Sanatan Vani • Devotion, wisdom and reading
07 Apr 2026
Sanatan Vani Sacred wisdom in a modern form
Stotra

शिव महिम्न स्तोत्र (गन्धर्व पुष्पदंत कृत) — हिन्दी अर्थ, लाभ एवं पाठ विधि

शिव महिम्न स्तोत्र गन्धर्व पुष्पदंत द्वारा रचित भगवान शिव की अत्यंत प्रभावशाली स्तुति है। इसका श्रद्धा से पाठ करने पर पापों का नाश, भय से मुक्ति, शिव कृपा, धन-समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। यहाँ सम्पूर्ण शिव महिम्न स्तोत्र का हिन्दी अर्थ, लाभ, पाठ विधि और सही समय दिया गया है।

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शिव महिम्न स्तोत्र (सम्पूर्ण 43 श्लोक)

महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः।
अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन् ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः॥1॥

अतीतः पन्थानं तव च महिमा वाङ्मनसयोः अतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि।
स कस्य स्तोतव्यः कति विधगुणः कस्य विषयः पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः॥2॥

मधुस्फीता वाचः परममृतं निर्मितवता तव ब्रह्मन् किं वागपि सुरगुरोर्विस्मयपदम्।
मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथन बुद्धिर्व्यवसिता॥3॥

तवैश्वर्यं यत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत् त्रयीवस्तु व्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासु तनुषु।
अभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणीं विहन्तुं व्याक्रोशीं विदधति इह केचिज्जडधियः॥4॥

किमीहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च।
अतर्क्यैश्वर्ये त्वय्यनवसरदुःस्थो हतधियः कुतर्कोऽयं कांश्चिन्मुखरयति मोहाय जगतः॥5॥

अजन्त्रं जन्माद्यस्य यदिह विभवः स्यादुपरितः जगद्भारो यस्य स्थितिरपि यतो निर्वहति च।
अजन्मा योऽस्माद् भवति भुवनस्यैकनिधनः स कस्ते स्तोतव्यः किमु बहु न नामोऽस्ति शिवते॥6॥

त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति प्रभिन्ना भेदाः प्रभवति नृणां मत्सरभृताम्।
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषां नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥7॥

ध्रुवं कश्चित्सर्वं सकलमपरस्त्वध्रुवमिदं परो ध्रौव्याध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये।
समस्तेऽप्येतस्मिन् पुरमथन तैर् विस्मित इव स्तुवञ्जिह्रे त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता॥8॥

तवैश्वर्यं यत्नाद् यदुपरि विरिञ्चिर्हरिरधः परिच्छेत्तुं यातावनलमनलस्कन्धवपुषः।
ततो भक्तिश्रद्धाभरगुरुगृणद्भ्यां गिरिश यत् स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति॥9॥

अयत्नादापाद्य त्रिभुवनमवैरव्यतिकरं दशास्यो यद्बाहूनभृत रणकण्डूपरवशान्।
शिरःपद्मश्रेणी रचितचरणाम्भोरुहबलेः स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम्॥10॥

अमुष्य त्वत्सेवासमधिगतसारं भुजवनं बलात्कैलासेऽपि त्वदधिवसतो विक्रमयतः।
अलभ्या पातालेऽप्यलसचलिताङ्गुष्ठशिरसि प्रतिष्ठा त्वय्यासीद्ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः॥11॥

यदृद्धिं सुत्राम्णो वरद परमोच्चैरपि सतीं अधश्चक्रे बाणः परिजनविधेयस्त्रिभुवनः।
न तच्चित्रं तस्मिन् वरिवसितरि त्वच्चरणयोः न कस्याप्युत्कर्षो भवति शिरसस्त्वय्यवनतः॥12॥

अकाण्डब्रह्माण्डक्षयचकितदेवासुरकृपा विधेयस्यासीत् यस्त्रिपुरहर शूलस्य निशितः।
स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो विकारोऽपि श्लाघ्यो भुवनभयभङ्गव्यसनिनः॥13॥

चक्रेणाधः शिरसि निधाय त्वदधिवसौ निषेव्येयं पादौ श्रितविधिरिव त्रिपुरहर।
न कश्चिद् धन्यस्ते जगति गतिमान् यत्प्रणतिभिः स्वयं भोग्यं भोग्यं भवति भुवनत्रयस्य विभो॥14॥

त्वदन्यः पाणिभ्यां अभयवरदो दैवतगणः त्वमेवैकः शम्भो भवभयभयच्छेदकृतिभिः।
वितत्य त्वं लोकान् वितरति कृपां भक्तजनता न कश्चित् त्वत्तुल्यो जगति शरण्यः शरणद॥15॥

महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः अघोरान्नापरो मन्त्रः नास्ति तत्त्वं गुरोः परम्॥16॥

दीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः महिम्नः स्तवपाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥17॥

कुसुमदशननाम सर्वगन्धर्वराजः शिशुशशधरमौलेर्देवदेवस्य दासः।
स खलु निजमहिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात् स्तवनमिदमकार्षीद्दिव्यदिव्यं महिम्नः॥18॥

सुरगुरुमभिपूज्य स्वर्गमोक्षैकहेतुं पठति यदि मनुष्यः प्राञ्जलिर्नान्यचेताः।
व्रजति शिवसमीपं किं नु लोकेषु सिद्धं स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम्॥19॥

आसमाप्तमिदं स्तोत्रं पुण्यं गन्धर्वभाषितम् अनौपम्यं मनोहारि शिवमीश्वरवर्णनम्॥20॥

इत्येषा वाङ्मयी पूजा श्रीमच्छङ्करपादयोः अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः॥21॥

तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः॥22॥

एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोके महीयते॥23॥

श्रीपुष्पदन्तमुखपङ्कजनिर्गतेन स्तोत्रेण किल्बिषहरेण हरप्रियेन।
कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः॥24॥

असुरसुरमुनीन्द्रैरर्चितस्येन्दुमौलेः ग्रथितगुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य।
सकलगुणवरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानो रुचिरमलघुवृत्तैः स्तोत्रमेतच्चकार॥25॥

अहरहरनवद्यं धूर्जटेः स्तोत्रमेतत् पठति परमभक्त्या शुद्धचित्तः पुमान्यः।
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथात्र प्रचुरतरधनायुः पुत्रवान् कीर्तिमांश्च॥26॥

महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः अघोरान्नापरो मन्त्रः नास्ति तत्त्वं गुरोः परम्॥27॥

दीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः महिम्नः स्तवपाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥28॥

कुसुमदशननाम सर्वगन्धर्वराजः शिशुशशधरमौलेर्देवदेवस्य दासः।
स खलु निजमहिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात् स्तवनमिदमकार्षीद्दिव्यदिव्यं महिम्नः॥29॥

सुरगुरुमभिपूज्य स्वर्गमोक्षैकहेतुं पठति यदि मनुष्यः प्राञ्जलिर्नान्यचेताः।
व्रजति शिवसमीपं किं नु लोकेषु सिद्धं स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम्॥30॥

आसमाप्तमिदं स्तोत्रं पुण्यं गन्धर्वभाषितम् अनौपम्यं मनोहारि शिवमीश्वरवर्णनम्॥31॥

इत्येषा वाङ्मयी पूजा श्रीमच्छङ्करपादयोः अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः॥32॥

तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः॥33॥

एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोके महीयते॥34॥

महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः । अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम् ॥ 35॥

दीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः । महिम्नस्तवपाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ 36॥

कुसुमदशननामा सर्वगन्धर्वराजः शशिधरवरमौलेर्देवदेवस्य दासः ।
स खलु निजमहिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात् स्तवनमिदमकार्षीद् दिव्यदिव्यं महिम्नः ॥ 37॥

सुरगुरुमभिपूज्य स्वर्गमोक्षैकहेतुं पठति यदि मनुष्यः प्राञ्जलिर्नान्यचेताः ।
व्रजति शिवसमीपं किन्नरैः स्तूयमानः स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम् ॥ 38॥

आसमाप्तमिदं स्तोत्रं पुण्यं गन्धर्वभाषितम् । अनौपम्यं मनोहारि सर्वमीश्वरवर्णनम् ॥ 39॥

इत्येषा वाङ्मयी पूजा श्रीमच्छङ्करपादयोः । अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः ॥ 40॥

तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर । यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः ॥ 41॥

एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः । सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोके महीयते ॥ 41॥

श्रीपुष्पदन्तमुखपङ्कजनिर्गतेन स्तोत्रेण किल्बिषहरेण हरप्रियेण ।
कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः ॥ 43॥


🕉️ शिव महिम्न स्तोत्र — हिन्दी अर्थ


श्लोक 1 — अर्थ

हे भगवान शिव! आपकी महिमा का पार पाना असंभव है। बड़े-बड़े विद्वान भी आपकी महिमा को पूर्ण रूप से नहीं जान सकते। ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं द्वारा की गई स्तुति भी आपकी महिमा के सामने अधूरी ही रह जाती है।
फिर भी प्रत्येक व्यक्ति अपनी बुद्धि और क्षमता के अनुसार आपकी स्तुति करता है। उसी प्रकार मैं भी अपनी सीमित बुद्धि से आपकी स्तुति करने का साहस कर रहा हूँ। हे हर! इस स्तोत्र में मेरी यह विनम्र प्रार्थना दोषरहित मानी जाए।


श्लोक 2 — अर्थ

आपकी महिमा मन और वाणी दोनों की सीमा से परे है। वेद भी आपकी महिमा का वर्णन करते समय आश्चर्यचकित होकर रुक जाते हैं।
ऐसी स्थिति में कौन आपकी स्तुति कर सकता है? आपकी महिमा कितनी है? आपके गुण कितने हैं? आप किस सीमा तक हैं — यह सब मन और वाणी के परे है।
जो भी व्यक्ति आपकी महिमा का वर्णन करने का प्रयास करता है, उसका मन और वाणी स्वयं ही सीमित होकर रुक जाते हैं।


श्लोक 3 — अर्थ

हे त्रिपुरारी! आपने जो वाणी उत्पन्न की है, वह अमृत के समान मधुर है। देवताओं के गुरु बृहस्पति की वाणी भी आपकी महिमा का पूर्ण वर्णन करने में असमर्थ है।
फिर भी मैं आपकी महिमा का वर्णन कर रहा हूँ। मेरा उद्देश्य केवल इतना है कि आपकी महिमा का गुणगान करके मेरी वाणी पवित्र हो जाए। इसी भावना से मैं आपकी स्तुति कर रहा हूँ।


श्लोक 4 — अर्थ

आपकी शक्ति से ही यह संसार उत्पन्न होता है, चलता है और अंत में नष्ट होता है। सृष्टि, पालन और संहार — ये तीनों कार्य आप ही करते हैं।
आप तीन गुणों (सत्व, रज, तम) के अनुसार तीन रूप धारण करते हैं — ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र।
लेकिन अज्ञानी लोग इन तीनों को अलग-अलग देवता मानकर भ्रमित हो जाते हैं और आपस में विवाद करते हैं। वास्तव में यह सब आपकी ही शक्ति के विभिन्न रूप हैं।


श्लोक 5 — अर्थ

कुछ लोग प्रश्न करते हैं — यह संसार किसने बनाया? कैसे बनाया? किस सामग्री से बनाया? इसका आधार क्या है?
लेकिन आपकी महिमा इतनी महान और असीम है कि इन प्रश्नों का उत्तर तर्क से नहीं दिया जा सकता।
ऐसे लोग केवल कुतर्क करके संसार में भ्रम फैलाते हैं, क्योंकि आपकी शक्ति तर्क और बुद्धि से परे है।


श्लोक 6 — अर्थ

यह संसार जिसकी शक्ति से उत्पन्न होता है, जो इसका पालन करता है और अंत में नष्ट करता है — वही आप हैं।
आप स्वयं अजन्मा हैं, लेकिन संसार की उत्पत्ति का कारण हैं।
ऐसे परम कारण स्वरूप भगवान की स्तुति कौन कर सकता है? फिर भी आपको बार-बार नमस्कार है।


श्लोक 7 — अर्थ

वेद, सांख्य, योग, पशुपत और वैष्णव — ये सभी अलग-अलग मत हैं। लोग अपनी-अपनी रुचि के अनुसार अलग-अलग मार्ग अपनाते हैं।
कोई सीधा मार्ग चलता है, कोई टेढ़ा, कोई अलग।
लेकिन जैसे सभी नदियाँ अंत में समुद्र में मिलती हैं, वैसे ही सभी मार्ग अंततः आप तक ही पहुँचते हैं।


श्लोक 8 — अर्थ

कुछ लोग संसार को स्थायी मानते हैं, कुछ अस्थायी। कुछ कहते हैं सब नश्वर है, कुछ कहते हैं सब स्थिर है।
इन विभिन्न मतों के कारण लोग भ्रमित होते हैं।
लेकिन वास्तव में यह सब आपकी ही लीला है। ऐसे में आपकी स्तुति करना ही उचित है।


श्लोक 9 — अर्थ

ब्रह्मा ऊपर की ओर और विष्णु नीचे की ओर आपकी महिमा का अंत खोजने गए।
लेकिन वे आपकी सीमा नहीं पा सके। आपकी महिमा अनंत है।
अंत में उन्होंने आपकी भक्ति की और आपकी स्तुति की।
इससे सिद्ध होता है कि आपकी भक्ति कभी निष्फल नहीं होती।


श्लोक 10 — अर्थ

रावण ने अपने बल से तीनों लोकों को जीत लिया था। उसके दस सिर और बीस भुजाएँ थीं।
लेकिन जब उसने आपके चरणों की पूजा की और अपने सिरों को आपके चरणों में अर्पित किया, तब उसे स्थायी शक्ति मिली।
इससे स्पष्ट है कि आपकी भक्ति से ही वास्तविक शक्ति और स्थिरता प्राप्त होती है।


श्लोक 11 — अर्थ

रावण ने भगवान शिव की सेवा से अद्भुत शक्ति प्राप्त की और उसी बल से कैलाश पर्वत को उठाने का प्रयास किया। वह अपने बाहुबल पर गर्व कर रहा था। तब भगवान शिव ने केवल अपने पैर के अंगूठे से कैलाश पर्वत को दबा दिया। इससे रावण का अभिमान नष्ट हो गया और वह पीड़ा से चिल्लाने लगा।
इस घटना से यह सिद्ध होता है कि अहंकारी व्यक्ति चाहे कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, भगवान शिव के सामने उसका अभिमान नष्ट हो जाता है।


श्लोक 12 — अर्थ

हे वर देने वाले भगवान! बाणासुर ने भी अत्यधिक शक्ति प्राप्त की थी और तीनों लोक उसके अधीन हो गए थे। परंतु उसने भी अंततः आपके चरणों में ही शरण ली।
जो व्यक्ति आपके चरणों में झुक जाता है, वही वास्तव में महान बनता है। जो आपके सामने सिर झुकाता है, उसका उत्कर्ष निश्चित होता है।


श्लोक 13 — अर्थ

समुद्र मंथन के समय जब हलाहल विष निकला, तो देवता और असुर भयभीत हो गए। संसार के विनाश का खतरा उत्पन्न हो गया। तब आपने उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया।
इससे आपका कंठ नीला हो गया, लेकिन इससे आपकी शोभा और बढ़ गई। संसार को बचाने के लिए आपने यह कष्ट सहा — इसलिए यह विकार भी आपके लिए प्रशंसनीय है।


श्लोक 14 — अर्थ

हे त्रिपुरारी! जो व्यक्ति आपके चरणों की सेवा करता है, वह संसार के भोगों से ऊपर उठ जाता है।
जो आपके चरणों में सिर झुकाता है, वही वास्तव में धन्य है। ऐसा व्यक्ति तीनों लोकों के भोगों का अधिकारी बन जाता है।
आपके चरणों की शरण ही सर्वोच्च मार्ग है।


श्लोक 15 — अर्थ

आपके अतिरिक्त कोई देवता ऐसा नहीं है जो दोनों हाथों से अभय और वरदान देता हो।
हे शम्भो! आप ही संसार के भय को दूर करने वाले हैं। आप ही सभी भक्तों को कृपा प्रदान करते हैं।
इस संसार में आप जैसा शरण देने वाला कोई नहीं है।


श्लोक 16 — अर्थ

भगवान महेश्वर से बड़ा कोई देव नहीं है।
शिव महिम्न स्तोत्र से बड़ी कोई स्तुति नहीं है।
अघोर मंत्र से श्रेष्ठ कोई मंत्र नहीं है।
और गुरु तत्व से बढ़कर कोई सत्य नहीं है।


श्लोक 17 — अर्थ

दीक्षा लेना, दान देना, तप करना, तीर्थ यात्रा करना, ज्ञान प्राप्त करना, यज्ञ करना — ये सभी धार्मिक कार्य भी
शिव महिम्न स्तोत्र के पाठ के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं हैं।
अर्थात इसका पाठ अत्यंत श्रेष्ठ है।


श्लोक 18 — अर्थ

कुसुमदशन नाम के गन्धर्वराज, जो चंद्रमा धारण करने वाले भगवान शिव के सेवक थे, शिव के क्रोध से अपने पद से गिर गए।
तब उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए यह दिव्य शिव महिम्न स्तोत्र बनाया।


श्लोक 19 — अर्थ

जो मनुष्य भगवान शिव की पूजा करके, हाथ जोड़कर, एकाग्र मन से इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह स्वर्ग और मोक्ष प्राप्त करता है।
वह शिव के समीप जाता है और देवता उसकी स्तुति करते हैं।
यह पुष्पदंत द्वारा रचित स्तोत्र कभी निष्फल नहीं होता।


श्लोक 20 — अर्थ

यह गन्धर्व द्वारा कहा गया यह पवित्र स्तोत्र भगवान शिव की महिमा का अद्वितीय और मनोहर वर्णन करता है।
यह स्तोत्र अत्यंत पुण्यदायक है और भगवान शिव को प्रिय है।


श्लोक 21 — अर्थ

यह वाणी रूपी पूजा भगवान शंकर के चरणों में अर्पित की गई है।
इस स्तुति के माध्यम से मैं भगवान सदाशिव को प्रसन्न करना चाहता हूँ।
हे देवेश! मेरी यह वाणी रूपी पूजा स्वीकार करें और मुझ पर कृपा करें।


श्लोक 22 — अर्थ

हे महेश्वर! मैं आपके वास्तविक स्वरूप को नहीं जानता।
आप जैसे भी हैं, जिस स्वरूप में हैं, उसी स्वरूप को मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ।
आपकी महिमा और स्वरूप मन, बुद्धि और वाणी से परे है।


श्लोक 23 — अर्थ

जो मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ दिन में एक बार, दो बार या तीन बार करता है,
वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
ऐसा व्यक्ति मृत्यु के बाद शिवलोक को प्राप्त करता है और महान सम्मान पाता है।


श्लोक 24 — अर्थ

यह स्तोत्र पुष्पदंत के मुख कमल से निकला हुआ है।
यह पापों का नाश करने वाला और भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है।
जो व्यक्ति इसे कंठस्थ करके, मन लगाकर पढ़ता है,
उससे भगवान महेश्वर अत्यंत प्रसन्न होते हैं।


श्लोक 25 — अर्थ

चंद्रमा को मस्तक पर धारण करने वाले भगवान शिव की महिमा का वर्णन करते हुए
गंधर्वराज पुष्पदंत ने यह सुंदर स्तोत्र बनाया।
उन्होंने भगवान शिव के अनंत गुणों को जोड़कर यह मनोहर स्तुति रची।


श्लोक 26 — अर्थ

जो व्यक्ति प्रतिदिन श्रद्धा और शुद्ध मन से इस स्तोत्र का पाठ करता है,
वह शिवलोक में रुद्र के समान सम्मान पाता है।
इस संसार में भी उसे धन, आयु, पुत्र और यश की प्राप्ति होती है।


श्लोक 27 — अर्थ

भगवान शिव से बढ़कर कोई देव नहीं है।
शिव महिम्न स्तोत्र से बढ़कर कोई स्तुति नहीं है।
अघोर मंत्र से श्रेष्ठ कोई मंत्र नहीं है।
और गुरु तत्व से बड़ा कोई सत्य नहीं है।


श्लोक 28 — अर्थ

दीक्षा, दान, तप, तीर्थ यात्रा, ज्ञान, यज्ञ आदि सभी धार्मिक क्रियाएँ भी
शिव महिम्न स्तोत्र के पाठ के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं हैं।
अर्थात इसका पाठ अत्यंत महान फल देने वाला है।


श्लोक 29 — अर्थ

कुसुमदशन नाम के गन्धर्वराज, जो भगवान शिव के सेवक थे,
शिव के क्रोध से अपने पद से गिर गए।
तब उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए यह दिव्य स्तोत्र बनाया।


श्लोक 30 — अर्थ

जो मनुष्य भगवान शिव की पूजा करके, हाथ जोड़कर, एकाग्र मन से इस स्तोत्र का पाठ करता है,
वह स्वर्ग और मोक्ष प्राप्त करता है।
वह शिव के समीप जाता है और यह स्तोत्र कभी निष्फल नहीं होता।


श्लोक 31 — अर्थ

यह गन्धर्व द्वारा कहा गया यह पुण्य स्तोत्र भगवान शिव की महिमा का अद्वितीय वर्णन है।
यह अत्यंत मनोहर है और भगवान शिव के स्वरूप का सुंदर वर्णन करता है।
इसका पाठ करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।


श्लोक 32 — अर्थ

यह वाणी रूपी पूजा भगवान शंकर के चरणों में अर्पित की गई है।
इस स्तुति के माध्यम से मैं भगवान सदाशिव को प्रसन्न करना चाहता हूँ।
हे देवों के स्वामी! आप इस स्तुति से प्रसन्न हों।


श्लोक 33 — अर्थ

हे महेश्वर! मैं आपके वास्तविक स्वरूप को नहीं जानता।
आप जैसे भी हैं, जिस स्वरूप में हैं, उसी स्वरूप को मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ।
आपकी महिमा असीम है।


श्लोक 34 — अर्थ

जो मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ एक बार, दो बार या तीन बार करता है,
वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
ऐसा व्यक्ति शिवलोक को प्राप्त करता है और महान सम्मान पाता है।


श्लोक 35 — अर्थ

भगवान शिव से बड़ा कोई देव नहीं है।
इस स्तोत्र से बड़ी कोई स्तुति नहीं है।
अघोर मंत्र से श्रेष्ठ कोई मंत्र नहीं है।
और गुरु तत्व से बड़ा कोई सत्य नहीं है।


श्लोक 36 — अर्थ

दीक्षा लेना, दान देना, तप करना, तीर्थ यात्रा करना, ज्ञान प्राप्त करना, यज्ञ करना —
ये सभी धार्मिक कार्य भी शिव महिम्न स्तोत्र के पाठ के बराबर नहीं हैं।
इसका पाठ अत्यंत श्रेष्ठ फल देता है।


श्लोक 37 — अर्थ

कुसुमदशन नाम के गन्धर्वराज, जो भगवान शिव के सेवक थे,
शिव के क्रोध से अपने पद से गिर गए।
तब उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए यह दिव्य स्तोत्र बनाया।


श्लोक 38 — अर्थ

जो मनुष्य भगवान शिव की पूजा करके, हाथ जोड़कर, एकाग्र मन से इस स्तोत्र का पाठ करता है,
वह स्वर्ग और मोक्ष प्राप्त करता है।
वह शिव के समीप जाता है और देवता उसकी स्तुति करते हैं।


श्लोक 39 — अर्थ

यह गन्धर्व द्वारा कहा गया यह पुण्य स्तोत्र भगवान शिव की महिमा का अद्वितीय वर्णन करता है।
यह मन को आनंद देने वाला और अत्यंत पवित्र है।


श्लोक 40 — अर्थ

यह वाणी रूपी पूजा भगवान शंकर के चरणों में अर्पित की गई है।
भगवान सदाशिव इससे प्रसन्न हों और कृपा करें।


श्लोक 41 — अर्थ

हे महेश्वर! मैं आपके वास्तविक स्वरूप को नहीं जानता।
आप जैसे भी हैं, मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूँ।
आपकी महिमा अनंत है।


श्लोक 42 — अर्थ

जो मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ श्रद्धा से करता है,
वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
वह शिवलोक में सम्मान प्राप्त करता है।


श्लोक 43 — अर्थ

जो व्यक्ति इस स्तोत्र को श्रद्धा और एकाग्रता से पढ़ता है,
जो इसे कंठस्थ करता है और मन से जप करता है,
भगवान शिव उससे अत्यंत प्रसन्न होते हैं और उसे कृपा प्रदान करते हैं।


शिव महिम्न स्तोत्र के लाभ

  1. पापों का नाश होता है
  2. शिव कृपा प्राप्त होती है
  3. भय और चिंता समाप्त होती है
  4. मानसिक शांति मिलती है
  5. धन और समृद्धि बढ़ती है
  6. रोगों से रक्षा होती है
  7. शत्रु बाधा समाप्त होती है
  8. आत्मविश्वास बढ़ता है
  9. आध्यात्मिक उन्नति होती है
  10. मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है
  11. ग्रह दोष शांत होते हैं
  12. घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है

शिव महिम्न स्तोत्र कब करना चाहिए

सबसे श्रेष्ठ समय:

  • ब्रह्म मुहूर्त (सुबह)
  • सोमवार
  • प्रदोष काल
  • महाशिवरात्रि
  • सावन महीना
  • संकट के समय
  • महत्वपूर्ण कार्य से पहले

शिव महिम्न स्तोत्र पाठ विधि

सरल विधि

  1. सुबह स्नान करें
  2. भगवान शिव के सामने बैठें
  3. दीपक जलाएं
  4. जल या दूध चढ़ाएं
  5. ॐ नमः शिवाय 11 बार बोलें
  6. शिव महिम्न स्तोत्र पढ़ें
  7. अंत में प्रार्थना करें

विशेष विधि (अधिक प्रभावी)

  • सफेद या कुशासन पर बैठें
  • उत्तर या पूर्व दिशा में मुख रखें
  • शिवलिंग पर जल अर्पित करें
  • बिल्वपत्र चढ़ाएं
  • धूप दीप करें
  • शिव महिम्न स्तोत्र पढ़ें
  • अंत में ॐ नमः शिवाय जप करें

कितनी बार पढ़ना चाहिए

  • सामान्य: 1 बार
  • इच्छा पूर्ति: 3 बार
  • समस्या समाधान: 11 बार
  • विशेष साधना: 21 बार
  • सिद्धि हेतु: 40 दिन नियमित

पाठ के नियम

  • शुद्ध उच्चारण करें
  • बैठकर पढ़ें
  • बीच में बात न करें
  • मन शांत रखें
  • जल्दी जल्दी न पढ़ें
  • श्रद्धा से पढ़ें

शिव महिम्न स्तोत्र की विशेषता

  • यह गन्धर्व पुष्पदंत द्वारा रचित है
  • भगवान शिव की महान स्तुति मानी जाती है
  • अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र माना जाता है
  • वेदों के समान महिमा बताई गई है
  • इसका पाठ सभी धार्मिक कर्मों से श्रेष्ठ कहा गया है

किसे पढ़ना चाहिए

  • जिनको डर लगता हो
  • जिनके जीवन में बाधाएँ हों
  • आर्थिक समस्या हो
  • मानसिक तनाव हो
  • शिव भक्ति बढ़ाना चाहते हों
  • आध्यात्मिक उन्नति चाहते हों
  • ग्रह दोष हो

पाठ के बाद क्या करें

  • ॐ नमः शिवाय 11 बार जप करें
  • शिव जी को प्रणाम करें
  • मनोकामना बोलें
  • जल अर्पित करें
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