इंदिरा एकादशी व्रत कथा
यमलोक में तड़प रहे पितरों को कैसे मिली मुक्ति? 😱 जानिए इन्दिरा एकादशी का वो रहस्य जो आपके पूर्वजों को पहुंचाएगा स्वर्ग। 👇

॥ श्री इन्दिरा एकादशी व्रत कथा (सम्पूर्ण वृत्तांत) ॥ 🐚✨🕯️
धर्मराज युधिष्ठिर बोले— "हे जनार्दन! आपने भाद्रपद शुक्ल 'पद्मा एकादशी' का महात्म्य सुनाकर मेरा संशय दूर किया। अब कृपा करके आश्विन कृष्ण एकादशी के बारे में बताएं। इसका नाम क्या है और इसकी विधि क्या है?"
भगवान श्री कृष्ण बोले— "हे युधिष्ठिर! आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम 'इन्दिरा एकादशी' है। यह पितरों को दुर्गति से बचाकर स्वर्ग भेजने वाली है। इसकी कथा सुनने मात्र से ही मनुष्य के सब पाप कट जाते हैं। ध्यानपूर्वक सुनो।"
१. महिष्मति नगरी के प्रतापी राजा इन्द्रसेन
सत्ययुग में 'महिष्मति' नाम की एक अत्यंत समृद्ध नगरी थी। वहाँ इन्द्रसेन नाम के एक प्रतापी राजा शासन करते थे। वे महान विष्णु भक्त थे और अपनी प्रजा का पुत्रवत पालन करते थे। उनके राज्य में चारों ओर सुख-शांति थी।
२. देवर्षि नारद का आगमन और पितृ संदेश
एक दिन राजा इन्द्रसेन अपनी सभा में बैठे थे, तभी आकाश मार्ग से देवर्षि नारद वहाँ पधारे। राजा ने उन्हें ससम्मान आसन दिया और उनकी पूजा की। नारद मुनि ने कहा— "हे राजन्! मैं यमलोक से आ रहा हूँ। वहाँ यमराज की सभा में मैंने तुम्हारे पिता को देखा।"
राजा चकित होकर बोले— "हे मुनिवर! मेरे पिता तो धार्मिक थे, फिर वे यमराज की सभा में क्या कर रहे हैं?"
नारद जी बोले— "हे राजन्! तुम्हारे पिता अपने किसी पिछले जन्म के व्रत के भंग होने के कारण यमलोक में हैं। उन्होंने तुम्हारे लिए एक संदेश भेजा है। उन्होंने कहा है— 'मेरा पुत्र इन्द्रसेन महिष्मति का राजा है। उससे कहना कि वह मेरे निमित्त इन्दिरा एकादशी का व्रत करे, ताकि उसके पुण्य के प्रभाव से मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो सके'।"
३. राजा का व्याकुल होना और समाधान
पिता का कष्ट सुनकर राजा इन्द्रसेन अत्यंत दुखी हुए। उन्होंने नारद जी से पूछा— "हे ऋषिवर! कृपा करके मुझे इस व्रत की विधि बताएं, जिससे मेरे पिता को यमलोक की यातनाओं से मुक्ति मिले।"
नारद मुनि ने इन्दिरा एकादशी व्रत की विधि बताई:
दशमी का नियम: व्रत से एक दिन पहले (दशमी को) एक बार भोजन करें और मन को शांत रखें।
एकादशी का संकल्प: एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और भगवान विष्णु के सामने हाथ में जल लेकर संकल्प लें कि 'हे प्रभु! मैं यह व्रत अपने पिता के उद्धार के लिए कर रहा हूँ।'
श्राद्ध और तर्पण: इस दिन दोपहर में अपने पितरों का तर्पण करें और ब्राह्मणों को भोजन कराएं। स्वयं निराहार रहें।
रात्रि जागरण: पूरी रात भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप और भजन-कीर्तन करें।
४. व्रत का अनुष्ठान और पिता का उद्धार
राजा इन्द्रसेन ने श्रद्धापूर्वक अपनी पत्नी और मंत्रियों के साथ मिलकर इन्दिरा एकादशी का व्रत किया। जैसे ही उन्होंने द्वादशी के दिन व्रत का पारण किया, तभी आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी।
राजा ने दिव्य दृष्टि से देखा कि उनके पिता यमलोक के कष्टों से मुक्त होकर एक भव्य विमान पर सवार हैं। गंधर्व और अप्सराएं उनकी स्तुति कर रहे हैं। उनके पिता ने राजा को आशीर्वाद दिया और वे सीधे वैकुण्ठ लोक को प्रस्थान कर गए।
५. राजा की सुखद अंत और मोक्ष
इन्दिरा एकादशी के प्रभाव से राजा इन्द्रसेन ने भी बहुत समय तक सुखपूर्वक निष्कंटक राज्य किया और अंत में उन्हें भी मोक्ष प्राप्त हुआ।
॥ व्रत का महत्व और फल ॥ 📋💎
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं— "हे कुन्तीपुत्र! जो मनुष्य इन्दिरा एकादशी का व्रत करता है, उसके सात पीढ़ियों तक के पितर तृप्त हो जाते हैं। यह व्रत अश्वमेध यज्ञ के समान फल देता है।