पुरुषोत्तम मास व्रत कथा
पुरुषोत्तम मास व्रत कथा
जब चन्द्रमास और सौरमास के संतुलन हेतु अतिरिक्त मास आता है, तब उसे अधिक मास कहा जाता है। भगवान विष्णु ने इस उपेक्षित मास को अपना नाम देकर पुरुषोत्तम मास बनाया। इसी कारण यह मास श्रीहरि-उपासना, जप, दान, कथा, गीता-पाठ, दीपदान और व्रत के लिए विशेष शुभ माना जाता है।
कथा के अनुसार अधिक मास को अन्य महीनों ने हीन समझकर तिरस्कृत किया। दुखी होकर वह भगवान विष्णु की शरण में पहुँचा। तब श्रीहरि ने करुणा कर उसे अपना सर्वोत्तम नाम “पुरुषोत्तम” दिया और कहा कि जो भी इस मास में व्रत, भक्ति, दान, कथा और सत्कर्म करेगा उसे अनेक गुना पुण्य प्राप्त होगा। तब से यह मास साधना, प्रायश्चित और संकल्प सिद्धि का विशेष समय माना जाता है।
पुरुषोत्तम मास में प्रातःस्नान, विष्णुसहस्रनाम, गीता-पाठ, तुलसी-सेवा, दान, ब्रह्मचर्य, सात्त्विक आहार और हरिनाम-स्मरण का बहुत महत्व है। यह व्रत जीवन को अनुशासित करता है और पिछले पापों का शमन करने वाला माना जाता है।
पुरुषोत्तम मास व्रत का फल
- अधिक पुण्य और संकल्प-सिद्धि
- प्रायश्चित, तप और भक्ति की वृद्धि
- श्रीविष्णु की विशेष कृपा
- जीवन में शांति, संयम और आध्यात्मिक प्रगति