श्री मोक्षदा एकादशी व्रत कथा
श्री मोक्षदा एकादशी व्रत कथा पढ़ें और जानें इस व्रत का महत्व, कथा और पूजा विधि।

॥ श्री मोक्षदा एकादशी व्रत कथा ॥ 🌸🐚
कथा प्रारम्भ:
धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा— "हे जनार्दन! मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है और उसका क्या फल है? कृपा करके विस्तारपूर्वक समझाएँ।"
भगवान श्रीकृष्ण बोले— "हे युधिष्ठिर! इस एकादशी का नाम 'मोक्षदा' है। यह बड़े-बड़े पापों का नाश करने वाली है। इसके प्रभाव से पितरों को मोक्ष मिलता है और व्रती के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। अब तुम इसकी पौराणिक कथा ध्यानपूर्वक सुनो।"
प्राचीन काल में 'गोकुल' नामक नगर में 'वैखानस' नाम का एक प्रतापी राजा राज्य करता था। राजा अपनी प्रजा का पुत्र के समान पालन करता था। एक रात राजा ने स्वप्न में देखा कि उसके पिता नरक की भीषण यातनाएं भोग रहे हैं। अपने पिता को इस अवस्था में देखकर राजा अत्यंत व्याकुल हो उठा और सुबह होते ही उसने विद्वान ब्राह्मणों और ऋषियों को बुलाकर अपना स्वप्न सुनाया।
राजा ने कहा— "हे ऋषिवर! मैंने स्वप्न में अपने पिता को नरक में कष्ट भोगते देखा है। वे मुझसे कह रहे थे कि 'पुत्र! मुझे इस कष्ट से मुक्त करो।' अब मुझे इस राज्य और सुख में कोई रुचि नहीं रही। कृपा करके मुझे कोई ऐसा उपाय बताएँ जिससे मेरे पिता को मुक्ति मिल सके।"
ब्राह्मणों ने राजा को पर्वत मुनि के आश्रम जाने की सलाह दी। राजा पर्वत मुनि के आश्रम पहुँचा और उन्हें अपनी व्यथा सुनाई। पर्वत मुनि ने अपनी योग-दृष्टि से राजा के पिता के भूतकाल को देखा और कहा— "हे राजन्! तुम्हारे पिता ने पूर्व जन्म में कामवश होकर अपनी दूसरी पत्नी को ऋतुदान न देकर घोर अपराध किया था। उसी पाप के कारण वे नरक में कष्ट भोग रहे हैं।"
राजा ने व्याकुल होकर पूछा— "मुनिवर! इस पाप से मुक्ति का क्या उपाय है?"
पर्वत मुनि बोले— "हे राजन्! मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष में जो 'मोक्षदा' नामक एकादशी आती है, तुम अपनी पत्नी और परिवार सहित उसका विधि-विधान से व्रत करो और उस व्रत का पूरा पुण्य अपने पिता को दान कर दो। उसी पुण्य के प्रभाव से तुम्हारे पिता को नरक से मुक्ति मिल जाएगी।"
राजा ने मुनि के कथनानुसार श्रद्धापूर्वक मोक्षदा एकादशी का व्रत किया और उसका फल अपने पिता को अर्पित कर दिया। पुण्य दान करते ही आकाश से पुष्प वर्षा हुई और राजा के पिता नरक के दुखों से मुक्त होकर स्वर्ग को चले गए। जाते समय उन्होंने अपने पुत्र को आशीर्वाद दिया और कहा— "पुत्र! तुम्हारे कारण ही आज मुझे मोक्ष प्राप्त हुआ है।"
॥ व्रत के नियम और पूजन विधि ॥ 📋✨
गीता जयंती उत्सव: चूंकि इस दिन गीता जयंती भी होती है, इसलिए भगवान विष्णु के साथ-साथ श्रीमद्भगवद्गीता का पूजन करना और गीता का पाठ करना अत्यंत श्रेष्ठ माना जाता है।
भगवान दामोदर का पूजन: मोक्षदा एकादशी पर भगवान विष्णु के 'दामोदर' स्वरूप की पूजा की जाती है। उन्हें धूप, दीप, पीले पुष्प और नैवेद्य अर्पित करें।
तुलसी अर्पण: भगवान को तुलसी पत्र चढ़ाना अनिवार्य है।
व्रत का संकल्प: सुबह स्नान के बाद हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें और पूरा दिन सात्विक रहें।
अन्न का त्याग: एकादशी के दिन चावल और किसी भी प्रकार के अनाज का सेवन वर्जित है।
रात्रि जागरण: रात्रि में प्रभु के भजनों का कीर्तन करें।
द्वादशी पारण: अगले दिन सूर्योदय के बाद ब्राह्मणों को भोजन या दान देकर अपना व्रत खोलें।
॥ मोक्षदा एकादशी का धार्मिक महत्व ॥ 🔱📖
नाम की सार्थकता: यह एकादशी 'मोक्ष' देने वाली है, इसलिए इसे 'मोक्षदा' कहा जाता है।
पितरों का उद्धार: यह एकमात्र ऐसी एकादशी है जिसका पुण्य दान करने से पितर प्रेत योनि या नरक से मुक्त होकर सीधे स्वर्ग जाते हैं।
ज्ञान का दिन: इसी दिन कुरुक्षेत्र में गीता का ज्ञान प्रकट हुआ था, अतः यह दिन अज्ञानता के अंधकार को मिटाने वाला माना जाता है।
॥ व्रत के लाभ और फल ॥ 💎🌈
पितृ ऋण से मुक्ति: इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य अपने पूर्वजों को कष्टों से मुक्ति दिलाकर पितृ ऋण से मुक्त हो जाता है।
पापों का क्षय: अज्ञानता में किए गए पापों का नाश होता है और बुद्धि सात्विक बनती है।
वैकुण्ठ की प्राप्ति: निष्काम भाव से व्रत करने वाला व्यक्ति अंत में जन्म-मरण के चक्र से छूटकर वैकुण्ठ धाम को प्राप्त होता है।
अश्वमेध यज्ञ का फल: शास्त्रों के अनुसार, इस व्रत को करने से कई अश्वमेध यज्ञों के समान फल प्राप्त होता है।