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Vrat Katha

वैभव लक्ष्मी व्रत कथा

वैभव लक्ष्मी व्रत कथा

वैभव लक्ष्मी व्रत कथा

प्राचीन समय की बात है। एक नगर में एक स्त्री अपने पति के साथ रहती थी। वह स्त्री बहुत ही सरल, धार्मिक, सदाचारिणी और भगवान में आस्था रखने वाली थी। उसके पति का स्वभाव पहले अच्छा था, परंतु धीरे-धीरे वह बुरी संगति में पड़ गया। वह आलसी, क्रोधी और व्यसनों का आदी बन गया। घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ती चली गई। जो घर पहले सुख-समृद्धि से भरा था, वहाँ दरिद्रता, क्लेश और चिंता ने स्थान ले लिया।

स्त्री यह सब देखकर बहुत दुःखी रहती थी। घर में धन नहीं था, भोजन की भी कमी रहने लगी। उसने अनेक उपाय किए, परंतु कोई लाभ नहीं हुआ। फिर भी उसने धैर्य नहीं छोड़ा और माता लक्ष्मी से प्रार्थना करती रही कि हे माँ, हमारे घर की विपत्ति दूर करो।

एक दिन वह स्त्री बहुत दुःखी मन से बैठी थी। तभी उसके घर एक तेजस्विनी, सौम्य और दिव्य स्वरूप वाली वृद्धा आई। उस वृद्धा के मुख पर अद्भुत शांति थी। स्त्री ने आदरपूर्वक उन्हें आसन दिया और जल अर्पित किया। वृद्धा ने उससे उसकी चिंता का कारण पूछा। तब स्त्री ने विनम्रता से अपने घर की सारी स्थिति कह सुनाई।

वृद्धा ने मुस्कुराकर कहा, “बेटी, निराश मत हो। यदि तुम श्रद्धा, नियम और विश्वास के साथ वैभव लक्ष्मी व्रत करोगी, तो तुम्हारे घर में फिर से सुख, शांति और समृद्धि आ जाएगी। माँ लक्ष्मी अपने भक्तों की मनोकामना अवश्य पूर्ण करती हैं।”

स्त्री ने हाथ जोड़कर पूछा, “माते, कृपा करके मुझे इस व्रत की विधि बताइए।”

तब वृद्धा ने कहा, “शुक्रवार के दिन प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करो। घर के पूजा स्थान को शुद्ध करो। एक स्वच्छ चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर माँ लक्ष्मी की प्रतिमा, चित्र या श्री यंत्र स्थापित करो। माँ को पुष्प, फल, नैवेद्य, दीप और धूप अर्पित करो। मन में सच्ची श्रद्धा रखो, व्रत का संकल्प लो और वैभव लक्ष्मी माता की कथा सुनो या पढ़ो। व्रत के दिन यथाशक्ति सात्विक आहार लो या उपवास रखो। माता से प्रार्थना करो कि वे तुम्हारे घर में सुख-समृद्धि, शांति और सद्बुद्धि प्रदान करें।”

वृद्धा ने आगे कहा, “इस व्रत को लगातार 11 या 21 शुक्रवार तक श्रद्धा से करो। व्रत पूर्ण होने पर उद्यापन करो। माता की कृपा से तुम्हारे घर की सारी विपत्तियाँ दूर होंगी।”

यह कहकर वह वृद्धा वहाँ से चली गई। स्त्री को अनुभव हुआ कि यह कोई साधारण वृद्धा नहीं थीं, बल्कि स्वयं माँ लक्ष्मी की कृपा का स्वरूप थीं।

अगले शुक्रवार से उस स्त्री ने पूरे विश्वास और भक्ति के साथ वैभव लक्ष्मी व्रत आरंभ किया। वह नियमपूर्वक पूजा करती, कथा सुनती और माता से प्रार्थना करती। कुछ ही दिनों में उसके घर का वातावरण बदलने लगा। उसके पति के स्वभाव में भी परिवर्तन आने लगा। उसने बुरी संगति छोड़ दी, व्यसन त्याग दिए और मेहनत से काम करने लगा। घर में आय बढ़ने लगी। कलह समाप्त हो गई। दरिद्रता दूर होने लगी और घर में सुख-शांति लौट आई।

स्त्री ने मन ही मन माँ वैभव लक्ष्मी को धन्यवाद दिया। उसने निष्ठा के साथ अपने व्रत पूरे किए और उद्यापन किया। उसने अन्य स्त्रियों को भी इस व्रत का महत्त्व बताया। जो भी स्त्री श्रद्धा, पवित्रता और विश्वास के साथ यह व्रत करती, उसके घर में भी धीरे-धीरे सुख, वैभव और शांति का वास होने लगा।

इस प्रकार माँ वैभव लक्ष्मी अपने भक्तों के जीवन से दुःख, अभाव और कष्ट दूर कर उन्हें धन, धान्य, सौभाग्य, शांति और समृद्धि प्रदान करती हैं। जो स्त्री अथवा पुरुष सच्चे मन से माँ वैभव लक्ष्मी का व्रत करता है, उसके जीवन में शुभता का आगमन होता है और घर-परिवार में आनंद बना रहता है।

बोलो वैभव लक्ष्मी माता की जय।