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Vrat Katha

संतोषी माता व्रत कथा

संतोषी माता व्रत कथा

संतोषी माता व्रत कथा

एक बुढ़िया थी। उसके सात बेटे थे। छह कमाने वाले थे और एक निकम्मा था। बुढ़िया छहों बेटों को रसोई बनाकर, भोजन परोसकर बड़े प्रेम से खिलाती थी, परन्तु सातवें बेटे को जो कुछ बच जाता, वह देती थी। वह सीधा-सादा था, इसलिए कुछ कहता नहीं था।

एक दिन उसने अपनी पत्नी से पूछा, “माँ मुझसे ऐसा व्यवहार क्यों करती है?” पत्नी ने कहा, “आप स्वयं देख लीजिए।” दूसरे दिन वह छिपकर देखने लगा। उसने देखा कि माँ पहले छहों बेटों को आदर से भोजन कराती है, फिर उनके जूठे बर्तन से बचे हुए टुकड़े इकट्ठे करके उसके लिए भोजन बनाती है।

यह देखकर उसका हृदय दुख से भर गया। उसने निश्चय किया कि अब वह परदेश जाकर कमाएगा। जब वह जाने लगा तो अपनी पत्नी से बोला, “मैं परदेश जा रहा हूँ। तुम धैर्य रखना।”

पत्नी बहुत पतिव्रता और सरल स्वभाव की थी। पति के जाने के बाद उस पर दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा। घर में उसे तिरस्कार सहना पड़ता, बहुत काम करना पड़ता, और भोजन भी समय पर नहीं मिलता। वह मन ही मन भगवान से प्रार्थना करती रहती थी।

एक दिन वह मार्ग में जा रही थी। उसने कुछ स्त्रियों को किसी देवी का व्रत करते देखा। उसने उनसे पूछा, “बहनों, आप किस देवी का व्रत कर रही हैं?” स्त्रियों ने कहा, “हम संतोषी माता का व्रत कर रही हैं। यह व्रत बहुत फलदायी है। इससे घर में सुख-शांति आती है, मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं, और दुःख दूर होते हैं।”

उसने विनम्रता से पूछा, “इस व्रत की विधि क्या है?” स्त्रियों ने बताया, “शुक्रवार के दिन स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनकर माता का पूजन करो। गुड़ और चने का भोग लगाओ, कथा सुनो, और माता से अपनी मनोकामना कहो। इस व्रत में सबसे मुख्य बात यह है कि खटाई नहीं खानी चाहिए और न किसी को खिलानी चाहिए।

उस स्त्री ने उसी दिन से संतोषी माता का व्रत आरंभ कर दिया। वह श्रद्धा और प्रेम से प्रत्येक शुक्रवार को व्रत करती, गुड़-चना अर्पित करती, कथा सुनती और माता से प्रार्थना करती।

उधर परदेश में उसका पति मेहनत करने लगा। माता की कृपा से उसका भाग्य खुल गया। उसे अच्छा काम मिल गया और धन कमाने लगा। इधर घर में भी धीरे-धीरे परिस्थितियाँ सुधरने लगीं।

कुछ समय बाद संतोषी माता की कृपा से उसके पति को अपनी पत्नी का स्मरण हुआ और वह धन लेकर घर लौट आया। पत्नी उसे देखकर बहुत प्रसन्न हुई। दोनों ने माता को धन्यवाद दिया और व्रत जारी रखा।

जब व्रत पूरे होने लगे, तब स्त्री ने उद्यापन करने का निश्चय किया। उसने आठ लड़कों को भोजन कराने की तैयारी की। सब कुछ विधि से किया जा रहा था, परन्तु उसकी जेठानियों को ईर्ष्या हुई। उन्होंने अपने बच्चों को सिखा दिया कि भोजन करते समय खटाई माँगना।

जब बालक भोजन करने बैठे, उन्होंने खटाई माँगी। स्त्री ने कहा, “आज खटाई नहीं दी जाएगी।” परन्तु बालक जिद करने लगे। तब किसी प्रकार उन्हें पैसे दे दिए गए। उन बच्चों ने उन्हीं पैसों से इमली खरीदकर खा ली।

इससे संतोषी माता अप्रसन्न हो गईं, क्योंकि व्रत का नियम भंग हो गया था। परिणामस्वरूप स्त्री के घर में फिर से कष्ट आने लगे। उसका पति किसी कार्य से बाहर गया और अनेक परेशानियाँ खड़ी हो गईं। वह स्त्री बहुत दुःखी हुई और माता के मंदिर में जाकर रोने लगी।

वह हाथ जोड़कर बोली, “हे माँ! मुझसे भूल हो गई। मुझे क्षमा करें। मैंने जानबूझकर नियम नहीं तोड़ा।” उसकी सच्ची भक्ति और पश्चाताप देखकर माता का हृदय पिघल गया।

माता ने उसे दर्शन देकर कहा, “बेटी, धैर्य रखो। व्रत के नियम का ध्यान रखो। फिर से श्रद्धा और विधि से व्रत करो, सब कष्ट दूर हो जाएँगे।”

स्त्री ने पुनः पूरी श्रद्धा से संतोषी माता का व्रत किया। इस बार उसने बहुत सावधानी रखी। व्रत पूर्ण होने पर विधिपूर्वक उद्यापन किया, बालकों को भोजन कराया, और खटाई से पूर्ण रूप से परहेज रखा।

माता की कृपा से उसके घर में फिर सुख-समृद्धि आ गई। पति सुरक्षित लौट आया। घर में धन, धान्य, शांति और आनंद का वास हो गया। सबने संतोषी माता की महिमा को स्वीकार किया।

जो भी स्त्री या पुरुष श्रद्धा, भक्ति और नियमपूर्वक संतोषी माता का व्रत करता है, उसकी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं, घर के क्लेश दूर होते हैं, और जीवन में सुख-शांति आती है।

बोलो संतोषी माता की जय।