव में क्या है?’

अभिमानी वणिक हँसता हुआ बोला - ‘हे दंडी! आप क्यों पूछते हैं? क्या धन लेने की इच्छा है? मेरी नाव में तो बेल और पत्ते भरे हैं।’

वैश्य का कठोर वचन सुनकर दंडी रूप में भगवानजी ने कहा - ‘तुम्हारा वचन सत्य हो।’ ऐसा कहकर वे वहाँ से कुछ दूर जाकर समुद्र के किनारे बैठ गये।

दंडी महाराज के जाने के पश्चात वैश्य ने नित्यक्रिया से निवृत्त होने के बाद नाव को ऊँची उठी देखकर अचंभा किया तथा नाव में बेल-पत्ते आदि देखकर मूर्च्छित हो जमीन पर गिर पड़ा। होश आने पर अत्यन्त शोक प्रकट करने लगा।

तब उसके जामाता ने कहा - ‘आप शोक न करें। यह दंडी महाराज का श्राप है, अतः उनकी शरण में ही चलना चाहिए, तभी हमारी मनोकामना पूरी होगी।’

जामाता के वचन सुनकर वह दंडी महाराज के पास पहुँचा और भक्तिभाव से प्रणाम करके बोला - ‘मैंने जो आपसे असत्य वचन कहे थे उसके लिए मुझे क्षमा करें।’ ऐसा कहकर वैश्य रोने लगा।

तब दंडी भगवान बोले - ‘हे वणिक-पुत्र! मेरी आज्ञा से तुझे बार-बार दुःख प्राप्त हुआ है, तू मेरी पूजा से विमुख हुआ है।’

तब उसने कहा - ‘हे भगवन्! आपकी माया से ब्रह्मा आदि देवता भी आपके रूप को नहीं जान पाते, तब मैं अज्ञानी भला कैसे जान सकता हूँ। आप प्रसन्न होइए, मैं अपनी सामर्थ्य के अनुसार आपकी पूजा करूँगा। मेरी रक्षा कीजिये और पहले के समान मेरी नौका को धन से भर दीजिये।’

उसके भक्तियुक्त वचन सुनकर भगवानजी प्रसन्न हो गये और उसकी इच्छानुसार वर देकर अन्तर्ध्यान हो गये। तब ससुर व जामाता दोनों ने नाव पर आकर देखा कि नाव धन से परिपूर्ण है। फिर वह भगवान सत्यनारायणजी का पूजन कर जामाता सहित अपने नगर को चला।

जब वह अपने नगर के निकट पहुँचा तब उसने एक दूत को अपने घर भेजा। दूत ने वैश्य के घर जाकर उसकी पत्नी को नमस्कार किया और कहा - ‘आपके पति अपने दामाद सहित इस नगर के समीप आ गये हैं।’

लीलावती और उसकी कन्या कलावती उस समय भगवान का पूजन कर रही थीं। दूत का वचन सुनकर साधु की पत्नी ने बड़े हर्ष के साथ सत्यदेव का पूजन पूर्ण किया और अपनी पुत्री से कहा - ‘मैं अपने पति के दर्शन को जाती हूँ, तू भी कार्य पूर्ण कर शीघ्र आना।’

परंतु कलावती पूजन एवं प्रसाद छोड़कर अपने पति के दर्शन के लिए चली गई। परन्तु उसको पति का दर्शन प्राप्त नहीं हुआ। नौका को डूबा हुआ तथा कन्या को रोती हुई देख वैश्य दुःखित हो बोला - ‘हे प्रभु! मुझसे या मेरे परिवार से जो भूल हुई है उसे क्षमा करो।’

उसके दीन वचन सुनकर सत्यदेव भगवान प्रसन्न हो गये। आकाशवाणी हुई - ‘हे वैश्य! तेरी कन्या प्रसाद छोड़कर आई है, इसका पति अदृश्य हुआ है। यदि वह घर जाकर प्रसाद खाकर लौटे तो इसका पति अवश्य मिलेगा।’

आकाशवाणी सुनकर कलावती ने घर पहुँचकर पूजन कर प्रसाद खाया और फिर आकर अपने पति के दर्शन किए।

तत्पश्चात वैश्य ने वहीं बंधु-बांधवों सहित सत्यदेव का विधिपूर्वक पूजन किया। वह इस लोक का सुख भोगकर अंत में स्वर्गलोक को गया।

॥ इति श्री स्कन्दपुराणे रेवाखण्डे सत्यनारायण व्रत कथायाम् चतुर्थो अध्यायः सम्पूर्णम् ॥

पंचम अध्याय

श्री सूतजी ने आगे कहा - “हे ऋषियों! मैं एक और भी कथा कहता हूँ। प्रजापालन में लीन तुंगध्वज नाम का एक राजा था। उसने भगवान सत्यदेव का प्रसाद त्याग कर बहुत दुःख पाया।

एक समय राजा वन में वन्य पशुओं को मारकर बड़ के वृक्ष के नीचे आया। वहाँ उसने ग्वालों को भक्ति भाव से बंधु-बांधवों सहित श्री सत्यनारायणजी का व्रत-पूजन करते देखा, परन्तु राजा देखकर भी अभिमानवश न तो वहाँ गया और न ही सत्यदेव भगवान को नमस्कार ही किया।

जब ग्वालों ने भगवानजी का प्रसाद उनके सामने रखा तो वह प्रसाद त्याग कर अपने नगर को चला गया। नगर में पहुँचकर उसने देखा कि उसका सब कुछ नष्ट हो गया है। वह समझ गया कि यह सब भगवान सत्यदेव ने ही किया है।

तब वह उसी स्थान पर वापस आया और ग्वालों के समीप गया और विधिपूर्वक पूजन कर प्रसाद खाया तो सत्यनारायणजी की कृपा से सब-कुछ पहले जैसा ही हो गया और दीर्घकाल तक सुख भोगकर स्वर्गलोक को चला गया।

जो मनुष्य इस परम दुर्लभ व्रत को करेगा, श्री सत्यनारायण भगवान की कृपा से उसे धन-धान्य की प्राप्ति होगी। निर्धन धनी, बंदी बंधन से मुक्त होकर निर्भय हो जाता है। संतानहीन को संतान प्राप्त होती है तथा सब मनोरथ पूर्ण होकर अंत में वह बैकुण्ठ धाम को जाता है।

जिन्होंने पहले इस व्रत को किया अब उनके दूसरे जन्म की कथा भी सुनिए। शतानंद नामक ब्राह्मण ने सुदामा के रूप में जन्म लेकर श्रीकृष्ण की भक्ति कर मोक्ष प्राप्त किया। उल्कामुख नाम के महाराज, राजा दशरथ बने और श्री रंगनाथ का पूजन कर बैकुण्ठ को प्राप्त हुए।

साधु नाम के वैश्य ने धर्मात्मा व सत्यप्रतिज्ञ राजा मोरध्वज बनकर अपने पुत्र को आरे से चीरकर मोक्ष को प्राप्त हुआ। महाराज तुंगध्वज स्वयंभू मनु हुए। उन्होंने बहुत से लोगों को भगवान की भक्ति में लीन कर मोक्ष प्राप्त किया।

लकड़हारा भील अगले जन्म में गुह नामक निषाद राजा हुआ, जिसने भगवान श्रीराम के चरणों की सेवा कर मोक्ष प्राप्त किया।

॥ इति श्री स्कन्दपुराणे रेवाखण्डे सत्यनारायण व्रत कथायाम् पंचमो अध्यायः सम्पूर्णम् ॥