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29 Mar 2026
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श्रीकृष्णार्पणमस्तु: सम्पूर्ण श्रीकृष्णाष्टकम्

आदि गुरु शंकराचार्य रचित 'कृष्णाष्टकम्' भगवान श्रीकृष्ण की महिमा का अत्यंत मधुर और सिद्ध स्तोत्र है। यहाँ पढ़ें मूल संस्कृत पाठ, हिंदी अर्थ और इसके पाठ की महिमा।

श्रीकृष्णार्पणमस्तु: सम्पूर्ण श्रीकृष्णाष्टकम्
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॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु: सम्पूर्ण श्रीकृष्णाष्टकम् ॥

मूल संस्कृत पाठ

भजे व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनम् । स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव नन्दनन्दनम् ॥ सुपिच्छगुच्छमस्तकं सुनादवेणुहस्तकम् । अनङ्गरङ्गसागरं नमामि कृष्णपुङ्गवम् ॥ १ ॥

मनोजगर्वमोचनं विशाललोललोचनम् । विधूतगोपशोचनं नमामि पद्मलोचनम् ॥ करारविन्दभूधरं स्मितावलोकसुन्दरम् । महेन्द्रमानदालनं नमामि कृष्णवारणम् ॥ २ ॥

कदम्बसूनकुण्डलं सुचारुगण्डमण्डलम् । व्रजाङ्गनैकवल्लभं नमामि कृष्णदुर्लभम् ॥ यशोदया समोदया सगोपया सख्यया । निखिलगोपगोपिकाद्यर्चितं नमः सदा ॥ ३ ॥

प्रमन्नमुग्धकुन्तलं प्रसूनपल्लवोज्ज्वलम् । जगत्त्रयैकमोहनं नमामि नन्दलालसम् ॥ इन्दीवरदलप्रभं समस्तलोकवैभवम् । गदग्रजं गदाधरं नमामि कृष्णपुङ्गवम् ॥ ४ ॥

विनिर्मितानलाशिनं विनीतवत्सपालकम् । यथा कथञ्चिदेव ये पठन्ति भक्तितः सदा । विहाय सर्वपातकं प्रयान्ति तन्पदं नराः ॥ ५ ॥

मुकुन्दमुकुटोज्ज्वलं स्फुरत्पुरन्दरधनुःप्रभम् । नवेन्दुकोटिसुप्रभं नमामि गोकुलप्रियम् ॥ स्फुरत्करीन्द्रमस्तकं सुकर्णिकारभूषणम् । विचित्ररूपमण्डनं नमामि नन्दनन्दनम् ॥ ६ ॥

समस्तगोपनन्दनं सदानन्दकन्दं विभीषणम् । यशोदामानवर्धनं नमामि कृष्णवारणम् ॥ नवेन्दुबिम्बसुप्रभं नमामि नन्दनन्दनम् । महेन्द्रमानदालनं नमामि कृष्णपुङ्गवम् ॥ ७ ॥

नवेन्दुबिम्बसुप्रभं नमामि नन्दनन्दनम् । महेन्द्रमानदालनं नमामि कृष्णवारणम् ॥ कदम्बकुसुमप्रियं सुचारुगण्डमण्डलम् । व्रजाङ्गनैकवल्लभं नमामि कृष्णदुर्लभम् ॥ ८ ॥

॥ फलश्रुति ॥ कृष्णाष्टकमिदं पुण्यं प्रातरुत्थाय यः पठेत् । कोटिजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति ॥ ९ ॥


सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद

१. जो ब्रज के एकमात्र आभूषण हैं, समस्त पापों का नाश करने वाले हैं और अपने भक्तों के चित्त को प्रसन्न करने वाले हैं, उन नन्दनन्दन को मैं भजता हूँ। जिनके मस्तक पर मोरपंख सुशोभित है, जिनके हाथों में बांसुरी है और जो प्रेम के समुद्र हैं, उन पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण को नमस्कार है।

२. जो कामदेव के गर्व को चूर करने वाले, विशाल और चंचल नेत्रों वाले तथा गोपों के शोक को दूर करने वाले कमल नयन हैं, उन्हें नमस्कार है। जिन्होंने अपने कर-कमलों पर गोवर्धन पर्वत धारण किया, जिनकी मुस्कान सुंदर है और जिन्होंने इंद्र का मान मर्दन किया, उन श्रीकृष्ण को नमस्कार है।

३. जिन्होंने कानों में कदम्ब के फूलों के कुंडल पहने हैं, जिनके कपोल सुंदर हैं और जो ब्रज की गोपियों के प्राणप्रिय स्वामी हैं, उन दुर्लभ श्रीकृष्ण को नमस्कार है। जो यशोदा मैया, ग्वालबालों और सखाओं के साथ रहते हैं और सभी के द्वारा पूजित हैं, उन्हें सदा नमन है।

४. जिनके घुंघराले बाल मोहक हैं, जो फूलों और नवीन पत्तों के आभूषणों से चमक रहे हैं और जो तीनों लोकों को मोहित करने वाले नंदलाल हैं, उन्हें नमस्कार है। जिनकी कांति नील कमल के समान है, जो समस्त लोकों के वैभव हैं और गदा धारण करने वाले हैं, उन्हें प्रणाम है।

५. जिन्होंने भयंकर दावानल का पान किया, जो विनम्रतापूर्वक बछड़ों का पालन करते हैं, जो स्वयं पुण्य के पुंज हैं, उन नन्दनन्दन को मैं नमस्कार करता हूँ।

६. जिनके मुकुट की आभा अत्यंत उज्ज्वल है, जो चमकते हुए इन्द्रधनुष के समान आभा वाले हैं और जो करोड़ों नवीन चंद्रमाओं के समान कांतिवान हैं, उन गोकुल के प्रिय श्रीकृष्ण को नमस्कार है। जो हाथी के मस्तक के समान वैभवशाली हैं और विचित्र आभूषणों से सजे हैं, उन्हें नमन है।

७. जो समस्त गोपों को आनंद देने वाले हैं, जो स्वयं आनंद के मूल कंद हैं, जो यशोदा माता के मान को बढ़ाने वाले हैं, उन गजराज के समान पराक्रमी श्रीकृष्ण को मैं नमस्कार करता हूँ।

८. जिनकी कांति नवीन चंद्रमा के समान उज्ज्वल है, उन नन्दनन्दन को मैं नमस्कार करता हूँ। जो कदम्ब के फूलों को प्रेम करने वाले, सुंदर गालों वाले और ब्रज की गोपियों के एकमात्र वल्लभ हैं, उन दुर्लभ श्रीकृष्ण को मैं नमन करता हूँ।

९. (फलश्रुति): जो मनुष्य प्रातः काल उठकर इस पवित्र कृष्णाष्टक का पाठ करता है, उसके करोड़ों जन्मों के किए हुए पाप केवल इसके स्मरण मात्र से नष्ट हो जाते हैं।


विशेष जानकारी (महत्व और विधि)

  • महत्व: यह स्तोत्र "नन्दनन्दन" (नंद के पुत्र) के रूप में श्रीकृष्ण की बाल-सुलभ कोमलता और उनके ईश्वरत्व का अद्भुत संगम है।

  • पाठ विधि: इसे शुद्ध भाव से, विशेषकर ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4 से 6 बजे के बीच) में पढ़ने से श्लोक संख्या 9 के अनुसार करोड़ों जन्मों के पापों का क्षय होता है।

  • भाव: इस पाठ को करते समय मन में श्रीकृष्ण की उस छवि का ध्यान करना चाहिए जिसमें वे हाथ में बांसुरी और सिर पर मोरपंख धारण किए हुए मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं।

॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीकृष्णाष्टकं सम्पूर्णम् ॥

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