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02 May 2026
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Vrat Katha

त्रिपुरारी पूर्णिमा व्रत कथा

शिव ने हँसते-हँसते कैसे मिटाया असुरों का अहंकार? 😱 जानिए त्रिपुरारी पूर्णिमा का वो गुप्त रहस्य जिससे तीनों लोक गूंज उठे। अभी पढ़ें! 👇

त्रिपुरारी पूर्णिमा व्रत कथा
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॥ त्रिपुरारी पूर्णिमा व्रत कथा ॥ 🔱🌕🏹

कथा प्रारम्भ:

प्राचीन काल में तारकासुर नामक एक अत्यंत शक्तिशाली असुर था। उसके आतंक से तीनों लोक कांपते थे। अंततः भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर का वध किया। तारकासुर की मृत्यु के बाद उसके तीन पुत्र हुए— तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली

पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए तीनों भाइयों ने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की। ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए और उन्होंने वरदान मांगने को कहा। तीनों असुरों ने एक स्वर में कहा— "हे विधाता! आप हमें अमर कर दें।" ब्रह्मा जी ने मुस्कुराते हुए कहा— "पुत्रों, जन्म लेने वाले का मरण निश्चित है। कोई भी जीव अमर नहीं हो सकता। तुम कोई और वरदान मांगो।"

१. त्रिपुर की उत्पत्ति और वरदान का पेंच

तब उन असुरों ने अपनी बुद्धिमत्ता का प्रयोग करते हुए एक अत्यंत चतुर वरदान मांगा। उन्होंने कहा— "ठीक है भगवन, आप हमें ऐसा वरदान दें कि हम तीनों के लिए अलग-अलग तीन अत्यंत शक्तिशाली और अद्वितीय नगर हों। तारकाक्ष के लिए सोने का नगर, कमलाक्ष के लिए चांदी का और विद्युन्माली के लिए लोहे का नगर। ये नगर अंतरिक्ष में अलग-अलग तैरते रहें।"

ब्रह्मा जी के पूछने पर कि उनकी मृत्यु कैसे होगी, उन्होंने कहा— "हमारा अंत केवल तभी संभव हो जब एक हज़ारों वर्षों बाद अंतरिक्ष में ऐसी दुर्लभ स्थिति आए कि ये तीनों नगर एक साथ एक रेखा में आ जाएं, और उसी समय भगवान शिव स्वयं अपने दिव्य पिनाक धनुष से एक ही तीर से उन तीनों नगरों को एक साथ भेद दें। इसके अलावा हमारी मृत्यु और किसी भी विधि से संभव न हो।" ब्रह्मा जी ने 'तथास्तु' कहकर वरदान दे दिया।

२. असुरों का अहंकार और ब्रह्मांड में हाहाकार

वरदान पाकर तीनों असुरों ने अपने-अपने नगर बनवाए और उनका नाम रखा— 'त्रिपुर'। इन नगरों में सब कुछ था— ऐश्वर्य, भोग-विलास और शक्ति। असुर हज़ारों वर्षों तक उन नगरों में चैन से रहे और धीरे-धीरे अहंकार में अंधे हो गए। उन्होंने ऋषियों को परेशान करना, यज्ञों को नष्ट करना और तीनों लोकों में आतंक फैलाना शुरू कर दिया।

इंद्र समेत सभी देवता अत्यंत भयभीत हो गए। जब उनका कोई वश नहीं चला, तो वे महादेव शिव के पास कैलाश पहुँचे और उनसे रक्षा की गुहार लगाई। महादेव ने उन्हें धीरज बंधाया और कहा कि वे सही समय का इंतज़ार कर रहे हैं।

३. शिव की विराट तैयारी और दिव्य युद्ध

जैसे ही वह दुर्लभ मुहूर्त निकट आया जब तीनों नगर एक रेखा में संरेखित होने वाले थे, भगवान शिव ने उस महाविनाशकारी युद्ध की तैयारी की। यह कोई साधारण युद्ध नहीं था, इसलिए महादेव ने अपनी विराट शक्ति का परिचय दिया:

  • रथ: संपूर्ण पृथ्वी को रथ बनाया।

  • धनुष: महामेरु पर्वत को पिनाक धनुष बनाया।

  • बाण: साक्षात् विष्णु जी को अमोघ पाशुपतास्त्र बाण बनाया।

  • सारथी: ब्रह्मा जी ने सारथी का कार्यभार संभाला।

समस्त देवता, गंधर्व और ऋषि-मुनि इस युद्ध के साक्षी बने। जैसे ही कार्तिक पूर्णिमा की रात को वह पल आया जब अंतरिक्ष में तीनों असुर नगर (त्रिपुर) एक सीधी रेखा में आए, भगवान शिव ने एक पल भी व्यर्थ नहीं किया। ब्रह्मा जी ने रथ को उस दिशा में मोड़ा। महादेव ने पिनाक धनुष की प्रत्यंचा खींची और अपना अमोघ बाण, विष्णु जी के रूप में, उस पर संधान किया। उन्होंने केवल एक मुस्कान दी और बाण छोड़ दिया।

४. त्रिपुर का अंत और 'त्रिपुरारी' नाम

वह दिव्य बाण बिजली की गति से अंतरिक्ष को भेदता हुआ गया और जैसे ही तीनों नगर एक ही बिंदु पर मिले, उसने एक ही तीर से उन सोने, चांदी और लोहे के त्रिपुरों को राख कर दिया। तीनों असुर भाई, तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली, उस विनाशकारी आग में भस्म हो गए। उनका अहंकार और आतंक एक ही क्षण में मिट गया।

तीनों लोक असुरों के भय से मुक्त हो गए। देवताओं ने पुष्प वर्षा की और चारों ओर 'हर हर महादेव' की जय-जयकार होने लगी। चूँकि भगवान शिव ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही इन तीनों नगरों का विनाश किया था, इसलिए वे 'त्रिपुरारी' (त्रिपुरों के शत्रु) कहलाए। तभी से यह पूर्णिमा 'त्रिपुरारी पूर्णिमा' के रूप में प्रसिद्ध हुई।


॥ व्रत और दान का महत्व ॥ 📋🌕💧

धार्मिक कृत्यमहत्व और सीख
कार्तिक स्नानजो भी मनुष्य इस दिन पवित्र नदी (गंगा आदि) में स्नान करता है, उसके समस्त पाप मिट जाते हैं।
दीप-दानसंध्या काल में घर, मंदिर और पवित्र जल स्रोतों पर दीप जलाने (दीप-दान) का अत्यंत महत्व है।
शिव पूजाइस दिन भगवान शिव का दूध और शहद से अभिषेक करने से महादेव अत्यंत प्रसन्न होते हैं और मनवांछित फल देते हैं।
शुभ और लाभयह दिन केवल शिव की विजय का नहीं, बल्कि राधा-कृष्णा और लक्ष्मी-विष्णु की पूजा के लिए भी अत्यंत शुभ माना जाता है।
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