Sanatan Vani • Devotion, wisdom and sacred reading
02 May 2026
Sanatan Vani Sacred wisdom in a modern form
Vrat Katha

अनंत चतुर्दशी व्रत कथा

अनंत चतुर्दशी व्रत कथा की संपूर्ण कथा, पूजन-विधि, व्रत का महत्व, पारण और फल जानें। यह व्रत भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को रखा जाता है और अनंत रूपी श्रीविष्णु, अनंत सूत्र और कौंडिन्य-सुशीला कथा के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध माना जाता है।

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अनंत चतुर्दशी व्रत कथा

अनंत चतुर्दशी का व्रत भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप को समर्पित है। इस दिन अनंत सूत्र बाँधकर श्रीहरि से अखंड सुख, रक्षा, धन-धान्य और परिवार की मंगलकामना की जाती है। अनंत का अर्थ है जिसका अंत न हो; अतः यह व्रत अनंत कृपा, अनंत पुण्य और अनंत आश्रय का प्रतीक माना जाता है।

कथा में महर्षि कौंडिन्य और उनकी पत्नी सुशीला का प्रसंग प्रमुख है। सुशीला ने श्रद्धा से अनंत भगवान का व्रत किया और अनंत सूत्र धारण किया। इसके प्रभाव से दांपत्य जीवन और गृहस्थी में समृद्धि आई। परंतु कौंडिन्य ने उस सूत्र का अपमान कर दिया, जिसके कारण सुख-सम्पत्ति नष्ट हो गई। बाद में उन्हें अपनी भूल का बोध हुआ। कठोर तप, पश्चात्ताप और श्रीअनंत की शरण ग्रहण करने पर भगवान विष्णु ने उन्हें पुनः कृपा दी और सब कुछ लौटा दिया।

यह कथा सिखाती है कि श्रद्धा, विश्वास और व्रत की पवित्रता का सम्मान करना चाहिए। अनंत सूत्र केवल धागा नहीं, बल्कि भगवान के संरक्षण और संकल्प का प्रतीक है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी के दिन व्रत, पूजन, कथा और दान करने से संकट दूर होते हैं तथा परिवार में स्थिरता आती है।

अनंत व्रत का फल

  • रक्षा, समृद्धि और पारिवारिक मंगल
  • भूल-सुधार के बाद भी श्रीहरि की कृपा प्राप्ति
  • धैर्य, श्रद्धा और संकल्प की दृढ़ता
  • संकटों से उबारने वाला अनंत आश्रय
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