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21 Mar 2026
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Vrat Katha

अपरा एकादशी व्रत कथा

अपरा एकादशी व्रत कथा का महत्व, कथा और पूजा विधि पढ़ें।

अपरा एकादशी व्रत कथा
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॥ श्री अपरा एकादशी व्रत कथा ॥ 🌸🕉️

कथा प्रारम्भ:

धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा— हे जनार्दन! ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है और उसका क्या माहात्म्य है? कृपा करके विस्तारपूर्वक कहें।

भगवान श्रीकृष्ण बोले— हे राजन्! ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम 'अपरा' है। यह एकादशी अपार पुण्य देने वाली और समस्त पापों का नाश करने वाली है। इसकी कथा सुनने मात्र से मनुष्य को ब्रह्म-हत्या, परनिंदा और झूठ बोलने जैसे जघन्य पापों से मुक्ति मिल जाती है। अब तुम इसकी पौराणिक कथा ध्यानपूर्वक सुनो।

प्राचीन काल में महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा राज्य करता था। उसका छोटा भाई वज्रध्वज अत्यंत क्रूर, अधर्मी और अन्यायी था। वह अपने बड़े भाई महीध्वज से बहुत द्वेष रखता था। एक दिन अवसर पाकर वज्रध्वज ने अपने बड़े भाई की हत्या कर दी और उसके शव को एक जंगली पीपल के नीचे गाड़ दिया।

अकाल मृत्यु होने के कारण महीध्वज की आत्मा प्रेत बनकर उसी पीपल के पेड़ पर रहने लगी। प्रेत योनि में होने के कारण वह आत्मा मार्ग से गुजरने वाले लोगों को परेशान करने लगी। एक दिन 'धौम्य' नामक ऋषि उधर से गुजर रहे थे। उन्होंने अपनी योग-शक्ति से उस प्रेत को देखा और उसके अतीत को जान लिया।

मुनि को उस पर दया आ गई। उन्होंने उस प्रेत को पीपल के पेड़ से नीचे उतारा और उसे परलोक विद्या का उपदेश दिया। ऋषि ने सोचा कि इस राजा के उद्धार के लिए स्वयं मुझे ही प्रयास करना होगा। तब धौम्य ऋषि ने स्वयं ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की 'अपरा एकादशी' का विधि-विधान से व्रत किया और उस व्रत का पूरा पुण्य उस प्रेत (महीध्वज) को दान कर दिया।

एकादशी के पुण्य फल के प्रभाव से राजा महीध्वज प्रेत योनि के कष्टों से मुक्त हो गया और दिव्य देह धारण कर लिया। उसने हाथ जोड़कर धौम्य ऋषि को प्रणाम किया और पुष्पक विमान में बैठकर स्वर्ग लोक को चला गया। इस प्रकार अपरा एकादशी के व्रत के प्रभाव से एक प्रेत का भी कल्याण हो गया।


॥ व्रत के नियम और पूजन विधि ॥ 📋✨

  • व्रत का संकल्प: दशमी की रात्रि से ही मन को शुद्ध रखें और एकादशी के दिन सुबह स्नान करके भगवान त्रिविक्रम (विष्णु) के सम्मुख व्रत का संकल्प लें।

  • भगवान त्रिविक्रम का पूजन: इस दिन भगवान विष्णु के 'त्रिविक्रम' स्वरूप की पूजा की जाती है। उन्हें पीले पुष्प, चंदन, अक्षत और धूप-दीप अर्पित करें।

  • तुलसी दल: भगवान को तुलसी पत्र अर्पित करना अनिवार्य है। इसके बिना पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती।

  • अन्न का त्याग: एकादशी के दिन किसी भी प्रकार के अन्न (विशेषकर चावल) का सेवन पूर्णतः वर्जित है। फलाहार लिया जा सकता है।

  • मौन और जप: इस दिन अधिक बोलने के बजाय 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का मानसिक जप करना श्रेष्ठ है।

  • द्वादशी पारण: अगले दिन सूर्योदय के पश्चात ब्राह्मण को भोजन कराकर या दान देकर ही व्रत खोलना चाहिए।


॥ अपरा एकादशी का धार्मिक महत्व ॥ 🔱🌟

  • नाम की सार्थकता: 'अपरा' का अर्थ है 'अपार' यानी असीमित। इस व्रत से मिलने वाले पुण्य की कोई सीमा नहीं है।

  • पाप मुक्ति: यह व्रत ब्रह्म-हत्या, गुरु की निंदा, झूठी गवाही देना और ठगी करने जैसे महापापों से मुक्त कर देता है।

  • यज्ञ के समान फल: शास्त्रों के अनुसार, जो फल कार्तिक स्नान, प्रयाग में माघ स्नान या गया में पिण्डदान करने से मिलता है, वह फल मात्र इस व्रत से प्राप्त हो जाता है।


॥ व्रत के लाभ और फल ॥ 💎🌈

  • प्रेत योनि से मुक्ति: जो व्यक्ति इस कथा को पढ़ता है या व्रत करता है, उसके पूर्वज यदि प्रेत योनि में हों, तो वे मुक्त हो जाते हैं।

  • सम्मान की प्राप्ति: समाज में मान-प्रतिष्ठा बढ़ती है और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।

  • आर्थिक लाभ: भगवान त्रिविक्रम की कृपा से घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है और दरिद्रता का नाश होता है।

  • मोक्ष पद: श्रद्धापूर्वक व्रत करने वाला मनुष्य अंत में विष्णु लोक में स्थान प्राप्त करता है।

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