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02 May 2026
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Vrat Katha

देवशयनी एकादशी व्रत कथा

क्यों सो जाते हैं भगवान विष्णु 4 महीनों के लिए? 😱 जानिए देवशयनी एकादशी का वो रहस्य जिसने अकाल को वर्षा में बदला। 👇

देवशयनी एकादशी व्रत कथा
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॥ श्री देवशयनी एकादशी व्रत कथा (सम्पूर्ण वृत्तांत) ॥ 🐚✨🛌

धर्मराज युधिष्ठिर ने पूछा— "हे केशव! आषाढ़ शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? इसकी विधि क्या है और किस पुण्य की प्राप्ति के लिए यह व्रत किया जाता है? कृपया विस्तार से समझाएं।"

भगवान श्री कृष्ण बोले— "हे युधिष्ठिर! इस एकादशी को 'देवशयनी', 'पद्मनाभा' या 'महा-एकादशी' भी कहते हैं। ब्रह्मा जी ने नारद मुनि को जो कथा सुनाई थी, वही मैं तुम्हें सुनाता हूँ। यह व्रत महापापों का नाश करने वाला है।"

१. चक्रवर्ती राजा मान्धाता का खुशहाल राज्य

सत्ययुग में मान्धाता नाम के एक चक्रवर्ती राजा हुए। वे अत्यंत धर्मात्मा, सत्यवादी और प्रजापालक थे। उनके राज्य में कभी कोई अकाल नहीं पड़ा, न ही किसी को कोई व्याधि हुई। प्रजा उन्हें पिता के समान मानती थी और राजा भी अपनी प्रजा का पूरा ध्यान रखते थे।

२. भयंकर अकाल और प्रजा का हाहाकार

एक समय प्रारब्ध वश राजा मान्धाता के राज्य में लगातार तीन वर्ष तक वर्षा नहीं हुई। नदियों और तालाबों का जल सूख गया, धरती फट गई और अन्न की भारी कमी हो गई। प्रजा भूख से तड़पने लगी। राजा के कोष से भी सहायता पहुँचाना कठिन हो गया क्योंकि यज्ञ-हवन आदि सब बंद हो गए थे।

प्रजा ने राजा के पास जाकर गुहार लगाई— "हे राजन्! जल के बिना सब नष्ट हो रहा है। शास्त्रों में जल को 'नारायण' कहा गया है। कृपा कर कोई ऐसा उपाय करें जिससे इंद्र देव प्रसन्न हों और वर्षा हो।"

३. राजा का वन गमन और ऋषि अंगिरा से भेंट

प्रजा का दुख देखकर राजा मान्धाता स्वयं को दोषी मानने लगे। वे इस संकट का समाधान खोजने के लिए एक छोटी सी सेना लेकर वन की ओर निकल पड़े। चलते-चलते वे ब्रह्मा जी के पुत्र महर्षि अंगिरा के आश्रम में पहुँचे। ऋषि अंगिरा उस समय ब्रह्म-तेज से चमक रहे थे।

राजा ने ऋषि को साष्टांग प्रणाम किया। ऋषि ने राजा के आने का कारण पूछा। राजा बोले— "हे ऋषिवर! मैं धर्मपूर्वक राज्य करता हूँ, फिर भी मेरे राज्य में तीन वर्षों से अकाल पड़ रहा है। प्रजा प्यास और भूख से मर रही है। कृपया मुझे इस पाप से मुक्ति का कोई मार्ग बताएं।"

४. देवशयनी एकादशी व्रत का समाधान

महर्षि अंगिरा बोले— "हे राजन्! यह युग 'सत्ययुग' है। यहाँ धर्म अपने चारों चरणों पर खड़ा है। इस युग में केवल ब्राह्मणों को ही तप करने का अधिकार है, लेकिन तुम्हारे राज्य में शायद कोई अन्य वर्ग का व्यक्ति अनुचित तप कर रहा है, जिसके कारण यह अकाल पड़ा है।"

राजा ने कहा— "महाराज! मैं किसी निर्दोष को दंड नहीं देना चाहता। कृपया कोई ऐसा सरल उपाय बताएं जिससे सबका कल्याण हो।"

तब ऋषि ने कहा— "हे राजन्! तुम आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की 'देवशयनी एकादशी' का विधिपूर्वक व्रत करो। यह एकादशी सर्वसिद्धि देने वाली है। इसके प्रभाव से मेघ अवश्य बरसेंगे और तुम्हारी प्रजा सुखी हो जाएगी।"

५. राजा का व्रत और राज्य की खुशहाली

राजा मान्धाता तुरंत अपनी नगरी वापस लौटे और आषाढ़ शुक्ल एकादशी आने पर अपनी रानी और समस्त प्रजा के साथ मिलकर पूर्ण श्रद्धा से भगवान विष्णु का पूजन और व्रत किया।

व्रत के पुण्य प्रभाव से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और तत्काल मूसलाधार वर्षा हुई। धरती हरी-भरी हो गई और अन्न के भंडार भर गए। राजा मान्धाता की प्रजा पुनः सुखी हो गई।


॥ भगवान विष्णु के शयन का रहस्य (राजा बलि प्रसंग) ॥ 🏯🔱

देवशयनी एकादशी से संबंधित एक और कथा प्रचलित है, जिसके कारण भगवान विष्णु चार मास के लिए पाताल चले जाते हैं:

जब वामन अवतार लेकर भगवान विष्णु ने राजा बलि से तीन पग भूमि माँगी और उसे पाताल भेज दिया, तब बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उसे वरदान मांगने को कहा। बलि ने मांगा कि— "प्रभु! आप सदैव मेरे द्वार पर रहें।"

भक्त के अधीन होकर भगवान पाताल में बलि के द्वारपाल बन गए। इससे माता लक्ष्मी व्याकुल हो गईं। तब उन्होंने बलि को राखी बांधकर भगवान विष्णु को मांगा। भगवान ने बलि को वचन दिया कि वे हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक (चार महीने) पाताल में बलि के पास रहेंगे। इसीलिए इन चार महीनों में भगवान 'शयन' करते हैं।


॥ व्रत का महत्व और चातुर्मास नियम ॥ 📋💎

मुख्य विशेषताआध्यात्मिक लाभ
पाप मुक्तिइस व्रत से बड़े से बड़े अनजाने पाप नष्ट हो जाते हैं।
चातुर्मास प्रारंभअगले चार महीने तक मांगलिक कार्य (विवाह आदि) वर्जित रहते हैं।
पुण्य की प्राप्तिइस दिन दान-पुण्य करने से अक्षय फल मिलता है।
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