Sanatan Vani • Devotion, wisdom and reading
23 Mar 2026
Sanatan Vani Sacred wisdom in a modern form
Vrat Katha

वरुथिनी एकादशी व्रत कथा

जब भालू ने चबाया राजा का पैर! 😱 जानिए वरुथिनी एकादशी की वो कथा जिसने राजा मान्धाता को दी नई जिंदगी। अभी पढ़ें! 👇

वरुथिनी एकादशी व्रत कथा
Google AdSense Space

॥ श्री वरुथिनी एकादशी व्रत कथा (सम्पूर्ण वृत्तांत) ॥ 🐚✨🐻

धर्मराज युधिष्ठिर ने पूछा— "हे जनार्दन! वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है, इसकी विधि क्या है और इससे किस पुण्य की प्राप्ति होती है? कृपा कर विस्तार से बताएं।"

भगवान श्री कृष्ण बोले— "हे युधिष्ठिर! इस एकादशी का नाम 'वरुथिनी' है। यह इस लोक में सौभाग्य और परलोक में मुक्ति देने वाली है। इसका व्रत करने से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे अचल सुख की प्राप्ति होती है। इसकी कथा राजा मान्धाता से जुड़ी है। ध्यानपूर्वक सुनो।"

१. राजा मान्धाता की कठिन तपस्या

प्राचीन काल में नर्मदा नदी के तट पर राजा मान्धाता नाम के एक अत्यंत धर्मात्मा और प्रतापी राजा राज्य करते थे। वे अपनी प्रजा का पुत्रवत पालन करते थे और भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे। एक बार राजा मान्धाता घोर जंगल में जाकर भगवान की तपस्या में लीन हो गए।

वे मौन होकर एक वृक्ष के नीचे बैठे थे और अपनी इन्द्रियों को वश में कर भगवान का ध्यान कर रहे थे। उनकी तपस्या इतनी कठोर थी कि उन्हें अपने शरीर का भी भान नहीं रहा।

२. जंगली भालू का आक्रमण

तपस्या के दौरान वहां एक जंगली भालू आया। वह राजा के पास पहुँचा और उनके पैर को चबाने लगा। भालू राजा को घसीटते हुए जंगल के अंदर ले गया। भालू राजा के पैर का मांस खा रहा था और उन्हें भयंकर पीड़ा हो रही थी, लेकिन राजा मान्धाता ने न तो क्रोध किया और न ही अपनी रक्षा के लिए कोई अस्त्र उठाया।

३. भगवान विष्णु की पुकार और रक्षा

राजा ने सोचा— "यह मेरे प्रारब्ध का ही कोई फल है।" उन्होंने संकट की उस घड़ी में केवल भगवान विष्णु को याद किया। उन्होंने मन ही मन करुण स्वर में भगवान से प्रार्थना की— "हे प्रभु! हे भक्तवत्सल! मेरी रक्षा करें।"

अपने भक्त की पुकार सुनकर भगवान विष्णु तत्काल वहां प्रकट हुए और उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से उस दुष्ट भालू का वध कर दिया। भालू से तो राजा की रक्षा हो गई, लेकिन भालू ने उनके पैर को काफी नुकसान पहुँचाया था, जिससे राजा लंगड़े हो गए थे और बहुत दुखी थे।

४. मथुरा में वरुथिनी एकादशी का उपाय

भगवान विष्णु ने राजा को सांत्वना दी और कहा— "हे राजन्! दुखी मत हो। यह तुम्हारे पूर्व जन्म के किसी अपराध का फल है। तुम मथुरा नगरी जाओ और वहां जाकर वैशाख कृष्ण एकादशी (वरुथिनी एकादशी) का विधिपूर्वक व्रत करो। वहां मेरी 'वाराह' (Varaha) मूर्ति का पूजन करो। उस व्रत के प्रभाव से तुम्हारा पैर पुनः ठीक हो जाएगा और तुम पहले जैसे शक्तिशाली हो जाओगे।"

५. राजा का कायाकल्प और मोक्ष

भगवान की आज्ञा मानकर राजा मान्धाता मथुरा पहुँचे। उन्होंने वहां श्रद्धापूर्वक वरुथिनी एकादशी का निराहार व्रत रखा और भगवान के वाराह स्वरूप की पूजा की।

व्रत के प्रभाव से राजा का पैर चमत्कारिक रूप से पूरी तरह ठीक हो गया और उनका शरीर पुनः दिव्य और तेजस्वी हो गया। उन्होंने बहुत समय तक धर्मपूर्वक राज्य किया और अंत में उन्हें वैकुण्ठ धाम प्राप्त हुआ।


॥ व्रत का महत्व और नियम ॥ 📋💎

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं— "हे युधिष्ठिर! वरुथिनी एकादशी का फल दस हज़ार वर्ष की तपस्या के समान है। कुरुक्षेत्र में सूर्य ग्रहण के समय एक मन स्वर्ण (सोना) दान करने से जो पुण्य मिलता है, वही पुण्य केवल इस एक व्रत को करने से प्राप्त हो जाता है।"

व्रत के नियम:

  1. कांस्य त्याग: कांसे के बर्तन में भोजन न करें।

  2. सात्विकता: मांस, मदिरा, मसूर की दाल, शहद और पराए अन्न का त्याग करें।

  3. ब्रह्मचर्य: एकादशी की रात को ब्रह्मचर्य का पालन करें और भूमि पर शयन करें।

  4. रात्रि जागरण: भगवान के भजन-कीर्तन के साथ रात गुजारें।

Google AdSense Space