Sanatan Vani • Devotion, wisdom and reading
29 Mar 2026
Sanatan Vani Sacred wisdom in a modern form
Stotra

श्रीनारायणकवचम्

श्रीमद्भागवत पुराण के छठे स्कन्ध में वर्णित 'नारायण कवच' भगवान विष्णु का परम शक्तिशाली रक्षा कवच है। यहाँ पढ़ें गीता प्रेस गोरखपुर के अनुसार संपूर्ण संस्कृत पाठ और हिंदी अनुवाद।

श्रीनारायणकवचम्
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॥ श्रीनारायणकवचम् ॥

॥ राजोवाच ॥ यया गुप्तः सहस्राक्षः सवाहान् रिपुसैनिकान् । क्रीडन्निव विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे श्रियम् ॥ १॥ भगवंस्तन्ममाख्याहि वर्म नारायणात्मकम् । यथततातायिनः शत्रून् येन गुप्तोऽजयन्मृधे ॥ २॥

॥ श्रीशुक उवाच ॥ वृतः पुरोहितस्त्वाष्ट्रो महेन्द्रायानुपृच्छते । नारायणाख्यं वर्माह तदिहैकमनाः शृणु ॥ ३॥

॥ विश्वरूप उवाच ॥ धौताङ्घ्रिपाणिराचम्य सपवित्र उदङ्मुखः । कृतस्वाङ्गकरन्यासो मन्त्रभ्यां वाग्यतः शुचिः ॥ ४॥ नारायणमयं वर्म सन्नह्येद्भय आगते । पादयोर्जानुनोरूर्वोदर्र्हृद्यथोरसि मुखे शिरसि ॥ ५॥ आनुपूर्व्येण विन्यस्य ओङ्कारादीनि विन्यसेत् । ॐ नमो नारायणायेति विपर्ययमथापि वा ॥ ६॥

करन्यासं ततः कुर्याद् द्वादशाक्षरविद्यया । प्रणवादि यकारान्तमङ्गुल्यङ्गुष्ठपर्वसु ॥ ७॥ न्यसेद्धृदय ओङ्कारं विकारमनु मूर्धनि । षकारं तु भ्रुवोर्मध्ये णकारं शिखया न्यसेत् ॥ ८॥ वेकारं नेत्रयोर्युञ्ज्यान्नकारं सर्वसन्धिषु । मकारमस्त्रमुद्दिश्य मन्त्रमूर्तिर्भवेद्बुधः ॥ ९॥ सविसर्गं फडन्तं तत् सर्वदिक्षु विनिर्दिशेत् । ॐ विष्णवे नम इति ॥ १०॥

॥ अथ ध्यानम् ॥ आत्मानं परमं ध्यायेद् ध्येयं षट्शक्तिभिर्युतम् । विद्यातेजस्तपोमूर्तिमिमं मन्त्रमुदाहरेत् ॥ ११॥

ॐ हरिर्विदध्यान्मम सर्वरक्षां न्यस्तार्घ्रिपाद्मः पतगेन्द्रपृष्ठे । दरारिचर्मासिगदेषुचापपाशान् दधानोऽष्टगुणोऽष्टबाहुः ॥ १२॥

जलेषु मां रक्षतु मत्स्यमूर्तिर्यादोगणेभ्यो वरुणस्य पाशात् । स्थलेषु मायावटुवामनोऽव्यात् त्रिविक्रमः खेऽवतु विश्वरूपः ॥ १३॥

दुर्गेष्वटव्याजिमुखादिषु प्रभुः पायान्नृसिंहोऽसुरयूथपारिः । विमुञ्चतो यस्य महाट्टहासं दिशो विनेदुर्न्यपतंश्च गर्भाः ॥ १४॥

रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्पः स्वदंष्ट्रयोद्धृतधरो वराहः । रामोऽद्रिकूटेष्वथ विप्रवासे सलक्ष्मणोऽव्याद् भरताग्रजोऽमान् ॥ १५॥

मामग्रतोऽव्याद् गदयाप्यच्युतः प्रसाहणोऽव्याद् धनुरासिचक्रैः । पार्श्वद्वये धन्वधनुः सज्जायुधोऽव्यान्मुकुन्दोऽजितः सर्वदृक् च ॥ १६॥

प्रमादतः सर्वभयेभ्य ईश्वरो गदाग्रजः पातु स सम्बकाले । दत्तोऽस्त्वयोगादथ योगनाथः पायाद् गुणेशः कपिलः कर्मबन्धात् ॥ १७॥

सनत्कुमारोऽवतु कामदेवाद्धयशीर्षा मां पथि देवहेलनात् । देवर्षिवर्यः पुरुषार्चनान्तरात् कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात् ॥ १८॥

धन्वन्तरिर्भगवान् पात्वपथ्याद् द्वन्द्वाद्भयादृषभो निर्जितात्मा । यज्ञश्च लोकादवताज्जनान्ताद् बालो बलः पातु गुलादहीशात् ॥ १९॥

द्वैपायनो भगवानप्रबोधाद् बुद्धस्तु पाखण्डगणात् प्रमादात् । कल्किः कलेः कालमलात् प्रपातु धर्मावनायोरुक्रुतावतारः ॥ २०॥

मां केशवो गदया प्रातरव्याद् गोविन्द आसङ्गव आत्तवेणुः । नारायणः प्राह्ण उदात्तशक्तिर्मध्यन्दिने विष्णुररिप्रपाणिः ॥ २१॥

देवोऽपराह्णे मधुहोग्रधन्वा सायं त्रिधामावतु माधवो माम् । दोषे हृषीकेश उतार्धरात्रे निशीथ एकोऽवतु पद्मनाभः ॥ २२॥

श्रीवत्सधामापररात्र ईशः प्रत्यूष ईशोऽसिधरो जनार्दनः । दामोदरोऽव्यादनुसन्ध्यं प्रभाते विश्वेश्वरो भगवान् कालमूर्तिः ॥ २३॥

चक्रं युगान्तनलबिग्मनेमि भ्रमतु समन्ताद् भगवत्प्रयुक्तम् । दन्दग्धि दन्दग्ध्यरिसैन्यमाशु कक्षं यथा वातसखो हुताशः ॥ २४॥

गदेऽशनिस्पर्शनविस्फुलिङ्गे जह्यजितप्रियासि विनायकान् । कुष्माण्डवैनायकयक्षरक्षोभूतग्रहांश्चूर्णय चूर्णयारीन् ॥ २५॥

त्वं यातुधानप्रमथप्रेतमातृपिशाचविप्रग्रहघोरदृष्टीन् । दरेन्द विद्रावय कृष्णपूरितो भीमस्वनोऽरेर्हृदयानि कम्पयन् ॥ २६॥

त्वं तिग्मधारावरि सैन्यमग्रतश्छिन्धि छिन्धि चक्षुषि चर्मञ्छतचन्द्र छादय । द्विषामघोनां हर पापचक्षुषां यन्न्ृचक्षुषाम् ॥ २७॥

यन्नो भयं ग्रहेभ्योऽभूत् केतुभ्यो नृभ्य एव च । सरीसृपेभ्यो दंष्ट्रिभ्यो भूतेभ्योऽंहोभ्य एव च ॥ २८॥ सर्वाण्येतानि भगवन्नामरूपास्त्रकीर्तनात् । प्रयान्तु सङ्क्षयं सद्यो ये नः श्रेयः प्रतीपकाः ॥ २९॥

गरुडो भगवान् स्तोत्रस्तोभश्छन्दोमयः प्रभुः । रक्षत्वशेषकृच्छ्रेभ्यो विष्वक्सेनः स्वनामभिः ॥ ३०॥

सर्वापद्भ्यो हरेर्नामरूपयानायुधानि नः । बुद्धीन्द्रियमनःप्राणान् पान्तु पार्षदभूषणाः ॥ ३१॥

यथा हि भगवानेव वस्तुतः सदसच्च यत् । सत्येनानेन नः सर्वे यान्तु नाशमुपद्रवाः ॥ ३२॥

यथैकात्म्यानुभावानां विकल्परहितः स्वयम् । भूषणायुधलिङ्गाख्या धत्ते शक्तीः स्वमायया ॥ ३३॥ तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान् हरिः । पातु सर्वैः स्वरूपैर्नः सदा सर्वत्र सर्वगः ॥ ३४॥

विदिक्षु दिक्षूर्ध्वमधः समन्तादन्तर्बहिर्भगवान् नारसिंहः । प्रहापयँल्लोकभयं स्वनेन ग्रस्तसमस्ततेजाः ॥ ३५॥

मघवन्निदमाख्यातं वर्म नारायणात्मकम् । विजेष्यसेऽञ्जसा येन दंशितोऽसुरयूथपान् ॥ ३६॥

एतद् धारयमाणस्तु यं यं पश्यति चक्षुषा । पदा वा संस्पृशेत् सद्यः साध्वसात् स विमुच्यते ॥ ३७॥

न कुतश्चिद् भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत् । राजदस्युग्रहादिभ्यो व्याघ्रादिभ्यश्च कर्हिचित् ॥ ३८॥

इमां विद्यां पुरा कश्चिच्छौण्डिलो नाम ब्राह्मणः । धारयन् विजहौ देयं योगप्राणो मरुधन्वनि ॥ ३९॥

तस्योपरि विमानेन गन्धर्वपतिर्ययौ । चित्ररथः स्त्रीभिरुतो यत्र द्विजकलेवरम् ॥ ४०॥

गगनान्न्यपतत् सद्यः सविमानो ह्यवाङ्मुखः । स वालखिल्यवचनादस्थीन्यादाय विस्मितः ॥ ४१॥ प्रास्य प्राचीसरस्वत्यां स्नात्वा धाम स्वमन्वगात् ॥ ४२॥

॥ श्रीशुक उवाच ॥ य इदं शृणुयात् काले यो धारयति चादृतः । तं नमस्यन्ति भूतानि मुच्यते सर्वतो भयात् ॥ ४३॥

एतां विद्यामधिगतो विश्वरूपाच्छतक्रतुः । त्रैलोक्यलक्ष्मीं बुभुजे विजित्य मृधेऽसुरान् ॥ ४४॥


नारायण कवच का सरल हिन्दी अनुवाद

प्रस्तावना: राजा परीक्षित ने पूछा- भगवन! इन्द्र ने जिस कवच से सुरक्षित होकर शत्रुओं को जीता, वह 'नारायण कवच' मुझे सुनाइये। श्रीशुकदेव जी बोले- हे राजन! इन्द्र के पूछने पर विश्वरूप ने जो उपदेश दिया, उसे ध्यान से सुनो।

विधि और न्यास: हाथ-पैर धोकर उत्तर की ओर मुख करके बैठें। 'ॐ नमो नारायणाय' और 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मन्त्रों से अंगों में न्यास करें। हृदय में ॐ, सिर पर वि, भोंहों के बीच ष, शिखा में ण, नेत्रों में वे, और सभी संधियों में न कार का न्यास करें।

ध्यान: भगवान विष्णु का ध्यान करें जो गरुड़ पर सवार हैं और आठ भुजाओं में शंख, चक्र, गदा, ढाल, तलवार, धनुष, बाण और पाश धारण किए हुए हैं।

रक्षा मन्त्र (मुख्य कवच):

  1. जल में मत्स्य अवतार और स्थल पर वामन भगवान मेरी रक्षा करें। आकाश में विश्वरूप भगवान रक्षा करें।

  2. दुर्गम स्थानों और युद्ध में नृसिंह भगवान शत्रुओं से रक्षा करें।

  3. रास्तों में वराह भगवान और पर्वतों पर श्रीराम (लक्ष्मण जी सहित) मेरी रक्षा करें।

  4. कपिल मुनि कर्म-बन्धनों से, दत्तात्रेय योग के विघ्नों से और सनत्कुमार कामदेव से रक्षा करें।

  5. धन्वन्तरि बीमारियों से, ऋषभदेव भय से और बुद्धदेव पाखण्डियों से रक्षा करें।

  6. केशव प्रातः काल, गोविन्द दोपहर को, विष्णु अपराह्न में और माधव सायंकाल मेरी रक्षा करें।

  7. रात्रि के समय हृषीकेश, पद्मनाभ, जनार्दन और दामोदर अलग-अलग प्रहरों में मेरी रक्षा करें।

अस्त्रों से प्रार्थना:

  • हे सुदर्शन चक्र! आप भगवान की प्रेरणा से शत्रुओं की सेना को जला डालिये।

  • हे कौमोदकी गदा! आप शत्रुओं के हृदय को चूर्ण कर दीजिये।

  • हे पाञ्चजन्य शंख! आप अपनी भयंकर आवाज से शत्रुओं के हृदय को कँपा दीजिये।

महत्व और फलश्रुति: जो मनुष्य इस कवच का धारण या पाठ करता है, उसे राजा, डाकू, दुष्ट ग्रह या जंगली जानवरों का भय नहीं रहता। एक बार चित्ररथ गन्धर्व इस कवच को धारण करने वाले एक ब्राह्मण की अस्थियों के ऊपर से विमान लेकर निकला, तो उसका विमान नीचे गिर गया। बाद में अस्थियों को विसर्जित करने पर ही वह जा सका। इस विद्या से इन्द्र ने त्रिलोकी का ऐश्वर्य प्राप्त किया।


नारायण कवच का महत्व और विधि (End Notes)

१. महत्व: नारायण कवच केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि एक तान्त्रिक रक्षा कवच है। इसमें 'न्यास' (शरीर के अंगों में मंत्रों की शक्ति स्थापित करना) का बहुत महत्व है। यह व्यक्ति के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा (Aura) बना देता है जिसे कोई नकारात्मक शक्ति भेद नहीं सकती।

२. पाठ की विधि:

  • शुद्धता: इसे स्नान के बाद स्वच्छ पीले वस्त्र पहनकर ही करना चाहिए।

  • संकल्प: यदि किसी विशेष बाधा (जैसे शत्रु कष्ट या गंभीर रोग) के लिए कर रहे हैं, तो संकल्प लेकर करें।

  • एकाग्रता: पाठ करते समय यह भाव रखें कि भगवान की शक्तियाँ सचमुच आपके अंगों की रक्षा कर रही हैं।

  • नियम: गीता प्रेस के अनुसार, इसका पाठ करने से पहले 'कर-न्यास' और 'अङ्ग-न्यास' करना अनिवार्य है, तभी यह सिद्ध होता है।

३. लाभ:

  • इसके पाठ से अकाल मृत्यु टलती है।

  • घर में नकारात्मक ऊर्जा और वास्तु दोष का नाश होता है।

  • मानसिक चिन्ता, डिप्रेशन और अज्ञात भय से मुक्ति मिलती है।

॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे षष्ठस्कन्धे नारायणकवचस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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